इसे काकरोच पार्टी की जीत कहें या मोदी सरकार की संवेदनशीलता

लोकतंत्र में सरकार का संवाद के लिए आगे आना या किसी मांग पर पुनर्विचार करना उसकी कमजोरी नहीं

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लेखक: प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
 
लोकतंत्र में किसी आंदोलन की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि आंदोलन समाप्त हो गया, सरकार ने कुछ आश्वासन दिए या आंदोलनकारियों की बात सुनते हुए समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए। वास्तविक कसौटी यह होती है कि क्या उस प्रक्रिया से किसी जनसमस्या का समाधान निकला और क्या उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा संवाद की संस्कृति को बल मिला।
 
हाल ही में जंतर-मंतर पर काकरोच पार्टी का आंदोलन समाप्त हुआ। इसके बाद पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बताते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि "सरकार झुकती है, उसे झुकाने वाला चाहिए।" यदि यही आंदोलन की आधिकारिक राजनीतिक व्याख्या है, तो यह केवल विजय-घोषणा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का भी विषय है। ऐसी भाषा में राजनीतिक आत्मविश्वास के साथ-साथ आत्ममुग्धता का आभास भी मिलता है, जो लोकतांत्रिक संवाद की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
 
लोकतंत्र में सरकार का संवाद के लिए आगे आना या किसी मांग पर पुनर्विचार करना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व और जनभावनाओं के प्रति संवेदनशीलता का परिचायक है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है कि वह जनता की बात सुने, विरोध के अधिकार का सम्मान करे और आवश्यकता पड़ने पर अपने निर्णयों की समीक्षा भी करे। यदि इस स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को "सरकार को झुकाना" कहा जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों की अपेक्षा राजनीतिक वर्चस्व की मानसिकता को अधिक प्रतिबिंबित करता है।
 
भारतीय लोकतंत्र की परंपरा में संवाद को कभी पराजय नहीं माना गया। यदि सरकार जनता की अपेक्षाओं विशेषकर विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए बातचीत का मार्ग अपनाती है, तो यह उसकी परिपक्वता है। इसी प्रकार यदि विपक्ष या कोई राजनीतिक दल जनहित के किसी मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाता है और उसके परिणामस्वरूप सकारात्मक परिवर्तन होते हैं, तो उसका लोकतांत्रिक योगदान भी स्वीकार किया जाना चाहिए। किंतु लोकतांत्रिक श्रेय और राजनीतिक अहंकार के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है।
 
वर्तमान राजनीति में लगभग प्रत्येक निर्णय को किसी एक पक्ष की "जीत" और दूसरे की "हार" के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जंतर-मंतर आंदोलन की समाप्ति के बाद भी विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने दृष्टिकोण से इसका श्रेय लेने का प्रयास करेंगे। किंतु ऐसी प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र के सहयोगात्मक चरित्र को कमजोर करती है। यदि हर संवाद के बाद कोई पक्ष स्वयं को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित करने लगे, तो भविष्य में सार्थक संवाद की संभावनाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
 
यह भी स्मरणीय है कि सरकारें किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की होती हैं। इसलिए किसी आंदोलन के बाद सरकार यदि चर्चा या समाधान की दिशा में आगे बढ़ती है, तो वह किसी दल के दबाव में नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक दायित्व के निर्वहन के तहत ऐसा करती है। ऐसी परिस्थितियों में सभी पक्षों से संयम, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक मर्यादा की अपेक्षा स्वाभाविक है।
 
इतिहास इस बात का साक्षी है कि स्थायी समाधान टकराव या अहंकार से नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और पारस्परिक सम्मान से प्राप्त हुए हैं। विपक्ष का दायित्व सरकार से कठोर प्रश्न पूछना और जनहित के मुद्दों को उठाना है, जबकि सरकार का दायित्व आलोचना को लोकतांत्रिक भावना से स्वीकार करना और आवश्यक होने पर सुधारात्मक कदम उठाना है। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
 
अतः जंतर-मंतर के इस आंदोलन को केवल किसी राजनीतिक दल की जीत अथवा सरकार की हार के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यदि इससे किसी जनसमस्या के समाधान की दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है, तो वास्तविक विजय लोकतंत्र की है। इसके विपरीत यदि इस अवसर को राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन, आत्मप्रशंसा या "हमने सरकार को झुका दिया" जैसे नारों तक सीमित कर दिया जाए, तो इससे लोकतांत्रिक संस्कृति सुदृढ़ होने के बजाय कमजोर होने का खतरा रहता है।
 
लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब सरकार संवेदनशील हो, विपक्ष उत्तरदायी हो और अंततः लाभ जनता को मिले। सरकार का संवाद करना उसकी पराजय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है; वहीं विपक्ष की वास्तविक सफलता समाधान का सहभागी बनने में है, न कि संवाद को केवल राजनीतिक विजय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने में।

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