विश्व में भारत की आवाज के संवाहक ' राजदूत '
1946 में पहली बार भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का चयन हुआ
सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
हर वर्ष 9 अक्टूबर को भारतीय विदेश सेवा दिवस मनाया जाता है। 1946 में इसी दिन विदेश सेवा की औपचारिक स्थापना हुई थी। स्वतंत्रता से कुछ माह पूर्व पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच थी कि स्वतंत्र भारत को विश्व में अपनी बात कहने के लिए ऐसे युवाओं की आवश्यकता होगी जो भारत की सभ्यता को जानते हों, संविधान को समझते हों और विश्व मंच पर भारत का पक्ष तर्क और गरिमा के साथ रख सकें। उसी सोच से भारतीय विदेश सेवा का जन्म हुआ।आज 78 वर्षों बाद भारतीय विदेश सेवा केवल एक नौकरी नहीं, भारत की वैश्विक पहचान बन चुकी है। अंग्रेजों के समय में भी विदेश विभाग था, पर वह ब्रिटिश हितों के लिए कार्य करता था। 1946 में पहली बार भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का चयन हुआ।
पहले बैच में 8 अधिकारी थे। उनमें के.पी.एस. मेनन प्रथम विदेश सचिव बने। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि विश्व में स्वयं को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित करना। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का प्रश्न, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव, राष्ट्रमंडल में भारत की भूमिका आदि। इन सभी में प्रारंभिक विदेश सेवा अधिकारियों ने अपनी योग्यता सिद्ध की। विजयलक्ष्मी पंडित जब संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं तो वह भारतीय विदेश नीति की ही विजय थी। सामान्य धारणा है कि विदेश सेवा अधिकारी केवल विदेश में रह कर दावतों में जाते हैं। यह सबसे बड़ी भ्रांति है।
विदेश सेवा के कार्यों को चार भागों में समझा जा सकता है। पहला राजनीतिक कार्य ; विदेश में भारत के हितों की रक्षा करना, द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना, वार्ता करना, समझौते करवाना। जब भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ, जब भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिली, तब पर्दे के पीछे महीनों तक विदेश सेवा के अधिकारियों ने ही कार्य किया था। दूसरा आर्थिक और वाणिज्यिक कार्य ; भारतीय कंपनियों को विदेश में निवेश दिलाना, विदेशी निवेश को भारत लाना, व्यापारिक विवादों को सुलझाना। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय श्रमिक कार्य करते हैं, उनकी नौकरियों की सुरक्षा विदेश सेवा ही करती है।
तीसरे सांस्कृतिक और जनसंपर्क ; योग, आयुर्वेद, हिन्दी, बॉलीवुड, बौद्ध परंपरा इन सब को विश्व में ले जाना। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के माध्यम से विदेशों में भारतीय महोत्सव आयोजित करना, प्रवासी भारतीयों को भारत से जोड़ना। चौथा संकट में सहायता , जब भी विश्व में कोई संकट आता है, तब भारतीय विदेश सेवा सबसे पहले सक्रिय होती है। ऑपरेशन गंगा, यूक्रेन से 22 हजार भारतीयों की वापसी, ऑपरेशन कावेरी, सूडान से वापसी, ऑपरेशन देवी शक्ति, अफगानिस्तान से वापसी, वंदे भारत अभियान, कोरोना काल में 60 लाख भारतीयों की वापसी, इन सभी के पीछे विदेश सेवा के अधिकारियों की निर्बाध योजना थी।
लखनऊ के कई छात्र जो यूक्रेन में फँसे थे, वे आज अपने परिवार में हैं तो उसके पीछे किसी दूतावास के अधिकारी की रात भर की जाग रही आँखें हैं। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले युवाओं में से कुछ ही विदेश सेवा में आते हैं। उसके बाद मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री अकादमी में बुनियादी प्रशिक्षण, फिर दिल्ली के सुषमा स्वराज विदेश सेवा संस्थान में डेढ़ वर्ष का गहन प्रशिक्षण।
यहाँ उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून, राजनय, अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र, विदेशी भाषा, सैन्य इतिहास पढ़ाया जाता है। हर अधिकारी को एक अनिवार्य विदेशी भाषा सीखनी होती है , अरबी, चीनी, फ्रांसीसी, रूसी, जापानी आदि। फिर वह उस देश में भेजा जाता है जहाँ उस भाषा का प्रयोग होता है। एक अधिकारी को अपने 30-35 वर्ष के कार्यकाल में 10 से 12 देशों में कार्य करना होता है, हर तीन वर्ष में देश बदलता है, हर बार नई भाषा, नई संस्कृति, नया समाज। इतने परिवर्तन में भी स्वयं को भारतीय बनाए रखना, यही सबसे बड़ी साधना है।
भारतीय विदेश सेवा ने भारत को कई प्रेरणादायक रत्न दिए हैं। जैसे, के.आर. नारायणन , विदेश सेवा से निकल कर भारत के राष्ट्रपति बने। हरिवंश राय बच्चन के पुत्र नहीं, परन्तु विदेश सेवा में रहे कई लेखक, जैसे लेखक-समीक्षक अभय कुमार जिन्होंने पृथ्वी को कविता में पिरोया। निरुपमा राव , भारत की द्वितीय महिला विदेश सचिव, जिन्होंने अमेरिका में भारत की छवि को नई ऊँचाई दी। एस. जयशंकर , आज के विदेश मंत्री, जो स्वयं विदेश सेवा के अधिकारी रहे हैं और जिन्होंने विदेश नीति को जन-जन की नीति बना दिया है। पहले विदेश नीति को दिल्ली के साउथ ब्लॉक तक सीमित माना जाता था। आज वह किसान तक पहुँच गई है।
जब खाड़ी देशों में अनाज निर्यात होता है, जब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमला होता है, जब अमेरिका में एच-1बी वीज़ा की नीति बदलती है , तब विदेश सेवा सीधे सामान्य नागरिक के जीवन को प्रभावित करती है। पिछले दस वर्षों में विदेश सेवा ने तीन बड़े परिवर्तन किए हैं । पहला, प्रवासी भारतीयों को केंद्र में लाना। आज पासपोर्ट सेवा सहज हो गई है, दूतावास 24 घंटे सहायता के लिए उपलब्ध हैं। ट्विटर पर एक संदेश पर दूतावास सहायता करता है। दूसरा, आर्थिक कूटनीति। अब राजदूत केवल राजनीतिक संदेश नहीं देते, वे भारत में निवेश भी लाते हैं। तीसरा, सांस्कृतिक कूटनीति।
योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र में 177 देशों का समर्थन दिलाना, यह केवल सरकार की जीत नहीं, हमारे राजदूतों की महीनों की मेहनत थी। विदेश सेवा की राह फूलों की नहीं है बल्कि इसमें चुनौतियां भी महत्वपूर्ण हैं। एक छोटा संवर्ग है ,लगभग 900 अधिकारी ही हैं, जबकि चीन में 6000 और अमेरिका में 15000 से अधिक। संसाधन कम हैं, चुनौती बड़ी है। परिवार से दूर रहना, बच्चों की शिक्षा बदलते देश में करवाना, सुरक्षा का खतरा झेलना , यह सब इनके जीवन का हिस्सा है। कई बार दूतावास पर हमले भी होते हैं, जैसे अफगानिस्तान में। फिर भी अधिकारी डटे रहते हैं। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि आईएफएस का अर्थ भारतीय वन सेवा भी है, जो 1966 में बनी और पर्यावरण संरक्षण का कार्य करती है।
परन्तु 9 अक्टूबर को मनाया जाने वाला दिवस भारतीय विदेश सेवा का है। दोनों ही सेवाएँ भारत की धरोहर हैं । एक भारत की सीमाओं के भीतर वनों की रक्षा करती है, दूसरी सीमाओं के बाहर भारत की प्रतिष्ठा की रक्षा करती है। भारतीय विदेश सेवा दिवस हमें याद दिलाता है कि आज जब भारत विश्व में पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, जब चंद्रमा पर हमारा झंडा है, जब विश्व की हर बड़ी मेज पर भारत की कुर्सी है, तो उसके पीछे उन 900 अधिकारियों और उनके हजारों सहयोगियों की तपस्या है जो बिना किसी शोर के भारत के तिरंगे को विदेशी धरती पर ऊँचा रखते हैं।
एक राजदूत जब किसी विदेशी राष्ट्रपति के सामने अपनी पहचान पत्र प्रस्तुत करता है तो वह केवल अपना परिचय नहीं देता, वह 140 करोड़ भारतीयों का परिचय देता है। इस दिवस पर हम उन सभी राजनयिकों को नमन करें जो लखनऊ की गोमती के किनारे से लेकर न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र तक भारत की आवाज को एक ही गरिमा के साथ पहुँचाते हैं । वह है "वसुधैव कुटुंबकम" की आवाज।
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