मुफ्त दवा योजना पर संकट नहीं समाधान की जरूरत
जीवनरक्षक दवाओं की कमी गरीब मरीजों के लिए गंभीर चुनौती लेकिन समय रहते व्यवस्था सुधारकर सरकार भरोसा फिर मजबूत कर सकती है
राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित सवाई मानसिंह (एसएमएस) अस्पताल केवल एक चिकित्सा संस्थान नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के लाखों मरीजों की उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र है। हर दिन हजारों मरीज दूर-दराज के गांवों और कस्बों से यहां इस विश्वास के साथ पहुंचते हैं कि उन्हें बेहतर इलाज के साथ सरकार की निशुल्क दवा योजना का लाभ मिलेगा। लेकिन जब इलाज के बाद डॉक्टर की लिखी दवाएं अस्पताल के काउंटर पर उपलब्ध नहीं होतीं तो मरीज और उसके परिजनों की चिंता कई गुना बढ़ जाती है। हाल के दिनों में जीवनरक्षक दवाओं सहित बड़ी संख्या में दवाओं की अनुपलब्धता की खबरें सामने आई हैं। यह स्थिति निश्चित रूप से चिंता का विषय है और इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
गरीब और मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहता है। निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदना हर परिवार के लिए आसान नहीं होता। विशेष रूप से कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों के लिए नियमित दवाएं जीवन का आधार होती हैं। यदि ऐसी दवाएं समय पर नहीं मिलें तो बीमारी बढ़ सकती है और आर्थिक बोझ भी कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि निशुल्क दवा योजना को राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण जनकल्याणकारी योजनाओं में गिना जाता है।
जयपुर के एसएमएस अस्पताल में जिन मरीजों को एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भेजा गया, कई दिनों बाद आने के लिए कहा गया या फिर बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी गई, उनकी परेशानी को सहज रूप से समझा जा सकता है। जो मरीज सैकड़ों किलोमीटर दूर से किराया खर्च करके अस्पताल पहुंचता है, उसके लिए केवल दवा ही नहीं बल्कि दोबारा आने-जाने का खर्च भी बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे मरीजों के सामने यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वह इलाज कराए या परिवार का खर्च चलाए।
यह भी सच है कि यह समस्या केवल जयपुर तक सीमित नहीं दिखाई देती। प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में समय-समय पर कुछ दवाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं सप्लाई में देरी होती है तो कहीं खरीद प्रक्रिया पूरी होने तक मरीजों को इंतजार करना पड़ता है। इससे सरकार की अच्छी योजनाओं की छवि प्रभावित होती है। जनता यह नहीं देखती कि कमी किस स्तर पर हुई है। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि अस्पताल पहुंचने पर दवा मिलनी चाहिए।
हालांकि इस पूरे विषय को केवल आलोचना के दृष्टिकोण से देखना भी उचित नहीं होगा। राजस्थान सरकार ने पिछले कई वर्षों में चिकित्सा सुविधाओं का उल्लेखनीय विस्तार किया है। नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना, जिला अस्पतालों का सुदृढ़ीकरण, मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना और निशुल्क जांच योजना जैसी पहल ने लाखों गरीब परिवारों को राहत दी है। यदि ये योजनाएं नहीं होतीं तो गरीब मरीजों का इलाज और भी कठिन हो जाता। इसलिए यह कहना उचित होगा कि योजना में कमी नहीं है बल्कि उसके क्रियान्वयन के कुछ हिस्सों में सुधार की आवश्यकता है।
अस्पताल प्रशासन का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि कुछ दवाएं राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड से उपलब्ध नहीं हो पातीं तो स्थानीय स्तर पर खरीद की जाती है। कई बार आपूर्ति करने वाली कंपनियों की ओर से विलंब होने के कारण अस्थायी समस्या उत्पन्न हो जाती है। यदि वास्तव में ऐसा है तो इसका समाधान भी प्रशासनिक स्तर पर संभव है। दवाओं की उपलब्धता का नियमित आकलन, समय रहते नई खरीद प्रक्रिया और वैकल्पिक व्यवस्था से इस प्रकार की कठिनाइयों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था जितनी बड़ी होती है, चुनौतियां भी उतनी ही अधिक होती हैं। राजस्थान जैसे विशाल राज्य में करोड़ों लोगों को निशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना आसान कार्य नहीं है। दवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है और कई बार अनुमान से अधिक मरीज आने के कारण स्टॉक जल्दी समाप्त हो जाता है। इसलिए इस समस्या को केवल लापरवाही कह देना भी पूरी तस्वीर नहीं दर्शाता। आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल प्रशासन और दवा आपूर्ति एजेंसियां मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिससे आवश्यक दवाओं का भंडार हमेशा सुरक्षित रहे।
तकनीक का बेहतर उपयोग भी इस दिशा में बड़ा समाधान बन सकता है। यदि सभी सरकारी अस्पतालों में दवाओं का ऑनलाइन स्टॉक रियल टाइम अपडेट हो तो यह पहले ही पता चल जाएगा कि कौन सी दवा कितनी मात्रा में बची है और कब नई खेप की आवश्यकता होगी। इससे आपूर्ति में होने वाली देरी को काफी हद तक रोका जा सकता है। मरीजों को भी मोबाइल या हेल्पलाइन के माध्यम से यह जानकारी मिल सके कि संबंधित दवा किस अस्पताल में उपलब्ध है। इससे उन्हें अनावश्यक चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
साथ ही अस्पतालों में मरीजों के साथ संवाद की व्यवस्था भी बेहतर होनी चाहिए। यदि किसी दवा की अस्थायी कमी है तो मरीज को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि दवा कब तक उपलब्ध होगी या उसका सुरक्षित विकल्प क्या है। कई बार जानकारी के अभाव में मरीज अधिक परेशान हो जाता है। संवेदनशील व्यवहार और स्पष्ट सूचना भी आधी समस्या का समाधान कर देती है।
इस विषय में जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर समस्याओं की जानकारी सरकार तक पहुंचानी चाहिए। जहां भी दवा की कमी हो, वहां तत्काल समाधान के लिए प्रयास होने चाहिए। स्वास्थ्य सेवा राजनीति का नहीं बल्कि मानवता का विषय है। इसलिए सभी पक्षों को मिलकर काम करना चाहिए।
सरकार के सामने यह अवसर भी है कि वह इस घटना को एक चेतावनी के रूप में लेकर पूरे प्रदेश में दवा आपूर्ति व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करे। जिन अस्पतालों में जीवनरक्षक दवाओं की कमी है वहां तत्काल अतिरिक्त स्टॉक भेजा जाए। खरीद प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी तथा तेज बनाया जाए। जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होती है, वहां जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए। इससे जनता का विश्वास और मजबूत होगा।
अंततः किसी भी कल्याणकारी सरकार की पहचान केवल योजनाएं बनाने से नहीं बल्कि उन्हें अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने से होती है। राजस्थान की निशुल्क दवा योजना लाखों लोगों के लिए वरदान रही है और इसे और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है। यदि दवाओं की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित हो जाए तो गरीब मरीजों को न तो जेब से खर्च करना पड़ेगा और न ही इलाज अधूरा छोड़ने की मजबूरी होगी।
सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनेक सकारात्मक कदम उठाए हैं और उनका लाभ भी समाज को मिला है। अब आवश्यकता इस बात की है कि दवा आपूर्ति से जुड़ी कमियों को शीघ्र दूर किया जाए ताकि कोई भी मरीज केवल दवा की अनुपलब्धता के कारण पीड़ा न झेले। एक संवेदनशील और उत्तरदायी स्वास्थ्य व्यवस्था ही विकसित राजस्थान की पहचान बनेगी, जहां इलाज के साथ भरोसा भी हर मरीज को समान रूप से प्राप्त हो।
कांतिलाल मांडोत
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