ये कैसा युद्धविराम?

लग रहा था कि अब सब कुछ ठीक हो रहा है, सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है। दुनिया पटरी पार आ रही है लेकिन तभी तनाव और बढ़ा, इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध फिर से शुरू हो गया। दुनिया के लोग डरे हैं कि अब आगे क्या होगा।

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युद्धविराम का उद्देश्य किसी भी संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में आगे बढ़ना होता हैलेकिन जब युद्धविराम के कुछ ही समय बाद गोलियां और मिसाइलें फिर चलने लगें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कैसा युद्धविराम था। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। मध्य-पूर्व पहले से ही अस्थिरता का केंद्र रहा है और अब दोनों देशों के बीच फिर से शुरू हुई सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीतिऊर्जा सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। हालिया घटनाक्रम में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम तोड़ने का आरोप लगाया है और सैन्य अभियान दोबारा शुरू होने की पुष्टि भी की है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सका। परमाणु कार्यक्रमप्रतिबंधों में राहतहोरमुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे। समझौते में कई बिंदु ऐसे थे जिनकी व्याख्या दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से कर रहे थे। यही कारण रहा कि कुछ ही सप्ताह में तनाव दोबारा बढ़ गया। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया तथा उसकी सैन्य गतिविधियां लगातार जारी रहीं। दोनों देशों के इन आरोपों ने विश्वास की बची-खुची नींव भी कमजोर कर दी। होरमुज़ जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र- दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होरमुज़ जलडमरूमध्य इस विवाद का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित करता है। हालिया घटनाओं के बाद इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैंजिससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता देखने को मिली। पूरी दुनिया पर असर- अमेरिका और ईरान का संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे मध्य-पूर्व पर पड़ता है। खाड़ी देशों की सुरक्षाअंतरराष्ट्रीय व्यापारऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था सभी इस तनाव से प्रभावित होती हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल आयात पर निर्भर देशोंविशेषकर भारत जैसे देशों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। युद्धविराम के बाद अपेक्षा थी कि दोनों देश बातचीत के जरिए स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन बढ़ते अविश्वास और लगातार सैन्य कार्रवाई ने वार्ता की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत फिर शुरू करने की अपील की हैहालांकि फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश केवल सैन्य जवाब देने की नीति अपनाते रहे तो संघर्ष और व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर यदि मध्यस्थ देशों के प्रयास सफल होते हैं तो फिर से बातचीत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि स्थायी शांति का रास्ता अभी भी काफी कठिन है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुई सैन्य कार्रवाई यह दिखाती है कि केवल युद्धविराम की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। जब तक मूल विवादों का समाधान नहीं होगातब तक किसी भी समझौते की स्थिरता संदिग्ध रहेगी। आज आवश्यकता केवल हथियारों को रोकने की नहींबल्कि विश्वास बहालीप्रभावी कूटनीति और दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान की है। अन्यथा हर युद्धविराम कुछ समय बाद एक नए युद्ध की प्रस्तावना बनता रहेगा।

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