​सनातन संस्कृति में कठिन व्रतों का भार महिलाओं पर ही क्यों?

​इस प्रश्न का उत्तर हमारी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था में भी निहित है।

हर्षिता यादव  Picture
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लेखक: प्रो. (डा.) मनमोहन प्रकाश
 
​सनातन संस्कृति में व्रत और उपवास केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये श्रद्धा, आत्मसंयम, त्याग और पारिवारिक मंगलकामना के गहरे प्रतीक हैं। करवा चौथ, हरतालिका तीज, वट सावित्री, जीवित्पुत्रिका (जिउतिया), अहोई अष्टमी और छठ जैसे पर्वों पर महिलाएँ कठिन नियमों का पालन (निर्जला तक) करते हुए व्रत रखती हैं। कहीं पति की दीर्घायु की कामना है, तो कहीं संतान की सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण का संकल्प है तो कहीं प्रकृति का सम्मान। इन परंपराओं के बीच एक प्रश्न सहज ही उठता है—आखिर सनातन संस्कृति में कठिन व्रतों का भार मुख्यतः महिलाओं पर ही क्यों है?
 
​इस प्रश्न का उत्तर हमारी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था में भी निहित है। भारतीय समाज में परिवार की सुख-शांति, पोषण और आपसी संबंधों को बनाए रखने की धुरी पारंपरिक रूप से महिलाओं को माना गया है। इसी सामाजिक भूमिका के साथ धीरे-धीरे कई व्रत और अनुष्ठान जुड़ते चले गए। समय के बीतने के साथ-साथ श्रद्धा, पारिवारिक अपेक्षाओं और सामाजिक मान्यताओं ने इन परंपराओं को इतना मजबूत कर दिया कि कई व्रत केवल धार्मिक आस्था न रहकर महिलाओं के लिए एक सामाजिक दायित्व भी बन गए।
 
​इसका एक बेहतरीन उदाहरण छठ पर्व है। सूर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाला यह महापर्व लोक-आस्था, अनुशासन और सामूहिक सहभागिता का अनुपम प्रतीक है। इसमें व्रती कई दिनों तक कठिन नियमों का पालन करते हैं और निर्जला उपवास जैसे कठिन अनुशासन से गुजरते हैं। यद्यपि आज समाज में पुरुष भी बढ़-चढ़कर छठ का व्रत रख रहे हैं, फिर भी परिवारों में महिलाओं की केंद्रीय भागीदारी आज भी विशेष रूप से दिखाई देती है। यह पर्व केवल व्यक्तिगत साधना का नहीं, बल्कि प्रकृति, परिवार और समाज के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व का एक सशक्त संदेश देता है।
​तथ्य यह भी है कि सनातन परंपरा में तपस्या और उपवास का एकाधिकार केवल महिलाओं के पास नहीं है। पुरुष भी एकादशी, महाशिवरात्रि, प्रदोष और अन्य धार्मिक अवसरों पर पूरे नियम-निष्ठा के साथ उपवास रखते हैं,पर वे उतने कठोर नहीं है। फिर भी, पति की दीर्घायु और संतान के कल्याण के लिए महिलाओं से विशेष रूप से व्रत रखने की जो अपेक्षा की जाती है, उस पर आज पुनर्विचार आवश्यक है। यदि एक पत्नी अपने जीवनसाथी के मंगल के लिए उपवास करती है, तो क्या यह उचित नहीं कि पति भी पत्नी के स्वास्थ्य, सम्मान और दीर्घायु के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता और सहभागिता प्रदर्शित करे? आखिर परिवार के प्रति प्रेम और उत्तरदायित्व किसी एक का नहीं, बल्कि दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
 
​व्रत तभी सार्थक और आनंददायी है, जब वह स्वेच्छा, श्रद्धा , विश्वास और अतंर-आत्मा की आवाज पर किया जाए। यदि किसी महिला पर पारिवारिक एवं सामाजिक दबाव हो या उसके मन में यह भय बैठा दिया जाए कि व्रत न रखने से परिवार पर कोई संकट आ जाएगा, तो आस्था के साथ अनावश्यक भय और अपराधबोध जुड़ जाता है। जबकि धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को मानसिक संबल देना है, न कि उसे भयभीत करना। इसके अलावा, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, आयु और जीवन-परिस्थितियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।
 
​सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत इसकी जीवंतता, उदारता और निरंतर आत्ममंथन की क्षमता रही है। परंपराओं का पूर्ण सम्मान करते हुए उनमें निहित प्रेम, त्याग और मंगलकामना के भाव को स्त्री-पुरुष दोनों के जीवन में समान रूप से उतारना ही आज के समय की माँग है। यह हर्ष का विषय है कि आज के आधुनिक युग में कई जोड़े इन परंपराओं को आपसी सहभागिता और साझा संकल्प के रूप में अपना रहे हैं।
 
​व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भूखे रहना या उपवास करना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों पर संयम, समाज में सद्भाव और पारिवारिक आत्मीयता को मजबूत करना है। जब आस्था के साथ समानता जुड़ेगी, त्याग के साथ सहभागिता होगी और परंपरा के साथ विवेक का तालमेल बैठेगा, तभी इन व्रतों का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश आज के समाज में और अधिक व्यापक व सार्थक हो सकेगा।

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