चुनाव आयोग पर विपक्ष का दबाव या 2027 की राजनीतिक तैयारी?
इंडिया ब्लॉक की बैठक में छह सूत्री कार्यक्रम तय, एसआईआर को लेकर आरोपों के बीच आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में 30 सितंबर को हुई इंडिया ब्लॉक की आठवीं बैठक के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआई आर को लेकर अपने आंदोलन का खाका सामने रखा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और छह अक्टूबर को विपक्षी सांसदों द्वारा चुनाव आयोग के घेराव की घोषणा की। बैठक में 19 विपक्षी दलों के शामिल होने की बात सामने आई है। विपक्ष ने दो से आठ अक्टूबर तक जिला स्तर पर मार्च, अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रपति से मुलाकात, पांच बड़ी रैलियां और एक नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली सहित कई कार्यक्रम तय किए हैं।
बैठक का केंद्र एसआईआर, मतदाता सूची में बदलाव, ईवीएम-वीवीपैट और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता रहा। खड़गे ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को केंद्र सरकार की कठपुतली बना दिया गया है और मतदाता सूची में बदलाव के जरिए विपक्ष के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है, जिसे तथ्य के रूप में स्वीकार करने से पहले संबंधित प्रमाण और चुनाव आयोग का पक्ष देखना जरूरी है। चुनाव आयोग स्वयं एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है और देश में लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी उसके पास है।
एसआईआर को लेकर विपक्ष जिस तरह लगातार अभियान चला रहा है, उससे स्पष्ट है कि मतदाता सूची का मुद्दा आने वाले चुनावों की राजनीति में बड़ा विषय बनने जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि किसी वैध मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सूचना, कारण और अपील का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर चुनाव आयोग की मौजूदा व्यवस्था में मतदाता पंजीकरण, नाम में सुधार, आवेदन की स्थिति देखने और मतदाता सूची से संबंधित सेवाओं के लिए आधिकारिक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर नया मतदाता पंजीकरण करने के लिए फॉर्म-6 की सुविधा भी दी गई है।
फॉर्म-6 को लेकर भी विपक्ष की ओर से सवाल उठाए गए हैं। वहीं चुनाव आयोग ने 30 सितंबर को उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अतिरिक्त घोषणा पत्र की आवश्यकता समाप्त करने की जानकारी दी, जहां एसआई आर पूरा हो चुका है या अभी शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ वास्तविक प्रक्रिया को समझना भी जरूरी है। मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी बदलाव कितना व्यापक है, कितने नाम जोड़े या हटाए गए और किन कारणों से कार्रवाई हुई, इसका राज्यवार आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण ही अधिक स्पष्ट तस्वीर दे सकता है।
इंडिया ब्लॉक की बैठक में विपक्ष ने ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग भी दोहराई। इसके साथ ही भविष्य के चुनावों में एसआईआर से पहले की मतदाता सूची इस्तेमाल करने, मतदाता सूची में बदलाव की जानकारी सार्वजनिक करने और चुनाव प्रक्रिया में संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने की मांग रखी गई। ये विपक्ष की घोषित राजनीतिक मांगें हैं। इन मांगों पर अंतिम निर्णय चुनावी कानून, संवैधानिक व्यवस्था और सक्षम संस्थाओं की प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
बैगठक में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का शरद पवार गुट, शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट, राजद, वाम दलों सहित विभिन्न विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए। हालांकि आम आदमी पार्टी और द्रमुक बैठक में शामिल नहीं हुए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी व्यक्तिगत रूप से बैठक में नहीं पहुंचे और उनकी जगह पार्टी के प्रतिनिधि शामिल हुए। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि इंडिया ब्लॉक के भीतर चुनाव आयोग के मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास है, लेकिन सभी दलों की सक्रिय भागीदारी एक जैसी नहीं है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस बैठक से कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को राजनीतिक रूप से क्या हासिल हुआ। विपक्ष को एक साझा मुद्दा जरूर मिला है, जिसके जरिए वह अलग-अलग राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक अभियान से जोड़ सकता है। छह सूत्री कार्यक्रम इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है। लेकिन आंदोलन की घोषणा और उसके राजनीतिक प्रभाव के बीच काफी अंतर होता है। किसी भी आरोप को जनता के बीच प्रभावी मुद्दा बनाने के लिए ठोस तथ्य, दस्तावेज और लगातार राजनीतिक संवाद की आवश्यकता होती है।
विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग को कठपुतली कहे जाने के बाद भाजपा की ओर से भी पलटवार किया गया है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने और मतदाता सूची में मृत या दोहरे नाम बनाए रखने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। इस प्रकार विवाद अब केवल एसआई आर की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया पर राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है।
आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस पूरे विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है। अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दल अपने संगठन को मजबूत करने और सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाशने में जुटे हैं। ऐसे में मतदाता सूची, एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका ऐसा विषय बन गया है जिसे विपक्ष व्यापक राजनीतिक अभियान में बदलना चाहता है। इसे केवल प्रशासनिक विवाद मानना भी अधूरा होगा और बिना पर्याप्त प्रमाण के चुनावी गड़बड़ी का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर सवाल उठाना राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन सवालों के जवाब भी तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही तय होने चाहिए। चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनी रहे और वास्तविक मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहें। आयोग के आधिकारिक आंकड़े, न्यायिक प्रक्रिया और सार्वजनिक रिकॉर्ड इस बहस को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इंडिया ब्लॉक की बैठक ने निश्चित रूप से चुनाव आयोग और एसआईआर को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब दो से आठ अक्टूबर के प्रस्तावित कार्यक्रमों और छह अक्टूबर के घेराव से विपक्ष अपने अभियान को किस स्तर तक ले जाता है, यह देखना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि आरोपों के समर्थन में विपक्ष कौन से दस्तावेज और प्रमाण सार्वजनिक करता है तथा चुनाव आयोग उनके जवाब में क्या तथ्य सामने रखता है। केवल बार-बार आरोप दोहराने से कोई दावा स्वतः सत्य नहीं हो जाता और केवल राजनीतिक बयान के आधार पर किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर अंतिम निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता। आने वाले चुनावों से पहले वास्तविक तथ्य, आधिकारिक आंकड़े और पारदर्शी प्रक्रिया ही इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
कांतिलाल मांडोत
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