“जब डाकिया झोले में खत नहीं भावनाएं लेकर आता था”
डाकिया जब गली में आता था तो कई आंखें उसके चेहरे को पढ़ने लगती थीं, शायद आज मेरा कोई खत आया हो
विश्व डाक दिवस पर उस दौर को याद करने की जरूरत है, जब डाकखाना सरकारी दफ्तर नहीं, भावनाओं का पता हुआ करता था। एक समय था जब डाकखाना केवल सरकारी दफ्तर नहीं हुआ करता था। वह भावनाओं का पता हुआ करता था। वहां से निकलने वाला हर खत किसी न किसी के जीवन में उम्मीद, अपनापन और इंतजार लेकर जाता था। डाकिया जब गली में आता था तो कई आंखें उसके चेहरे को पढ़ने लगती थीं, शायद आज मेरा कोई खत आया हो।
किसी मां के लिए वह दूर शहर में रह रहे बेटे की कुशलता की खबर लाता था। किसी पिता के लिए पढ़ाई कर रहे बच्चे का संदेश, किसी पत्नी के लिए परदेस गए पति की याद और किसी दोस्त के लिए वर्षों पुरानी मित्रता की खुशबू। तब चिट्ठियां केवल कागज नहीं थीं, उनमें धड़कते हुए दिल हुआ करते थे।
स्याही से लिखे कुछ शब्द महीनों की दूरी को पल भर में मिटा देते थे। लोग खत पढ़ते थे, फिर दोबारा पढ़ते थे और फिर संभालकर रख देते थे। कई बार तो पुराने खत संदूक में वर्षों तक सुरक्षित रहते थे। कागज पीला पड़ जाता था, लेकिन उस पर लिखी भावनाएं बूढ़ी नहीं होती थीं।
विश्व डाक दिवस हमें केवल डाक व्यवस्था के इतिहास को याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि उस दौर को भी याद करने का अवसर देता है जब एक डाकिया किसी परिवार का हिस्सा सा हुआ करता था। उसे घर का पता ही नहीं, घर के लोगों की चिंता भी मालूम होती थी। किसका बेटा बाहर नौकरी करता है, किसकी बेटी की शादी हुई है, किस घर में किसी का इंतजार है, डाकिया इन कहानियों से अनजान नहीं होता था।
कई बार खत देने वाला डाकिया केवल संदेश नहीं देता था, उस संदेश का भाव भी आंखों और चेहरे से पहुंचाता था। किसी की चिट्ठी देखकर मुस्कुरा देता, किसी के घर मनीऑर्डर पहुंचाकर परिवार की खुशी में शामिल हो जाता और कभी किसी तार की खबर लेकर आता तो उसकी आवाज तक बदल जाती थी। वह सिर्फ डाक विभाग का कर्मचारी नहीं, समाज के रिश्तों के बीच चलता-फिरता पुल था।
फिर समय बदला। खत की जगह फोन ने ले ली, फोन की जगह मोबाइल और मोबाइल के साथ संदेश, वीडियो कॉल और ई-मेल ने दुनिया को हथेली पर ला दिया। निश्चित रूप से इस बदलाव ने जीवन आसान किया। किलोमीटर की दूरियां समाप्त हुईं, संदेश सेकंडों में पहुंचने लगे। लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है, क्या तकनीक ने दूरियां कम करते-करते रिश्तों के बीच का धैर्य भी कम कर दिया?
पहले किसी से नाराजगी होती थी तो आदमी खत लिखता था। लेकिन खत लिखकर डाक में डालने और सामने वाले तक पहुंचने के बीच समय होता था। कई बार इसी समय में गुस्सा ठंडा पड़ जाता था। लिखे हुए शब्दों को दोबारा पढ़ने का अवसर मिलता था और मन कहता था, रहने दो, इतना भी क्या नाराज होना।आज गुस्सा आया और फोन उठाया। कुछ शब्द कहे, आवाज ऊंची हुई, फोन कट गया। फिर वही बात संदेशों में चली गई। कभी-कभी एक क्षण का आवेश वर्षों के रिश्ते पर भारी पड़ जाता है।
खत धीमे थे, लेकिन रिश्तों को सोचने का समय देते थे।मोबाइल तेज है, लेकिन कई बार हमें सोचने का समय नहीं देता। चिट्ठी लिखने की एक खूबसूरती यह भी थी कि उसमें शब्द चुनने पड़ते थे। कागज सामने होता था और दिल भीतर। हर वाक्य लिखने के बाद लगता था कि सामने वाला इसे कैसे पढ़ेगा। इसलिए खत में केवल सूचना नहीं होती थी, संवेदना होती थी।
आज हमारे पास संपर्क के हजार साधन हैं, लेकिन शायद संवाद के लिए समय कम है। सैकड़ों लोगों के नंबर मोबाइल में हैं, हजारों लोग सोशल मीडिया पर जुड़े हैं, लेकिन कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें हम बैठकर अपने मन की बात कह सकें?डाकखाने बदल गए, चिट्ठियों की संख्या कम हो गई, डाकिये की प्रतीक्षा भी बहुत कम हो गई। लेकिन खत की भावना आज भी मरनी नहीं चाहिए। क्योंकि तकनीक संदेश पहुंचा सकती है, भावना नहीं; आवाज सुना सकती है, अपनापन नहीं; चेहरा दिखा सकती है, लेकिन इंतजार की वह मिठास नहीं दे सकती जो कभी एक चिट्ठी के आने से घर में उतरती थी।
आज विश्व डाक दिवस पर शायद डाकिये को याद करने का सबसे सुंदर तरीका यही होगा कि हम अपने किसी प्रिय व्यक्ति को एक खत लिखें। जरूरी नहीं कि उसमें कोई बड़ी बात हो। बस इतना लिख दें, “तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण हो।” शायद उस एक खत से हमें फिर समझ आए कि कभी डाकखाना सिर्फ पत्रों का केंद्र नहीं था। वह रिश्तों का रास्ता था, डाकिया उस रास्ते का यात्री था,और हर खत किसी धड़कते हुए दिल की आवाज।
आज डाकिया कम दिखाई देता है, लेकिन हमें अपने भीतर का वह डाकिया फिर जगाना होगा, जो रिश्तों तक संदेश पहुंचाए, नाराजगी के बीच धैर्य पहुंचाए और दूरियों के बीच अपनापन।क्योंकि दुनिया चाहे कितनी भी डिजिटल हो जाए, कुछ भावनाएं ऐसी हैं जिन्हें आज भी ‘सेंड’ नहीं किया जा सकता, उन्हें महसूस करना पड़ता है।
वीरेंद्र हीरालाल पथरिया
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