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सोशल मीडिया का शोर और लोकतंत्र की खामोशी
सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब झूठ तेजी से फैलता है और सच उसके पीछे भागता रह जाता है।
राजीव शुक्ला
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की आवाज सुनी जाए, सत्ता से सवाल पूछे जाएं, असहमति का सम्मान हो और नागरिकों को सही जानकारी के आधार पर अपना निर्णय लेने का अवसर मिले। लेकिन डिजिटल युग में लोकतंत्र के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। आज हमारे पास संवाद के साधन पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन क्या संवाद की गुणवत्ता भी उसी अनुपात में बढ़ी है? यही वह सवाल है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत में सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन या व्यक्तिगत संपर्क का माध्यम नहीं रह गया है। यह राजनीतिक विमर्श, चुनावी प्रचार, सामाजिक आंदोलनों और जनमत निर्माण का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
डाटा रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2025 में भारत में लगभग 80.6 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता और लगभग 49.1 करोड़ सोशल मीडिया यूजर आइडेंटिटीज थीं। इतनी बड़ी डिजिटल आबादी के बीच सोशल मीडिया पर कही गई बात का असर घर, समाज और अंततः राजनीति तक पहुंचना स्वाभाविक है। समस्या सोशल मीडिया के अस्तित्व में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सूचना की जगह शोर लेने लगता है और तर्क की जगह उत्तेजना। जब हर व्यक्ति बन गया है अपना 'न्यूज चैनल' सोशल मीडिया ने सूचना पर पुराने पहरे तोड़े हैं।
पहले किसी घटना को जनता तक पहुंचने के लिए अखबार, रेडियो या टेलीविजन की जरूरत होती थी। आज मोबाइल फोन रखने वाला लगभग हर व्यक्ति सूचना का निर्माता, प्रसारक और टिप्पणीकार बन सकता है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। किसी गांव की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सकता है। किसी पीड़ित की आवाज लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। सरकार की किसी नीति पर तत्काल प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। पत्रकारों और नागरिकों को सत्ता से सवाल पूछने के नए माध्यम मिले हैं। लेकिन इसी शक्ति का दूसरा पक्ष भी है।
जब हर व्यक्ति बिना सत्यापन के किसी सूचना को आगे बढ़ाने लगे तो सूचना और अफवाह के बीच की सीमा समाप्त होने लगती है। किसी पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़ दिया जाता है। किसी वीडियो का संदर्भ बदल दिया जाता है। आधा सच पूरे झूठ से अधिक प्रभावशाली बना दिया जाता है। और सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब झूठ तेजी से फैलता है और सच उसके पीछे भागता रह जाता है।
लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा 'झूठ' ही नहीं, आधा सच है लोकतांत्रिक समाज में असहमति स्वाभाविक है। सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए और विपक्ष की आलोचना भी। समस्या आलोचना में नहीं, बल्कि उस आलोचना को प्रभावित करने वाली गलत सूचना में है। आज किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के बारे में एक छोटा-सा वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। लेकिन उस वीडियो का पूरा संदर्भ कितने लोग तलाशते हैं?
यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती है। गलत सूचना का प्रभाव केवल यह नहीं कि कोई व्यक्ति गलत तथ्य जान लेता है। इससे समाज में अविश्वास पैदा हो सकता है। एक समुदाय दूसरे समुदाय को संदेह की नजर से देखने लग सकता है। राजनीतिक विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल सकता है और सार्वजनिक बहस नीतियों से हटकर व्यक्तियों के चरित्र पर पहुंच सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर कितनी बातें कही जा रही हैं। असली सवाल यह है कि उनमें से कितनी बातें तथ्य, तर्क और जिम्मेदारी पर आधारित हैं।
'वायरल' होना सत्य होने का प्रमाण नहीं हमने एक खतरनाक मानसिकता विकसित कर ली है—जो बात ज्यादा वायरल है, उसे ज्यादा महत्वपूर्ण मान लेना। लेकिन लोकप्रियता और सत्यता दो अलग-अलग चीजें हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम लोकतांत्रिक सत्यापन प्रणाली नहीं है। वह सामान्यतः यह तय नहीं करता कि कौन-सी बात तथ्यात्मक रूप से सही है; वह उपयोगकर्ता की रुचि और सहभागिता के आधार पर सामग्री को आगे बढ़ाता है। परिणाम यह हो सकता है कि उत्तेजक, भावनात्मक या विवादित सामग्री शांत और तथ्यात्मक जानकारी की तुलना में अधिक ध्यान खींचे। यहीं लोकतंत्र की परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि लोकतंत्र को केवल बोलने वाले नागरिक नहीं चाहिए। लोकतंत्र को सूचित नागरिक चाहिए। राजनीति में सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव
राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया की ताकत को बहुत पहले पहचान लिया था। अब चुनावी राजनीति केवल मैदान में होने वाली रैलियों तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संदेश तैयार किए जाते हैं, वीडियो बनाए जाते हैं, समर्थकों के नेटवर्क सक्रिय किए जाते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर जनमत बनाने की कोशिश होती है। हाल के घटनाक्रम भी बताते हैं कि राजनीतिक संवाद में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है।
अगस्त 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिजिटल रणनीति में Instagram और युवा-केंद्रित सामग्री पर विशेष जोर की रिपोर्ट सामने आई है। यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल उस मंच पर पहुंचना चाहते हैं जहां करोड़ों मतदाता मौजूद हैं। लेकिन यहां राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यदि सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम बनाया गया और तथ्य, मर्यादा तथा पारदर्शिता को पीछे छोड़ दिया गया, तो लोकतांत्रिक संवाद धीरे-धीरे प्रचार युद्ध में बदल सकता है।


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