मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल

लोकतंत्र में मीडिया को अक्सर समाज का आईना कहा जाता है। उसका काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता, व्यवस्था और समाज से जुड़े सवालों को जनता के सामने रखना भी है।

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लोकतंत्र में मीडिया को अक्सर समाज का आईना कहा जाता है। उसका काम केवल घटनाओं की सूचना देना नहींबल्कि सत्ताव्यवस्था और समाज से जुड़े सवालों को जनता के सामने रखना भी है। लेकिन आज जब सूचना का प्रवाह पहले से कहीं तेज हो गया हैतब मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती खबरों की संख्या नहींबल्कि विश्वसनीयता बचाए रखने की है। मोबाइल फोन की स्क्रीन पर हर क्षण सैकड़ों सूचनाएं पहुंच रही हैं। टेलीविजन चैनलों की बहसेंन्यूज पोर्टलयूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया—सब मिलकर एक ऐसा सूचना संसार बना चुके हैंजिसमें सच और भ्रम के बीच अंतर करना आम नागरिक के लिए कठिन होता जा रहा है।

पहले किसी घटना की खबर के लिए लोग अखबार या समाचार बुलेटिन का इंतजार करते थे। आज घटना घटते ही उसके वीडियोदावे और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर फैलने लगती हैं। कई बार मूल तथ्य सामने आने से पहले ही किसी घटना पर राय बन चुकी होती है। यही स्थिति मीडिया की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चुनौती पैदा करती है।

खबर और विचार के बीच धुंधली होती सीमा

पत्रकारिता की बुनियादी कसौटी तथ्य है। लेकिन वर्तमान दौर में खबर और विचार के बीच की सीमा कई जगह धुंधली दिखाई देती है। समाचार को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि उसमें निष्पक्ष सूचना से अधिक किसी खास दृष्टिकोण का प्रभाव दिखाई देने लगे। विचार रखने का अधिकार पत्रकार और मीडिया संस्थान दोनों को हैलेकिन पाठक को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि वह समाचार पढ़ रहा है या विश्लेषण अथवा टिप्पणी। जब राय को तथ्य की तरह प्रस्तुत किया जाता हैतब भ्रम पैदा होता है और पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

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सोशल मीडिया ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है। अब किसी घटना की तस्वीर या वीडियो सामने लाने के लिए बड़े मीडिया संस्थान का इंतजार जरूरी नहीं। आम नागरिक भी घटनास्थल से जानकारी साझा कर सकता है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक बदलाव है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा खतरा भी पैदा हुआ है—बिना पुष्टि की सूचना का तेज प्रसार।

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अधूरी जानकारीपुराने वीडियोगलत संदर्भ वाली तस्वीरें और भ्रामक दावे कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। कई बार लोग खबर की सत्यता जांचने के बजाय यह देखते हैं कि उसे कितने लोगों ने साझा किया है। लोकप्रियता को सत्य का प्रमाण मान लेना पत्रकारिता और समाज दोनों के लिए खतरनाक है। टीआरपी और क्लिक की दौड़

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मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। विज्ञापनदर्शक संख्यावेबसाइट ट्रैफिक और सोशल मीडिया एंगेजमेंट आज मीडिया कारोबार के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इसका दबाव कभी-कभी खबरों की प्राथमिकता को भी प्रभावित करता है। जिस खबर में अधिक सनसनी होवह ज्यादा क्लिक ला सकती है। जिस बहस में तीखे आरोप होंवह अधिक दर्शक खींच सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दर्शक संख्या ही पत्रकारिता की सफलता का अंतिम पैमाना हो सकती हैयदि किसी गंभीर सामाजिक समस्या की जगह केवल इसलिए विवादित बयान को प्रमुखता दी जाए क्योंकि उससे ज्यादा क्लिक मिलते हैंतो पत्रकारिता धीरे-धीरे जनहित से बाजार की प्राथमिकताओं की ओर खिसक सकती है। डिजिटल पत्रकारिता में सबसे पहले खबर देने की होड़ ने गति को महत्व दिया है। लेकिन पत्रकारिता में सबसे पहले होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है—सही होना। किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले स्रोत की पुष्टिसंबंधित पक्ष का पक्षदस्तावेजों की जांच और संदर्भ को समझना आवश्यक है। जल्दबाजी में प्रकाशित गलत खबर बाद में भले ही सुधार दी जाएलेकिन उसकी पहली छाप लंबे समय तक लोगों के मन में बनी रह सकती है। इसलिए मीडिया को यह तय करना होगा कि 'सबसे पहलेकी तुलना में 'सबसे विश्वसनीयहोना अधिक महत्वपूर्ण है। मीडिया की विश्वसनीयता केवल पत्रकारों की जिम्मेदारी नहीं है। पाठक और दर्शक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। किसी सनसनीखेज दावे को तुरंत साझा करने से पहले यह देखना चाहिए कि उसकी पुष्टि किसी विश्वसनीय स्रोत से हुई है या नहीं। एक ही खबर को अलग-अलग स्रोतों से पढ़नाशीर्षक के बजाय पूरी खबर देखना और तस्वीर या वीडियो का संदर्भ जांचना आज जिम्मेदार नागरिकता का हिस्सा बन गया है।

गलती स्वीकार करना भी विश्वसनीयता है

मीडिया संस्थान भी गलतियां कर सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि गलती सामने आने पर उसे स्वीकार किया जाए और स्पष्ट रूप से सुधार प्रकाशित किया जाए। गलती छिपाने या उसे नजरअंदाज करने की कोशिश भरोसा और कम करती है। एक विश्वसनीय मीडिया संस्थान वह नहीं है जो कभी गलती न करेबल्कि वह है जो तथ्य सामने आने के बाद अपनी गलती को ईमानदारी से सुधारने का साहस रखता हो। मीडिया का दायित्व केवल सरकार से सवाल पूछना नहीं है। उसे विपक्षप्रशासनसंस्थाओंउद्योगसामाजिक संगठनों और स्वयं समाज से भी सवाल करने चाहिए। पत्रकारिता का पक्ष किसी व्यक्ति या दल का नहींबल्कि जनहित और सत्य का होना चाहिए। असुविधाजनक प्रश्न पूछ सकता है। यही उसकी भूमिका है। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। आलोचना तथ्य आधारित होनी चाहिए और प्रशंसा भी तथ्यों पर आधारित। आने वाले समय में पत्रकारिता और अधिक डिजिटल होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्तासोशल मीडिया और नागरिक पत्रकारिता सूचना की दुनिया को और तेज बनाएंगे। ऐसे दौर में मीडिया की असली ताकत उसकी गति नहींबल्कि उसकी विश्वसनीयतातथ्य-जांच और संपादकीय स्वतंत्रता होगी।

समाचार संस्थानों को तकनीक अपनाने के साथ-साथ पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को भी मजबूत करना होगा। पत्रकारों को तथ्य-जांचडिजिटल स्रोतों की पड़ताल और गलत सूचना की पहचान के लिए लगातार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। आज सवाल यह नहीं है कि हमारे पास सूचना कितनी है। सवाल यह है कि उस सूचना में सच कितना है। मीडिया के सामने विश्वास का संकट केवल मीडिया का संकट नहीं है। यह लोकतंत्र का संकट भी बन सकता है। जब जनता को यह भरोसा न रहे कि उसे सही जानकारी मिल रही हैतब अफवाह और प्रचार तथ्य की जगह लेने लगते हैं। इसलिए पत्रकारिता को फिर उसी मूल सिद्धांत की ओर लौटना होगा—पहले सत्यफिर सनसनीपहले तथ्यफिर रायपहले जनहितफिर बाजार। मीडिया की विश्वसनीयता किसी कानून या नारे से नहींबल्कि रोज प्रकाशित होने वाली हर खबर की ईमानदारी से बनती है। आखिरकार पाठक को खबर चाहिएशोर नहींतथ्य चाहिएभ्रम नहींऔर सबसे बढ़कर—सच चाहिए।

 

 

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