सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार: जनहित की योजनाओं पर भारी पड़ती व्यवस्था
सरकारी दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग पा रही है। सरकारें बदलतीं हैं अफ़सर बदलते हैं लेकिन भ्रष्टाचार जस का तस खड़ा रहता है और आम आदमी बिना लिए दिये काम करवाने में असमर्थ दिखाई देता है।
सरकारी दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग पा रही है। सरकारें बदलतीं हैं अफ़सर बदलते हैं लेकिन भ्रष्टाचार जस का तस खड़ा रहता है और आम आदमी बिना लिए दिये काम करवाने में असमर्थ दिखाई देता है। सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, योजनाओं के नाम बदलते हैं और व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के दावे भी लगातार किए जाते हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए सरकारी दफ्तर का अनुभव आज भी कई जगह पुराने सवालों से घिरा हुआ है—काम कराने के लिए सिफारिश क्यों चाहिए, फाइल आगे बढ़ाने के लिए सुविधा शुल्क क्यों देना पड़ता है और जिस सेवा का अधिकार कानूनन नागरिक को है, उसके लिए भी उसे बार-बार कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ते हैं?
भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने और देने तक सीमित समस्या नहीं है। यह उस पूरी कार्यप्रणाली को कमजोर करता है, जिसमें जानबूझकर देरी, अनावश्यक आपत्तियां, फाइल रोकना, नियमों की अलग-अलग व्याख्या करना और व्यक्ति की मजबूरी का फायदा उठाना शामिल हो सकता है। जब ऐसी प्रवृत्तियां सरकारी कार्यालयों में जड़ पकड़ती हैं तो सरकार की अच्छी से अच्छी योजना भी जमीन पर कमजोर पड़ जाती है। आज सरकारें डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन सेवाओं, जनसुनवाई, समयबद्ध निस्तारण और पारदर्शिता की बात करती हैं। इसका उद्देश्य साफ है—नागरिक को कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें और व्यवस्था में मानवीय हस्तक्षेप कम हो। लेकिन यदि ऑनलाइन आवेदन के बाद भी नागरिक को किसी कर्मचारी या अधिकारी के पीछे भागना पड़े, दस्तावेजों की छोटी-छोटी कमियों के नाम पर काम अटकाया जाए या बिना ‘व्यवस्था’ के फाइल आगे न बढ़े, तो डिजिटल शासन का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब भ्रष्टाचार को व्यवस्था का सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। शिकायत करने वाला व्यक्ति यह सोचकर पीछे हट जाता है कि कहीं उसका अपना काम ही न बिगड़ जाए। यही डर भ्रष्टाचार को ताकत देता है। जब नागरिक शिकायत करने से डरता है और भ्रष्ट कर्मचारी कार्रवाई से, तब भ्रष्टाचार के खिलाफ बनाई गई व्यवस्थाएं कागज पर तो मजबूत दिखाई देती हैं, लेकिन व्यवहार में उनका असर सीमित हो जाता है।
सरकार की मंशा पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन हर भ्रष्टाचार के लिए सीधे सरकार को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। समस्या यह है कि ऊपर से बनाई गई नीतियों और नीचे उनके क्रियान्वयन के बीच कहीं न कहीं ऐसी दरारें पैदा हो जाती हैं, जिनका लाभ भ्रष्ट तंत्र उठाता है। सरकार ईमानदार व्यवस्था चाहती हो सकती है, लेकिन यदि निगरानी कमजोर है, शिकायतों का निस्तारण निष्पक्ष नहीं है और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी होती है, तो अच्छी मंशा का परिणाम जनता तक नहीं पहुंच पाता। भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान गरीब और कमजोर नागरिक को होता है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति किसी काम के लिए विशेषज्ञ, वकील या प्रतिनिधि की मदद ले सकता है, लेकिन सामान्य नागरिक के पास अक्सर समय और संसाधन दोनों सीमित होते हैं। उसके लिए एक प्रमाणपत्र, पेंशन, जमीन से जुड़ा काम, नगर निकाय की सेवा या किसी सरकारी योजना का लाभ जीवन की बड़ी जरूरत हो सकता है। यदि उसी काम के लिए उसे बार-बार दफ्तर बुलाया जाए, तो भ्रष्टाचार केवल आर्थिक बोझ नहीं रहता, बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी बन जाता है।
इस समस्या का समाधान केवल छापेमारी या निलंबन से नहीं होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थायी लड़ाई के लिए व्यवस्था की संरचना बदलनी होगी। हर सरकारी सेवा के लिए स्पष्ट समयसीमा हो, आवेदन की स्थिति ऑनलाइन दिखाई दे, किस अधिकारी के पास फाइल कितने समय से लंबित है इसकी जवाबदेही तय हो और जानबूझकर देरी करने वालों पर वास्तविक कार्रवाई हो। शिकायतकर्ता को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि शिकायत करने के कारण उसके वैध काम में बाधा नहीं डाली जाएगी। इसके साथ ही अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी जवाबदेही उतनी ही जरूरी है जितनी नागरिकों के लिए नियम। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान तभी विश्वसनीय बनेगा जब कार्रवाई पद, पहुंच और प्रभाव देखकर नहीं, बल्कि तथ्य और प्रमाण के आधार पर होगी। सरकार को यह भी समझना होगा कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी खजाने को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि शासन की विश्वसनीयता को धीरे-धीरे खत्म करता है। एक नागरिक जब रिश्वत देकर अपना काम कराता है तो उसके मन में केवल कर्मचारी के प्रति नहीं, पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। यही अविश्वास लोकतांत्रिक शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। सरकारें जनता को बेहतर सुविधाएं देने के लिए योजनाएं बनाती हैं। बजट जारी होता है, घोषणाएं होती हैं और लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। लेकिन इन सबके बीच यदि सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का तंत्र सक्रिय रहता है तो योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने से पहले ही कमजोर पड़ जाता है। इसलिए भ्रष्टाचार पर नियंत्रण केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सरकार की नीयत और उसकी नीतियों की सफलता का सवाल भी है।
सरकार की मंशा पर पानी तब नहीं फिरता जब कोई योजना असफल हो जाती है; असली नुकसान तब होता है जब व्यवस्था के भीतर बैठे कुछ लोग उस मंशा को अपने निजी स्वार्थ का माध्यम बना लेते हैं।
जरूरत इस बात की है कि सरकारी दफ्तर नागरिक के लिए डर और मजबूरी की जगह भरोसे का केंद्र बनें। जिस दिन आम आदमी बिना सिफारिश, बिना दबाव और बिना रिश्वत के अपना वैध काम करा सकेगा, उसी दिन सुशासन का दावा वास्तव में जमीन पर दिखाई देगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार की नहीं है, लेकिन इसे निर्णायक बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसी तंत्र की है जिसके हाथ में प्रशासन की बागडोर है। सरकार की मंशा अच्छी है तो उसे सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली में भी दिखाई देना चाहिए—क्योंकि जनता घोषणाएं नहीं, अपने अनुभव से सरकार को परखती है। सरकारी विभागों में रिश्वत अब आम हो चुकी है हालांकि सरकार की तरफ से इसे रोकने के लिए प्रयास भी किए गए हैं लेकिन वो प्रयास काफी नहीं रहे। कार्यालयों का डिजटलीकरण भी इन रिश्वत के रोग को खत्म नहीं कर सका। अब देखना यह है कि यह कितना और आगे बढ़ेगा और सरकार कितना इस पर लगाम लगा सकेगी।


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