सोशल मीडिया प्रभाव

सोशल मीडिया का शोर और लोकतंत्र की खामोशी

राजीव शुक्ला लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की आवाज सुनी जाए, सत्ता से सवाल पूछे जाएं, असहमति का सम्मान हो और नागरिकों को सही जानकारी के आधार पर अपना...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय 

सोच का बोझ नहीं, दिशा का चिंतन: ओवरथिंकिंग के दौर में युवा मन की सच्चाई

आज की युवा पीढ़ी एक ऐसे दौर में जी रही है जहाँ अवसर भी अनगिनत हैं और दबाव भी उतने ही गहरे। पढ़ाई, करियर, रिश्ते और आर्थिक स्थिरता की चिंता एक साथ दिमाग पर दस्तक देती है। इसी के बीच...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय 

डिजिटल आराम, मानसिक तनाव—कहाँ फंस गया इंसान?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”आज के युग में हर तरफ सुविधाओं का बोलबाला है। एक क्लिक में खाना, कपड़े, मनोरंजन सब घर बैठे मिल जाता है। स्मार्टफोन, ऐप्स और इंटरनेट ने जीवन को इतना सरल बना दिया...
स्वतंत्र विचार  संपादकीय 

जेब में पलता अदृश्य ज़हर: सोशल मीडिया और युवा मन का संकट

   [आभासी सफलता का दबाव और युवा मन का अवसाद] [सोशल मीडिया: मनोरंजन नहीं, मानसिक प्रदूषण का नया दौर]    ·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”    कभी मानव सभ्यता को खतरा बाहरी प्रदूषणों से था—धुएँ से, प्लास्टिक...
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