थाना दिवस बना मज़ाक न्याय की उम्मीदों पर फिर रहा पानी, ‘नोटों की थैली’ तय कर रही फ़ैसले का पैमाना 

Mirzapur Swatantra Prabhat Picture
Published On

मीरजापुर। 

संवाददाता प्रवीण तिवारी

मीरजापुर। ​गंभीर और लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए शुरू किया गया ‘थाना दिवस’ अब महज़ एक सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है। जनता को त्वरित और निष्पक्ष न्याय दिलाने का दावा करने वाला यह मंच अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। धरातल की हकीकत यह है कि थाना दिवस अब पीड़ितों को न्याय देने के बजाय लेखपालों और थानों के 'कारखासों' (बिचौलियों/खास गुर्गों) की जेबें गरम करने का सबसे सुरक्षित जरिया बन चुका है।


​ अधिकारियों के आदेशों पर भारी 'पुलिसिया व्यवस्था'
​कहने को तो इस दिन बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी जनता की चौपाल लगाते हैं और कड़े निर्देश जारी करते हैं। लेकिन जैसे ही अधिकारी अपनी गाड़ियों में बैठकर रवाना होते हैं, उनके आदेश पुलिसिया व्यवस्था के आगे घुटने टेक देते हैं। रसूखदारों के आगे बौने साबित होते ये आदेश फाइलों में दबे रह जाते हैं और पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होता है।

चाय की चुस्की लेते वांछित गैंगस्टर अभियुक्त को पुलिस ने दबोचा Read More चाय की चुस्की लेते वांछित गैंगस्टर अभियुक्त को पुलिस ने दबोचा


​ पत्थरगड्डी भी बेअसर, खाकी के दम पर दबंगों का तांडव* 
​हद तो तब हो जाती है जब राजस्व विभाग द्वारा पक्की पैमाइश कर कानूनी तौर पर पत्थरगड्डी (मेड़बंदी) भी कर दी जाती है। कानूनन इसके बाद जमीन पर वास्तविक मालिक का अधिकार होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। पत्थरगड्डी होने के बावजूद, दबंग लोग स्थानीय पुलिस के संरक्षण और बल पर पीड़ित को उसकी अपनी ही जमीन पर कब्जा नहीं करने देते। जब पीड़ित पुलिस के पास जाता है, तो कानून का पाठ पढ़ाने वाली पुलिस दबंगों की ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। पुलिसिया सह पाकर हौसला बुलंद किए दबंग सरेआम कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
​ *ऊंची पकड़ और नोटों की थैली का खेल

मक्के के खेत में दौड़ा करंट बना काल, चाचा-भतीजे की दर्दनाक मौत Read More मक्के के खेत में दौड़ा करंट बना काल, चाचा-भतीजे की दर्दनाक मौत


​थाना दिवस की कड़वी सच्चाई यह है कि यहाँ न्याय की तराजू को पीड़ित की सिसकियाँ नहीं, बल्कि ‘नोटों की थैली’ झुकाती है। जिसकी पकड़ जितनी ऊंची और जिसकी जेब जितनी भारी, उसका काम उतना ही आसान। भूमि विवादों में मौके पर जांच के नाम पर जो खेल खेला जाता है, उसकी स्क्रिप्ट थानों के बाबू और हल्का लेखपाल मिलकर लिखते हैं।

पत्रकार पर रात के अंधेरे में हमला, कार्यवाही करने में लापरवाही का पुलिस पर आरोप Read More पत्रकार पर रात के अंधेरे में हमला, कार्यवाही करने में लापरवाही का पुलिस पर आरोप


​ *पीड़ितों का दर्द साहब, कोर्ट और राजस्व विभाग से पक्की पैमाइश कराकर पत्थरगड्डी करवा ली। लेकिन विपक्षी दबंग हैं,उन्होंने पुलिस को मिला रखा है। अब पुलिस के दम पर वे हमें अपनी ही जमीन पर पैर नहीं रखने दे रहे। थाना दिवस में सिर्फ आश्वासन मिलता है, कार्रवाई नहीं। 


​ *कागजों पर 'ऑल इज वेल', जमीन पर न्याय गायब* 
​सप्ताह दर सप्ताह शिकायतों के निस्तारण का आंकड़ा करोड़ों में दिखाया जाता है, लेकिन धरातल पर सिर्फ तारीख पर तारीख मिलती है। ईमानदारी से अपना काम करने का ढोंग करने वाले तंत्र ने आज आम आदमी के मन में कानून के प्रति अविश्वास की भावना पैदा कर दी है।


​अगर समय रहते इस 'थाना दिवस' के नाम पर चल रहे खुली लूट के धंधे और खाकी-दबंगों के इस गठजोड़ पर नकेल नहीं कसी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब पीड़ित न्याय के इस आखिरी दरवाजे पर जाना भी छोड़ देंगे। देखना यह है कि आला अधिकारी इस व्यवस्था पर कब हंटर चलाते हैं या फिर यह मज़ाक यूं ही जारी रहेगा।

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें