भूख से जूझते करोड़ों लोग दूसरी ओर करोड़ों टन भोजन की बर्बादी 

यह बर्बादी मुख्य तौर पर घरों, होटलों और खुदरा दुकानों में होती है। 

हर्षिता यादव  Picture
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मनोज कुमार अग्रवाल 
 
भारत भोजन की बर्बादी के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है,एक तरफ जहां करोड़ों टन खाना फेंका जाता है, वहीं देश में लाखों लोग कुपोषण और भुखमरी का शिकार हैं। भारत में हर साल लगभग 7.8 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। चीन पहले स्थान पर 10.86 करोड़ टन खाना बर्बाद करता है और भारत दूसरे स्थान पर है। देश में सालाना लगभग ₹92,651 करोड़ से ₹1.55 लाख करोड़ मूल्य का खाना बर्बाद होता है।भारत के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक ओर पिछले कजहां करोडों लोगों को भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं है पौष्टिक भोजन की तो बात ही छोड़ दीजिए ऐसी स्थिति में दूसरी ओर बड़ी मात्रा में खाना कचरे में चला जाता है।
 
खेत में मेहनत से उगा अन्न जब गोदाम में खराब होता है या विवाह समारोह की भरी प्लेट से फेंक दिया जाता है, तो नुकसान केवल भोजन का नहीं होता। उसके साथ बीज किसान की मेहनत, खाद पानी, जमीन,संसाधन बिजली, श्रम और उन पर हुआ खर्च भी बेकार हो जाता है। और किसी जरूरतमंद तक भोजन पहुंचने की संभावना भी व्यर्थ हो जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के फूड वेस्ट इंडेक्स 2024 के आधार पर भारत के घरों में सालाना लगभग 7.82 करोड़ टन भोजन बर्बाद होने का अनुमान है। प्रति व्यक्ति यह मात्रा करीब 55 किलोग्राम है।यह बर्बादी मुख्य तौर पर घरों, होटलों और खुदरा दुकानों में होती है। 
 
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पड़ोसी मुल्कों में खाने की सबसे ज्यादा बर्बादी चीन में होती है. चीन में हर व्यक्ति सालभर में औसतन 76 किलो खाना बर्बाद कर्ता है इसी कड़ी में पाकिस्तान बांग्लादेश अफ़गानिस्तान नेपाल श्रीलंका भूटान में भी बड़ी मात्रा में खाना बर्बाद किया जाता है। पाकिस्तान में वैसे तो हर व्यक्ति सालाना औसतन 130 किलो खाना बर्बाद करता है, लेकिन वहां सालभर में 3.07 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है.
 
इसी तरह बांग्लादेश में 1.41 करोड़ टन, अफगानिस्तान में 52.29 लाख टन, नेपाल में 28.31 लाख टन, श्रीलंका में 16.56 लाख टन और भूटान में 15 हजार टन से ज्यादा खाना हर साल बर्बाद हो जाता है.भारत में जितनी मात्रा में खाना बर्बाद होता है, उससे देश के करोड़ों भूखे लोगों का पेट भरा जा सकता है।संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि दुनियाभर में हर साल एक अरब टन से ज्यादा खाना बर्बाद हो जाता है. खाने की ये बर्बादी तब है, जब दुनियाभर में 78.3 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे पेट सो जाते हैं.इतना ही नहीं दुनिया की एक तिहाई आबादी पर खाने का संकट मंडरा रहा है। 
 
आपको बता दें कि भोजन की बर्बादी केवल थाली तक सीमित नहीं है, बल्कि खेत से बाजार और गोदामों तक पहुंचने के दौरान भी बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। देखा जाए तो भूख और बर्बादी का यह संतुलन केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि एक गंभीर नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकट भी है। इस मामले में राजस्थान की स्थिति भी चिंताजनक है, जहां रोजाना करीब 9,490 मीट्रिक टन भोजन बर्बाद होता है। इसका बढ़ा हिस्सा शादी-पार्टियों और बड़े आयोजनों से आता है। भरी हुई प्लेटें आधी छोड़ देना हमारे यहां शान का प्रतीक बन गया है, जबकि यही अन्न किसी की पूरी रात की भूख मिटा सकता था। भोजन का नुकसान थाली में आने से बहुत पहले शुरू हो जाता है।
 
कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेटेड परिवहन की कमी से खेतों और मंडियों में बड़ी मात्रा में फल-सब्जियां सड़ जाती हैं। छोटे किसान पूरा नुकसान उठाने से बचने के लिए मजबूरी में औने-पौने दाम पर फसल बेच देते हैं। बाढ़ और बेमौसम बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाएं हालात और बिगाड़ती हैं। आगे सुपरमार्केट 'कॉस्मेटिक फिल्टरिंग' के नाम पर सिर्फ दिखावटी खामियों के कारण बिल्कुल ठीक उपज लौटा देते हैं। शहरों में घरों और भव्य समारोहों का बचा भोजन अंततः लैंडफिल पहुंचता है। सरकारी गोदाम भी इस लापरवाही से अछूते नहीं हैं।
 
मध्य प्रदेश में सीएजी और संबंधित विभागों की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2026 के बीच सरकारी और निजी गोदामों में करीब एक लाख मीट्रिक टन खाद्यान नमी, बारिश, चूहों और समय पर उठाव न होने से खराब हो गया। इसकी कीमत करोड़ रुपये आंकी गई है। रायसेन, सीहोर, विदिशा और आसपास के गोदामों में करीब 70 हजार मीट्रिक टन गेहूं सड़ा। बारिश-नमी से करीब 21 हजार मीट्रिक टन धान और कीड़ों से लगभग 8,500 मीट्रिक टन दलहन भी बर्बाद हुआ। इस अनाज की खरीद, बुलाई और भंडारण पर सरकार 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी थी। यह अनाज सुरक्षित रहता तो गरीब कल्याण योजना के तहत करीब दो करोड़ लोगों को एक महीने का राशन मिल सकता था।
 
यह जनता के पैसे और गरीब के हक, दोनों की बर्बादी है। यह समस्या सिर्फ नैतिक या आर्थिक नहीं, पर्यावरणीय भी है। लैंडफिल में सड़ता भोजन शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मीथेन छोड़ता है। बर्बाद भोजन धरती को गर्म करता है और गर्म होती धरती अन्न उगाना कठिन बनाती है। इस तरह हम अपनी जनता के बजाय अपने कचरे के ढेरों को खिला रहे हैं। नीतिगत खामियां भी कम नहीं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना चावल-गेहूं के वितरण में सफल रही हैं। लेकिन कुपोषण से लड़ने के लिए जरूरी फल, सब्जियां और दुग्ध उत्पाद, जो जल्दी खराब होते हैं, इस तंत्र में लगभग उपेक्षित हैं। पेट भरना और पोषण देना अलग बातें हैं, और नीति को दोनों को साधना होगा।
 
अंधेरे के बीच उम्मीद भी है। रिफूड इंडिया और अन्नक्षेत्र ट्रस्ट जैसी संस्थाएं जयपुर-जोधपुर में समारोहों का बचा भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाती है। कोटा, अजमेर और उदयपुर में युवाओं की टोलियां 'रोटी बैंक' के जरिए घरों और आयोजनों से खाना जुटाकर बांटती हैं। विवाह स्थलों पर लगे बोर्ड "उतना ही ले थाली में जो व्यर्थ न जाए नाली में '' अन्न की बर्बादी रोकने का संदेश देते हैं। ये प्रयास सराहनीय हैं। 
 
हाल ही में एक अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने अधिशेष भोजन के वितरण के नियम बनाए हैं, पर वे खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत मुकदमों के डर से पूरी सुरक्षा नहीं देते। इसी डर से कई रेस्तरां और सुपरमार्केट दान से कतराते हैं। राष्ट्रव्यापी 'नेक कामगार कानून' इस बाधा को दूर कर सकता है। दूसरा, आपूर्ति श्रृंखला में बड़ा निवेश जरूरी है। खेत स्तर पर पैकेजिंग केंद्र, प्रशीतित परिवहन और आधुनिक भंडारण की राष्ट्रीय पहल से बर्बादी घटेगी, मीथेन उत्सर्जन पर लगाम लगेगी और किसानों की आय बढ़ेगी। तीसरा, गोदामों में जवाबदेही तय हो।
 
अनाज सड़ने पर जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, और समय पर उठाव व वैज्ञानिक भंडारण सुनिधित किया जाए। चौथा, समाज को अपनी आदतें बदलनी होंगी। शादियों और समारोहों में बेहतर योजना, सीमित मात्रा में परोसना और बचे भोजन को समय रहते जरूरतमंदों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। अन को हमारी संस्कृति में देवता माना गया है, फिर भी हम उसका अपमान कर रहे हैं। भोजन की बांदी रोकना दान नहीं, कर्तव्य है। यह एक साथ भूख, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण, तीनों का समाधान है।
 
सरकार, समाज और हर नागरिक के सामूहिक प्रयास से ही हम वह दिन ला सकते हैं जब कोई थाली खाली न हो और कोई अन कचरे में न जाए। भोजन बचाने का अर्थ इसलिए केवल खर्च कम करना नहीं, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना भी है। समाधान के लिए सरकार, कारोबार और नागरिकों को अपने-अपने हिस्से का काम करना होगा। सरकार सुरक्षित भंडारण, बुलाई और निगरानी सुधारे। बाजार और रेस्तरां अपनी खरीद तथा बिक्री का बेहतर अनुमान लगाएं और सुरक्षित अतिरिक्त भोजन के वितरण से जुड़ें।
 
घरों में साप्ताहिक जरूरत के अनुसार खरीद, सही भंडारण और बचे भोजन का समय पर उपयोग किया जाए। समारोहों में दिखावे की जगह सुविचारित व्यवस्था को महत्व मिले। भूख का समाधान केवल बचा हुआ भोजन बांट देने से नहीं होगा; लोगों की आय, पोषण और भोजन तक नियमित पहुंच भी सुनिधित करनी होगी। फिर भी बर्बादी रोकना ऐसा कदम है जिसे आज से शुरू किया जा सकता है। जिस देश में अन्न को सम्मान दिया जाता है, वहां उसे उगाने से लेकर परोसने तक बचाने की जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए।
 
एक अनुमान के मुताबिक भारत में रोज तकरीबन 19-20 करोड़ लोग भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं. यही नहीं, देश में जितना खाना सालाना बर्बाद हो रहा, उससे करीब 37.7 करोड़ लोगों का पेट भर सकता है.एक आम इंसान को पेट भरने के लिए जितने खाने की जरूरत होती है, उसका करीब 5वां हिस्सा अन्न बर्बाद कर दिया जा रहा है. यानी डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इसलिए अगली बार जब भी किसी पार्टी-समारोह या होटल-रेस्टोरेंट में जाएं तो अपनी प्लेट में जरूरत के मुताबिक खाना परोसिए ऐसा करके आप किसी भूखे की थाली में निवाला पहुंचाने में सहयोग कर सकते हैं.

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