यात्री कतारों में खड़े रहे, सुरक्षा के रखवाले सौदों में खड़े मिले

[सुरक्षा की दीवार ऊंची थी, बस उसकी नींव बिकाऊ निकली], [हवाई अड्डे पर सोना नहीं, भरोसा तस्करी होकर बाहर निकला]

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

सुरक्षा का तमाशा अजीब है—कटघरे में यात्री खड़ा होता हैचूक भीतर होती है। वह चुपचाप बैग खोलता हैजूते-बेल्ट उतारता हैपानी की बोतल छोड़ता हैलैपटॉप अलग ट्रे में रखता है। उसे भरोसा रहता है कि यह असुविधा सुरक्षा की कीमत है। लेकिन इंदौर के देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डे पर ‘ऑपरेशन एयरोब्रिज’ ने भरोसा तोड़ दिया। अबू धाबी से आया चांदी की परत चढ़ा लगभग एक किलो सोना एयरोब्रिज पर ही एयर इंडिया एक्सप्रेस कर्मचारी को सौंपा गया। वह टैरमैक से उतरकर सुरक्षा व्यवस्था को छलता रहा और जांच में कस्टम अधिकारी की मिलीभगत सामने आई। तब यह केवल तस्करी नहीं रह जाती। सवाल है—जब सुरक्षा के पहरेदार ही चाबी बेचने लगेंतो यात्रियों की कठोर तलाशी आखिर किसकी सुरक्षा कर रही है?

हवाई अड्डों की सुरक्षा वहां नहीं टूटीजहां दीवारें खत्म होती हैंवह वहां टूटीजहां भरोसा शुरू होता है। हमारे यहां सुरक्षा बाहर से आने वाले खतरे पर केंद्रित है। मशीनेंस्कैनरकैमरे और नियम—सबकी निगाह यात्री पर रहती हैमानो सबसे बड़ा संदेह उसी पर हो। लेकिन दूसरी ओर खड़े कर्मचारियोंजिन्हें प्रतिबंधित क्षेत्रों में निर्बाध प्रवेश है और जिनकी पहचान ही पास हैउनकी निष्ठा की जांच नियमित और कठोर नहीं होती। इसलिए एयरोब्रिज से टैरमैक तक का रास्ता पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न बन गया। वहां न सुरंग थीन तकनीकी चूककेवल वर्दीपरिचित चेहरा और भीतर की मिलीभगत थी। किसी सुरक्षा तंत्र का इससे बड़ा लूपहोल नहीं हो सकता।

सुरक्षा का बोझ बेगुनाह कंधों पर रखा जाता है। खाड़ी से कमाई लेकर लौटने वाला मजदूरविदेश पढ़ने जाने वाला छात्र और छोटे व्यापार के लिए उड़ान भरने वाला व्यापारी—सभी समान तलाशीप्रतीक्षा और संदेह झेलते हैं। जेबें खाली करवाई जाती हैंबच्चों तक को स्कैनर से निकाला जाता है और घंटों कतार बाद कहा जाता है कि यह उनकी सुरक्षा के लिए है। लेकिन जब सुरक्षा तंत्र में बैठे लोग दस हजार रुपये के लालच में सीमा की पवित्रता गिरवी रख देंतब अपमान उसी ईमानदार यात्री का होता हैजिसने हर नियम निभाया। सवाल है कि क्या जांच केवल उसी के लिए हैजबकि असली खतरा उन लोगों से पैदा हो रहा हैजिन्हें जांचने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली?

किसी व्यवस्था की हार तब होती हैजब नागरिक का भरोसा टूटने लगे। यह घटना सोने की तस्करी तक सीमित नहींलोकतांत्रिक विश्वास का संकट बन जाती है। नागरिक कानून से डरकर नहींव्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसे से जुड़ता है। लेकिन जब एयरलाइंस कर्मचारी और कस्टम अधिकारी मिलकर सुरक्षा की दीवार में सेंध लगा देंतब यात्री मशीनों से नहींवर्दी से डरने लगता है। उसे सवाल सताता है कि जिस व्यवस्था ने उसे शक की नजर से देखाउसने अपने लोगों पर आंखें क्यों मूंद लीं। यही क्षण हैजब सुरक्षा विश्वास का आधार नहींअविश्वास की वजह बनती है। हवाई अड्डे की कमजोर दीवार कंक्रीट की नहींमनुष्य के चरित्र की होती है।

सिर्फ कठोर कानून बनाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है!  Read More सिर्फ कठोर कानून बनाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है! 

सुरक्षा की विडंबना यही है कि मशीनें बढ़ती गईंपर ईमानदारी की जांच पीछे छूट गई। इस प्रकरण में सवाल तस्करी की तकनीक नहींव्यवस्था की मानसिकता है। चांदी की परत चढ़ाकर सोना लाना केवल कानून को चकमा देना नहीं थासुरक्षा व्यवस्था पर मौन व्यंग्य था। उसने दिखा दिया कि आधुनिक मशीनें भी मनुष्य की बेईमानी के सामने असहाय हैं। करोड़ों के स्कैनरसीसीटीवीडिजिटल निगरानी और बहुस्तरीय जांच तब बेकार हो जाती हैजब भीतर बैठा व्यक्ति जिम्मेदारी बेच देता है। व्यवस्था ने तकनीक बढ़ाईलेकिन ईमानदारी की निगरानी मजबूत नहीं की। दस हजार रुपये का लालच करोड़ों की सुरक्षा पर भारी पड़ गया। यह तकनीक नहींनैतिकता की हार है।

मैम, मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं.. और सब कुछ बदल गया Read More मैम, मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं.. और सब कुछ बदल गया

हवाई अड्डा अब केवल अमीरों की दुनिया का द्वार नहींआम आदमी के भरोसे का ठिकाना भी है। नौकरीशिक्षाव्यापार और इलाज के लिए साधारण नागरिक भी विमान यात्रा कर रहा है। उसके लिए हवाई अड्डा सिर्फ उड़ान नहींसुरक्षित पहुंचने का विश्वास है। जब उसी विश्वास के भीतर से तस्करी का रास्ता निकलता हैतो चोट केवल अपराध तक सीमित नहीं रहती। यात्री सुरक्षा जांच को भरोसे के बजाय औपचारिकता समझने लगता है। सार्वजनिक संस्थाओं पर घटता विश्वास हर नागरिक को प्रभावित करता है।

युवाओं को नशे के चंगुल से बचाना राष्ट्रीय संकल्प देश की शक्ति और भविष्य की रक्षा का सबसे बड़ा अभियान Read More युवाओं को नशे के चंगुल से बचाना राष्ट्रीय संकल्प देश की शक्ति और भविष्य की रक्षा का सबसे बड़ा अभियान

सुरक्षा की दीवार मशीनों से नहींजिम्मेदार लोगों से खड़ी होती है। समाधान केवल स्कैनर और कैमरे लगाने में नहीं है। जरूरत है कि सुरक्षा व्यवस्था का केंद्र मनुष्य बने। एयरलाइंसकस्टम और हवाई अड्डों के कर्मचारियों की नियमित सत्यनिष्ठा जांचसंवेदनशील पदों पर समयबद्ध बदलावस्वतंत्र ऑडिटआकस्मिक निगरानी और मिलीभगत पर कठोर कार्रवाई—ये सुरक्षा के जरूरी हिस्से हैं जितने तकनीकी उपकरण। जिस व्यवस्था में यात्री की हर गतिविधि दर्ज होती हैवहां सुरक्षा कर्मचारियों की जवाबदेही भी पारदर्शी होनी चाहिए। नागरिक से अनुशासन मांगने वाली व्यवस्था को पहले स्वयं अनुशासित होना होगावरना उसका सुरक्षा नैतिक अधिकार धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।

कुछ घटनाएं खबर बनकर खत्म नहीं होतींवे व्यवस्था की कमजोरी का आईना बनती हैं। इंदौर की घटना केवल सोने की तस्करी नहींदेश के सबसे सुरक्षित द्वार पर हुआ मौन विश्वासघात है। इसने बता दिया कि सुरक्षा का खतरा बाहर का व्यक्ति नहींभीतर बैठा बेईमान व्यक्ति हो सकता है। जब तक व्यवस्था यह नहीं मानेगी कि सुरक्षा लूपहोल मशीनों में नहींमनुष्य के चरित्र में हैतब तक लंबी कतारेंतलाशी और कठोर जांच औपचारिकता रह जाएंगी। राष्ट्र की सीमाएं तकनीक से मजबूत हो सकती हैंपर सुरक्षित तभी होती हैंजब उन्हें संभालने वाले हाथ ईमानदार हों। अंततः हवाई अड्डे की सुरक्षा स्कैनर की स्क्रीन पर नहींवर्दी पहने व्यक्ति के विवेक में होती है।

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें