शहरों की बसाहट के पीछे विलुप्त होती मूल ग्रामीण संस्कृती

बिगड़ता सामाजिक संतुलन

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विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने कहा है कि अनियोजित शहरीकरण आर्थिक अवसर तो देता है,लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों का संतुलित विकास नहीं किया जाए तो सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण अपरिहार्य हो जाता है। भारत में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का भी परिवर्तन है।

शहरों की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारंपरिक रीति-रिवाज कमजोर पड़ रहे हैं और लोककलाएँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर कहा है, "भारत का विकास तभी संभव है जब गाँवों का विकास होगा।" उनकी 'आत्मनिर्भर भारत', 'डिजिटल इंडिया', 'स्मार्ट विलेज' और 'वाइब्रेंट विलेज' जैसी अवधारणाएँ इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों को आधुनिक सुविधाएँ मिलें, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने "पूरा मॉडल" जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधा उपलब्ध करने की बात कही में स्पष्ट कहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शहर जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ ताकि लोगों को पलायन के लिए विवश न होना पड़े। उनका विश्वास था कि यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक गाँवों तक पहुँचेगी, तो भारत का संतुलित विकास संभव होगा।

भारत को सदियों से गाँवों का देश कहा जाता रहा है। गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता की जीवंत प्रयोगशाला रहे हैं। कभी गाँवों की चौपालें संवाद का केंद्र थीं, खेत-खलिहान जीवन का आधार थे, लोकगीत और लोकनृत्य संस्कृति की पहचान थे, और आपसी सहयोग जीवन की सबसे बड़ी पूँजी था। किंतु पिछले कुछ दशकों में तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण और आर्थिक अवसरों की तलाश ने ग्रामीण संस्कृति की जड़ों को कमजोर कर दिया है।

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शहरों का लगातार विस्तार गाँवों की जमीन ही नहीं, उनकी आत्मा को भी अपने भीतर समेटता जा रहा है। महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।" यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यदि गाँव अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देंगे, तो भारत की मौलिक पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाएगी। प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी सार्थक है जब वह आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को भी समान महत्व दे। केवल शहरों में विकास केंद्रित होने से असमानता बढ़ती है और ग्रामीण समाज अपनी मौलिकता खोने लगता है।

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि "मजबूत गाँव ही मजबूत भारत की नींव हैं।" यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि केवल महानगरों का विकास किसी राष्ट्र को समृद्ध नहीं बना सकता।ग्रामीण संस्कृति केवल खेती तक सीमित नहीं है। यह लोकभाषाओं, लोकसंगीत, हस्तशिल्प, पारंपरिक कृषि ज्ञान, सामुदायिक जीवन, प्रकृति के प्रति सम्मान और मानवीय संबंधों की संस्कृति है। जब गाँव शहरों में बदलते हैं, तब खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल उग आते हैं। तालाब मिट जाते हैं, चौपालें समाप्त हो जाती हैं और बच्चों के खेल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो जाते हैं। अर्थशास्त्री ई. एफ. शूमाकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "स्माल इस ब्यूटीफुल" में लिखा था कि विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को अधिक मानवीय बनाना होना चाहिए। यदि विकास मनुष्य को उसकी संस्कृति और प्रकृति से दूर कर दे, तो वह अधूरा विकास है।

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विकास और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित किया जाने की नितांत आवश्यकता है । गाँवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, इंटरनेट, उद्योग, कृषि प्रसंस्करण, कुटीर उद्योग, पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ। साथ ही लोककलाओं, लोकभाषाओं, लोकपर्वों और पारंपरिक ज्ञान को विद्यालयों और सामाजिक जीवन में सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020-21 भी भारतीय भाषाओं, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर विशेष बल देती है। यदि शिक्षा अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगी, तो नई पीढ़ी आधुनिक भी बनेगी और अपनी सांस्कृतिक पहचान भी नहीं भूलेगी।

आज अनेक गाँव शहरों के विस्तार में समाहित होकर अपनी पहचान खो चुके हैं। वहाँ अब खेतों की जगह कॉलोनियाँ हैं, बैलगाड़ियों की जगह वाहनों की भीड़ है, और लोकगीतों की जगह शोरगुल ने ले ली है। आधुनिकता का विरोध नहीं किया जा सकता, लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना भी नहीं होना चाहिए। अंततः यह समझना होगा कि शहर किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति हो सकते हैं, लेकिन गाँव उसकी सांस्कृतिक चेतना हैं। यदि आर्थिक विकास की दौड़ में ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आधुनिक तो होंगी, किंतु अपनी पहचान से अनभिज्ञ रह जाएँगी।

इसलिए आवश्यक है कि विकास की प्रत्येक योजना में ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। शहरों का विस्तार हो, पर गाँवों की आत्मा सुरक्षित रहे। यही संतुलित विकास भारत को आर्थिक रूप से समृद्ध, सांस्कृतिक रूप से सशक्त और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण राष्ट्र बनाएगा। आखिरकार, जिस देश के गाँव जीवित रहते हैं, वही देश अपनी सभ्यता को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाता है।

संजीव ठाकुर

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