भारतीय किसान की दशा और दिशा .....
किसान का आज हाल-बेहाल है।वह हाथ फैलाने वाला भिक्षुक बनकर रह गया है।उसको कोई देखने वाला नहीं
भारतीय किसान की दशा और दिशा .
लेखिका डॉक्टर ज्ञानवती दीक्षित
जब भारतीय किसान की दशा देखती हूं,तब ये पंक्तियां मन में कौंध जाती हैं-
"सब कहाँ दुनिया में हो पाए फ़क़ीर
कुछ फ़क़त सुलतान हो कर रह गए।"(राजेश रेड्डी)
वह किसान ,जो देश का अन्नदाता था,जिसके घर की समृद्धि और अन्न-धन देखकर जयशंकर प्रसाद जी के "तितली"उपन्यास में जमींदार चकित होकर सिर झुका लेता था,वह किसान आज समस्याओं के मकड़जाल में फंसकर रह गया है।जिसकी हालत देखकर अवधी कवि रो उठा -
"
चौराहे पर ठाड़ किसनऊ
द्याखैं चारिउ वार
देस का को है जिम्मेदार?"
वह किसान ,जिसके लिए महान कवि केदारनाथ अग्रवाल जी ने कहा था -
"यह धरती है उस किसान की
जो बैलों के कंधों पर
बरसात घाम में,
जुआ भाग्य का रख देता है,
खून चाटती हुई वायु में,
पैनी कुसी खेत के भीतर,
दूर कलेजे तक ले जा कर,
जोत डालता है मिट्टी को,
पांस डाल कर,
और बीज फिर बो देता है
नये वर्ष में नयी फसल के
ढेर अन्न का लग जाता है।
यह धरती है उस किसान की।"
उस किसान का आज हाल-बेहाल है।वह हाथ फैलाने वाला भिक्षुक बनकर रह गया है।उसको कोई देखने वाला नहीं।
ब्रिटेन के चर्चित अखबार "द इकोनॉमिस्ट" ने 21 फरवरी, 2004 में देश के हिन्दी पट्टी राज्यों पर एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था "एन एरिया ऑफ डार्कनेस"। इस रिपोर्ट में कुछ बड़े राज्यों को भारत भूभाग के चित्र में एक अंधेरे धब्बे के रूप में रेखांकित किया गया था।
मैंने जब इस रिपोर्ट को गहराई से पढ़ा,तो पाया कि इस रिपोर्ट में कुछ बड़े राज्यों को भारत के सर्वाधिक पिछड़े, सर्वाधिक गरीब, सर्वाधिक ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था, अति भ्रष्ट और अकुशल प्रशासनिक व्यवस्था, चिंताजनक कानून व्यवस्था वाले एक अंधेरे धब्बेनुमा इलाके के रूप में तो विश्लेषित किया ही गया था, इसके भविष्य को लेकर भी यह कह कर आशंकाएं व्यक्त की गई थी कि यहां के लोग अपने को देश के सबसे अधिक पिछड़े, सबसे अधिक गरीब लोगों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं और प्रशासनिक महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार, शैक्षिक क्षेत्र में व्याप्त अराजकता और भ्रष्टाचार आदि को सामान्य मान कर जीने लगे हैं और उस के आदी हो चुके हैं। "कोई नृप होय हमैं का हानी "की तर्ज पर उनमें राजनीतिक परिवर्तन की भूख समाप्त हो चुकी है ,क्योंकि जो भी सत्ता में आता है,पहले से बदतरीन साबित होता है।उनकी समस्याएं कभीसमाप्त नहीं होतीं। बाढ़ हर साल आती है। कोई योजना नहीं।सूखा अक्सर भी पड़ता ही रहता है। जिम्मेदार सोए रहते हैं।बाढ़ उनकी फसलें बहा ले जाती है और सूखा उनको सुखा कर चला जाता है। राहतें अफसरों और नेताओं के पेट में समा जाती हैं। राजनेताओं में ऐसी इच्छाशक्ति का घोर अभाव है जो किसी समुदाय या किसी क्षेत्र के गुणात्मक विकास के लिए आवश्यक तत्व है। उनके दिलोदिमाग में भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट अफसरों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कब्र बन चुके अपने शैक्षिक संस्थानों के खिलाफ कोई प्रतिरोध की भावना जन्म नहीं लेती, क्योंकि वे मान कर चलते हैं कि हम सबकी यही गति है। इस गतिरोध को समाप्त करने का उनके दिमाग में कोई रास्ता नहीं बचा।
हमारे देश को मालूम है कि यहां भारतीय किसान चाहे जिस हाल में रहेगा, भूख और गरीबी से बिलबिलाते हमारे महानगरों में रिक्शा चलाने, फर्श पर झाड़ू पोंछा लगाने, गेट पर गार्ड के रूप में खड़ा रहने, फैक्ट्रियों में मजदूरी आदि करने के लिए आएगा । उनकी गृहलक्ष्मियां घरों में रोजगार तलाशेंगी।भूख से बिलबिलाते बच्चों का पेट तो भरना ही होगा।भ्रष्ट राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र कैसी प्रशासनिक संरचना का निर्माण करेगा,वे जानते हैं।यही हालात देखकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा था -
"हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है।
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है।
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ?
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ।
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में।
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में।
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा।
है चल रहा सन- सन पवन, तन से पसीना बह रहा।
देखो कृषक शोणित सुखाकर हल तथापि चला रहे।
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे।
घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा।
घर से निकलने को गरज कर, वज्र तर्जन कर रहा।
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं।
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं
बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है।
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है।
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते।
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते।
सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है।
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है।
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है।
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है।"
आज पूरे देश को यह सोचना है । न जाने कितने भ्रष्ट राजनीतिक नेता और नेत्रियां और अफसर भी शिक्षा और कृषि क्षेत्रों में बड़े पदों पर काबिज हैं। उनकी रिपोर्ट अगर मीडिया छाप दे, तो लोगों की आँखें फटी की फटी रह जाएं उनकी कारगुजारियों की खबरें पढ़ कर। अफसर तो राजा हरिश्चंद्र के डोम से आगे हो चुके हैं।वे कर नहीं सीधे कफ़न मांगते हैं। इस गतिरोध को समाप्त करने का उनके दिमाग में कोई रास्ता नहीं बचा।
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में।
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा।
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा।
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे।
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे।
घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा।
घर से निकलने को गरज कर, वज्र गर्जन कर रहा।
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं।
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं
बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है।
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है।
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते।
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते।
सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है।
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है।
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है।
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है।"
आज पूरे देश को यह सोचना है । न जाने कितने भ्रष्ट राजनीतिक नेता और नेत्रियां और अफसर भी शिक्षा और कृषि क्षेत्रों में बड़े पदों पर काबिज हैं। उनकी रिपोर्ट अगर मीडिया छाप दे, तो लोगों की आँखे फटी रह जाएं उनकी कारगुजारियों की खबरें पढ़ कर। अफसर तो राजा हरिश्चंद्र के डोम से आगे हो चुके हैं।वे कर नहीं, सीधे कफ़न बेच सकते हैं।
आज आजादी के इतने साल बाद भी हालात वही हैं।भ्रष्ट राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र कैसी प्रशासनिक संरचना का निर्माण करेगा?आज पूरे देश को यह सोचना है । न जाने कितने भ्रष्ट राजनीतिक नेता और नेत्रियां और अफसर भी शिक्षा और कृषि क्षेत्रों में बड़े पदों पर काबिज हैं। उनकी रिपोर्ट अगर मीडिया छाप दे, तो लोगों की आँखे फटी रह जाएं उनकी कारगुजारियों की खबरें पढ़ कर। अफसर तो राजा हरिश्चंद्र के डोम से आगे हो चुके हैं।वे कर नहीं, सीधे कफ़न बेच सकते हैं।
भारत में किसानों की दशा अत्यंत ही खराब हो गई है। बाढ़ ने वर्तमान में उनकी रीढ़ तोड़ दी है।सरकार कुछ मदद नहीं कर पा रही। उनको जो मदद है भी,वह ऊंट के मुंह में जीरा है बस। यही कारण है दिन प्रतिदिन किसान कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं।
इन्हीं हालातों के चलते कृषि और किसानों की हालत दिनों-दिन बदतर होती जा रही हैं जिसके कारण अनेक किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो जा रहे हैं. भारत में आज भी 60% से 70% लोग कृषि पर निर्भर हैं। इस समस्या को हर सरकार जानती है, पर उसके पास उचित समाधान नही है या इच्छा शक्ति का अभाव है।भारतीय किसानों की हालत बहुत ख़राब है, इस पर लोग केवल बहस करते हैं, राजनीति करते हैं , अखबारों में आर्टिकल छपते हैं और सब हाय-तौबा मचाकर भूल जाते हैं. पर इसके लिए कोई कारगर समाधान नही निकाला जाता ।भारत में किसानों की ख़राब हालत के कई कारण हैं, जिनके बारे में समाज, राजनेता और हर बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए। जो सक्षम हैं ,उनकी सहायता करने के लिए आगे आयें ।भारत की राजनीति इतनी ख़राब अवस्था में है कि इसमें अच्छे लोग बहुत कम आते हैं या आते ही नही।इसमें जो लोग गरीबों और किसानों के नाम पर वोट लेकर जीत जाते हैं फिर उन्ही को भूल जाते हैं.।किसानों और गरीबों को लगता है इस बार कुछ अच्छा होगा।पर उनके हाथ हरिऔध जी का कदुआ लगता है।
भारतीय राजनीति में सुधार होना चाहिए। ऐसी पार्टियां होनी चाहिएं , जिनमें एक ग़रीब किसान भी चुनाव लड़ सके।यदि कोई नेता या राजनेता चुनाव प्रचार के समय कोई वादा करता है, तो उसे पूरा करने के लिए माननीय कोर्ट आदेश दे ,क्योकि झूठे वादों से चुनाव जीतना अपराध की श्रेणी में आना चाहिए।
नेता वही वादा करें ,जो वे पूरा कर सकें।नेताओं के कार्यों और उनकी आमदनी की जानकारी किसी वेबसाइट पर होनी चाहिए। लोगो को जागरूक होना चाहिए कि यदि वे वोट देकर नेता बनाते हैं ,तो उनसे काम लेना भी सीखें।भारत के लोगों ने यह मान लिया हैं कि खेती से हम लाभ पा ही नही सकते हैं। खेती- किसानी एक घाटे का काम या छोटी चीज है,इस सोच को बदलने की जरूरत है।किसानों को कृषि के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए कि कैसे वे खेती से लाभ पा सकते हैं।परिवार के सभी सदस्यों को कृषि पर ही निर्भर नही होना चाहिए. आमदनी का कोई और साधन होना चाहिए।
भारतीय सरकार को ऐसे लघु उद्योगों के बारे में बताना चाहिए, जो किसान अपने घर से कर सकें और खेती भी कर सकें। अतिरिक्त आमदनी के लिए उन्हें शहर में पलायन न करना पड़े।
भारत में ऐसे विषयों के बारे में पढ़ाया जाता है, जिनका दैनिक जीवन में कोई उपयोग ही नही है,जबकि कृषि जैसे विषयों को अनिवार्य करना चाहिए।कृषि से सम्बंधित टेक्नोलॉजी के बारे में पढ़ाना जाना चाहिए।कृषि से दूसरे व्यवसायों को कैसे जोड़ें ,इस बात पर चर्चा हो।गाँवों में खेती करने के बाद किसानों के पास इतना समय होता है, जिसका प्रयोग करके अतरिक्त धन कमा सकते हैं।भारत के ज्यादातर किसानों और मजदूरों के अशिक्षित होने के कारण उन्हें उचित प्रकार से शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएं नही मिल पाती हैं।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को शिक्षा देने में कम रुचि होती है।वे शहर के निकट ट्रांसफर की कोशिशें अधिक करते रहते हैं।उन्हें गांवों की सेवा के लिए मोटीवेट किया जाय ,ताकि आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा मिल सके।
उन्हें इतनी शिक्षा दी जानी चाहिए कि वे अपने व्यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग कर सकें और उसके लाभ को समझें और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सके। उनसे ठगी न हो।
भारत में सरकार काफ़ी पैसा कृषि से जुड़े सरकारी केन्द्रों के संचालन में लगाती है।इन केन्द्रों के अफ़सर किसानों की समस्या का कोई समाधान नही करते।ऐसे अफ़सर उलटे उन किसानों से फर्जी तरीके से धन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।सरकारी अफ़सर हम और आप में से ही चुने गए लोग होते हैं । उन्हें इतना सोचना चाहिए कि कोई किसान हमारे उत्पीड़न या गलत निर्णय से आत्महत्या न कर ले।
भारत में अधिकतर किसान आज भी अशिक्षित हैं ,जिसके कारण वो अपने आस-पास के साहूकारों से कर्ज लेते हैं ,जो 70% से 120% तक का सूद लेते हैं, जबकि यही बैंकों से सस्ता पड़ता है।इसका कारण अशिक्षा और बैंक वालों का उत्पीड़न भी है।वे अमीर और गरीब से एक सा व्यवहार नहीं रखते।इस दिशा में सरकार को कड़े क़दम उठाना चाहिए। बैंकों के लेन-देन की प्रक्रिया को आसान बनाने की कोशिश हो और किसानों को बैंक सम्बंधित कार्यों की जानकारी देनी चाहिए। बैंकों से लोन या कर्ज लेने पर किसानों को कभी बैंक में घूस भी देनी पड़ती है।
भारतीय किसान को यह लगता हैं कि यह सरकार नहीं तो, अगली सरकार उनके लिए कुछ अच्छा करेगी।ऐसी सोच का त्याग करें।हर समस्या का समाधान हो सकता है। बस सोच बदलने की जरूरत होती हैं। बच्चों को उचित शिक्षा मिले।कम-से-कम एक बच्चे को इतना जरूर पढाएँ जो पूरे घर, गाँव और समाज की सोच बदल दे।शिक्षा में बहुत शक्ति होती है, यह हर किसान को समझना होगा।
सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से फसलें नष्ट हो जाती हैं।बीज, खाद, कीटनाशक, और डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।किसानों को उनकी मेहनत के अनुसार फसल का सही दाम नहीं मिल पाता।
कोई निश्चित आमदनी न होने पर किसान साहूकारों या बैंकों के कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।बिचौलिए बाजार में बड़ा मुनाफा कमाते हैं और किसान को बहुत कम पैसा मिलता है। कोल्डस्टोरेज कम हैं।उनको सरकारी सहायता से चलाया जाए।मंहगी बिजली से उनको राहत मिले।
फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।आपदा के समय कर्ज माफी और समय पर आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।
किसानों को कम लागत में ज्यादा पैदावार के लिए आधुनिक साधन मिलने चाहिए।
बिचौलियों को हटाने के लिए किसानों को सीधे बाजार में फसल बेचने का अवसर मिलना चाहिए।
अगर समय और योजनाबद्ध ढंग से काम हो,तो हमारे देश को विकसित राष्ट्र बनने में देर नहीं लगेगी।किसी शायर ने क्या खूब कहा है -
"शगुफ्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से।
बहुत रोते हैं वे ,जिनको लतीफे याद होते
हैं।"


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