संजीव-नी

माँ की सीख, पिता का अनुशासन

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संजीव-नी।

माँ की सीख, पिता का अनुशासन

माँ ने ऊँची आवाज़ में
बड़े बोल नहीं बोले
उन्होंने रोटी पर सीख मिला दी
मैं उसके स्वाद के संग
बड़ा होता रहा।

पिता ने कम शब्द रखे ,
उनके मौन का अनुशासन
घड़ी की तरह चलता रहा
जब भी मैं भटकने लगा,
माँ की उँगली ने भीतर से
मेरा हाथ पकड़ लिया।

जब भी मैं ठिठका
ठहरने लगा,
पिता की दूर-दृष्टि ने
मुझे फिर चलना सिखाया।

माँ ने बताया कि मनुष्य होना
कोई अग्नि परीक्षा नहीं,
हर दिन का अभ्यास है।

पिता ने सिखाया
ईमानदारी अलंकार नहीं
जीवन की आवश्यकता।
आज भी मेरे भीतर
एक रसोई धुआँ नहीं
संस्कार पकाती,
एक आँगन में
अनुशासन की धूप
में उजाला फैला ।

मैं जहाँ भी पैर रखता ,
माँ की सीख
मेरे शब्दों को तौलती ,
पिता का अनुशासन
मेरे कदमों को रास्तों की
पहचान से पहले
ठोकरों से अवगत करा देता।

संजीव ठाकुर

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