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सिर्फ कठोर कानून बनाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है!
अंधी व्यवस्था ने उस आरोपी धनंजय को फांसी दी जिस के अपराध को अंजाम देने के खिलाफ पचास संदेह मौजूद हैं।
मनोज कुमार अग्रवाल
परीक्षा पेपर लीक की समस्या का स्थायी समाधान तकनीकी सुधार, सख्त कानूनी कार्रवाई, प्रशासनिक पारदर्शिता और परीक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण के समन्वय से ही संभव है। भारत सरकार ने हाल ही में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करके दोषियों के लिए 10 साल तक की जेल और ₹50 लाख तक के जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान किए हैं, लेकिन केवल कानून ही इसका अंतिम इलाज नहीं है।क्या सिर्फ सख्त कानून या सख्त सजा का प्रावधान करने से कोई अपराध रूक सका? बलात्कार हत्या के लिए मृत्यु दंड की सजा का प्रावधान होने के बावजूद इन वारदातों पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका! अंधी व्यवस्था ने उस आरोपी धनंजय को फांसी दी जिस के अपराध को अंजाम देने के खिलाफ पचास संदेह मौजूद हैं।
निर्भया जैसी वारदातों को सख्त कानून बनाने के बावजूद नहीं रोका जा सका। फिर परीक्षा लीक को कानून बना कर रोका जा सकेगा? विपक्ष के हंगामे के बीच लोकसभा से मोदी सरकार का महत्वपूर्ण विधेयक जो एंटी पेपरलीक को लेकर कानून को सख्त बनाये जाने से सम्बन्धित है ध्वनिमत से पास हो गया है। अब राज्यसभा में यह विधेयक पेश किया जायेगा। वहां भी पास हो ही जायेगा। सरकार का कहना है कि एंटी पेपर लीक कानून को और सख्त बनाने के उद्देश्य से लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 लाया गया है। जिसका उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल, संगठित परीक्षा धोखाधड़ी और अन्य अनुचित गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाना है।
इस संशोधित कानून में दोषियों के खिलाफ पहले से अधिक कठोर दंड, आर्थिक जुर्माना और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं। सरकार का दावा है कि यह कानून प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता बढ़ाएगा और लाखों युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करेगा।आपको पता है कि नीट के पेपर लीक को लेकर जिस प्रकार से देश भर में युवाओं छात्रों में माहौल बना सरकार ने पैदा आक्रोश को दबाने के लिए फौरी उपचार बतौर इस विधेयक को ऐसे समय ड्राफ्ट किया है। तब जबकि जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलित थे और वे केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे थे।
छात्रों, युवाओं के प्रदर्शन व मांगों के बीच धर्मेन्द्र प्रधान का शिक्षामंत्री के पद से इस्तीफा तो हो गया। लेकिन पेपरलीक, परीक्षाओं में अनियमितता शिक्षा व्यवस्था सिर्फ न तो इस्तीफे से रूकने वाली है और नही उसको लेकर बनाये गए सख्त कानूनों से ही रूकेगा। देश में कानून तो बहुत से हैं। वह चाहे चोरी, छेड़छाड़ का हो, भ्रष्टाचार, रिश्वत लेने-देने, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा का या हत्या का, खाद्य पदार्थों में मिलावट का हो या नकली दवाएं बेचे जाने का। कानून की कोई कमी इस देश में नहीं हैं। सवाल यह है कि इतने कानूनों के बावजूद व्यवस्था में बदलाव क्यों नहीं हो पा रहा है। क्योंकि यह कतई नहीं माना जा सकता है कि उसी व्यवस्था में शामिल लोगों के बिना पेपरलीक हो सकता है या परीक्षा में अनियमितता हो सकती है।
जहां तक शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली का प्रश्न है, पेपरलीक और परीक्षा में अनियमितता सिर्फ इन कारणों से नहीं होती है कि इन अपराधों के लिए दंडित करने के लिए कोई कानून नहीं है। यह तो व्यवस्था की विसंगतियों और कुछ लोगों के गठजोड़ से अत्यधिक मुनाफा कमाने और कुछ लोगों को अनुचित लाभ दिलाने से जुड़े प्रश्न हैं। यदि कुछ वर्षों में देश में कोचिंग संस्थानों का व्यापार तेजी से बढ़ा है। क्या इसके बारे में भी सरकार ने कभी सोचा है कि आखिर वे कौन से कारण हैं कि देश में शिक्षा की व्यवस्था दिनों दिन गिरती जा रही है। निजी संस्थानों की बाढ़ आ रही है। सरकारी संस्थान डूब रहे हैं। सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, उनमें शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं है, संसाधन विहीन है।
क्या कारण है कि कोचिंग संस्थान फल-फूल रहे हैं और स्कूल कालेजों में हो रही पढ़ाई उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुकूल नहीं बना पाती है और छात्र अपनी रेगुलर पढ़ाईछोड़कर कोचिंग संस्थाओं में भारी भरकम फीस जमा करके प्रवेश लेते हैं और तैयारी करते हैं। मां बाप और अभिभावक भी बच्चों के भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। इसी प्रकार प्रतियोगी परीक्षाओं, प्रवेश परीक्षाओं और नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षाओं में भी जब पेपरलीक होता है तो उन छात्रों और युवाओं की पीड़ा देखी जा सकती है जो बड़ी उम्मीदों से तैयारी करते हुए परीक्षाएं देते हैं लेकिन उनका परिणाम नहीं आता है। पेपरलीक होने की वजह से परीक्षा कैसिल हो जाती है।
दोबारा जब करायी जाती है तब तक बहुत समय गुजर चुका होता है। धन भी जाता है और बहुत बार आयु भी निकल चुकी होती है। यही कारण है कि जंतर-मंतर पर जो आक्रोश उभर कर सामने आया वह सिर्फ नीट परीक्षा तक सीमित नहीं था और न ही सिर्फ नीट दिए हुए या उससे प्रभावित लोग ही जुटे। यह पूरी व्यवस्था में घुले भ्रष्टाचार का परिणाम था जो वर्षों से धीरे-धीरे सुलग रहा था और जंतर-मंतर पर आकर फूट पड़ा था। सरकार को चाहिए कि शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ ही न बनाये बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर नकेल डाले जो सिर्फ कानून से नहीं हो सकता है। सवाल तो यह भी है कि आखिर सरकार शिक्षा के लिए बजट में वृद्धि क्यों नहीं करती है कि इसके लिए सरकार के तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ करायी जा सके। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा।
पेपर लीक को रोकने के लिए प्रमुख रणनीतियों को लागू किया जाना आवश्यक है इसके तहत सबसे पहला कदम आधुनिक तकनीक का उपयोग डिजिटल प्रश्न पत्र वितरण: पेपर को छापने और गाड़ियों में ले जाने के बजाय, परीक्षा से ठीक आधा घंटा पहले केंद्रों पर एन्क्रिप्टेड डिजिटल फाइल भेजी जाए।ब्लॉकचेन और एडवांस एन्क्रिप्शन: प्रश्न पत्रों को सुरक्षित रखने के लिए ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग किया जाए जिससे डिजिटल फाइल में किसी भी छेड़छाड़ का तुरंत पता चल सके। दूसरा कदम एआई निगरानी: परीक्षा केंद्रों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कैमरों से रियल-टाइम निगरानी की जाए ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि को तुरंत पकड़ा जा सके।डिजिटल ऑडिट ट्रेल: प्रश्न पत्र को कब, किसने और कहाँ से एक्सेस किया, इसका पूरा डिजिटल रिकॉर्ड (लॉग) रखा जाए ताकि जवाबदेही तय हो सके।
तीसरा कदम प्रशासनिक एवं परीक्षा संचालन में सुधार चरणबद्ध ऑनलाइन परीक्षाएं : बड़ी परीक्षाओं (जैसे नीट या बड़ी भर्ती परीक्षाएं) को एक ही दिन कराने के बजाय जेईई मेन्स की तरह कंप्यूटर आधारित टेस्ट के माध्यम से कई सत्रों में आयोजित किया जाए।सुरक्षित प्रिंटिंग कमांड: परीक्षा केंद्रों पर ही हाई-स्पीड बायोमेट्रिक प्रिंटर लगे हों और परीक्षा से कुछ मिनट पहले 'ऑन-डिमांड' प्रिंट कमांड देकर पेपर निकाला जाए।विश्वसनीय पेपर सेटर्स (इंटरनल सिक्योरिटी): आईआईटी मद्रास के निदेशक वी कामाकोटी (पीएम टास्क फोर्स एक्सपर्ट) के अनुसार, लीक अक्सर 'सोर्स' (पेपर बनाने वालों) से ही हो जाता है। इसलिए, प्रश्न पत्र बनाने वाले और उसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की कड़ी पृष्ठभूमि जांच और गोपनीयता अनिवार्य होनी चाहिए।
चौथा कदम सख्त कानूनी और संस्थागत उपाय त्वरित अदालतें और स्पेशल टास्क फोर्स: पेपर लीक मामलों की जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स का गठन हो और फास्ट-ट्रैक अदालतों के जरिए दोषियों को तुरंत सजा मिले।सर्विस प्रोवाइडर्स पर शिकंजा: परीक्षा आयोजित कराने वाली निजी कंपनियों और परीक्षा केंद्रों को गड़बड़ी पाए जाने पर हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए और उनकी संपत्ति जब्त की जाए। योग्यता-आधारित रोजगार व्यवस्था डिग्री के बजाय स्किल टेस्ट: यदि सरकारी और निजी नौकरियों में भर्ती का आधार केवल एक लिखित परीक्षा या डिग्री न होकर व्यावहारिक योग्यता, कौशल परीक्षण और प्रोजेक्ट पोर्टफोलियो हो, तो एकल परीक्षा का दबाव और उसमें धोखाधड़ी करने की होड़ अपने आप कम हो जाएगी।
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