श्रुतधाम : ज्ञान, साधना और संस्कृति का जीवंत तीर्थ
श्रुतधाम : जहाँ ग्रंथों की रक्षा नहीं, पीढ़ियों की चेतना का पुनर्जन्म हुआ
समय की धूल राजमहलों को ढँक सकती है, पर शब्दों की ज्योति कभी नहीं बुझती। किसी समाज की सबसे अमूल्य निधि उसके ग्रंथ, उसकी परंपरा और उसकी स्मृतियाँ होती हैं। जब ये बिखरने लगते हैं, तब केवल इतिहास नहीं खोता, आत्मा भी मौन होने लगती है। ऐसे विरले तपस्थल, जो इस अमूल्य विरासत को पुनः जीवन देकर पीढ़ियों तक पहुँचा दें, वे केवल संस्थान नहीं, संस्कृति के शाश्वत दीप बन जाते हैं। मध्यप्रदेश के बीना, सागर स्थित अनेकांत ज्ञान मंदिर (श्रुतधाम), राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य दिगम्बर जैन मुनिश्री सरलसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में विकसित, ऐसी ही दिव्य ज्ञान-साधना का जीवंत आलोक है।
श्रुत की रक्षा नहीं, श्रुत का पुनर्जागरण
जब समय अपनी अमूल्य धरोहरों को विस्मृति के हवाले कर रहा था, तब 20 फरवरी 1992 को श्रुतधाम एक मौन संकल्प बनकर प्रकट हुआ। यह किसी भवन का आरंभ नहीं, बल्कि उस चेतना का जागरण था जिसने श्रुत परंपरा को संग्रह नहीं, पीढ़ियों के संस्कार का आधार माना। यहाँ इतिहास को अतीत की स्मृति बनाकर नहीं छोड़ा गया, बल्कि वर्तमान का पथप्रदर्शक बना दिया गया। स्थापना के साथ ही दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रह, संरक्षण, अध्ययन और प्रचार-प्रसार का सतत यज्ञ आरंभ हो गया।
जहाँ दुर्लभ ग्रंथों ने फिर से जीवन पाया
देश के 15 राज्यों के 600 से अधिक स्थलों से संजोए गए 30,000 से अधिक दुर्लभ जैन ग्रंथ तथा 200 से अधिक ताड़पत्र और प्राचीन पांडुलिपियाँ आज श्रुतधाम की अमूल्य निधि हैं। लगभग 1300 वर्ष पुरानी सुभाषित रत्नावली और चार शताब्दी पुराना स्वर्णाक्षरित भक्तामर स्तोत्र मात्र प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि इस सत्य के जीवंत प्रमाण हैं कि जहाँ संकल्प अडिग हो, वहाँ काल भी ज्ञान की ज्योति मंद नहीं कर पाता।
जहाँ ग्रंथ बोलते हैं और पीढ़ियाँ सुनती हैं
श्रुतधाम की पहचान उसके संग्रह से नहीं, उस चेतना से है जो ग्रंथों के ज्ञान को जीवन से जोड़ती है। यहाँ पांडुलिपियाँ केवल सुरक्षित नहीं, समाज की प्रेरणा हैं। ब्रह्मचारी संदीप सरल भैयाजी के मार्गदर्शन में आचार्यों की वाणी अतीत नहीं, वर्तमान का आलोक बनकर प्रवाहित है। यहाँ युवा पीढ़ी को केवल ज्ञान नहीं, विचार, विवेक, चरित्र और आत्मजागरण का संस्कार मिलता है। संस्थान में प्राकृत भाषा, जैन दर्शन और शास्त्र-अध्ययन की नियमित कक्षाएँ संचालित होती हैं। ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यमों से श्रुत-आराधना का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे दूर-दूर के जिज्ञासु श्रावक लाभान्वित हो रहे हैं।
हरित चेतना का आध्यात्मिक विस्तार
श्रुतधाम का विस्तार केवल शास्त्रों तक नहीं, प्रकृति की गोद तक है। सहस्रों वृक्षों और चौबीस तीर्थंकरों से संबद्ध पावन वनस्पतियों के माध्यम से यह संदेश साकार होता है कि धर्म केवल उपासना नहीं, जीवन-संस्कृति है। यहाँ पर्यावरण संरक्षण अभियान नहीं, साधना का सहज स्वरूप है। परिसर का विकसित वन क्षेत्र और जैविक खेती के प्रयास इस हरित चेतना को और सुदृढ़ करते हैं।
एक संकल्प जिसने इतिहास बदल दिया
श्रुतधाम किसी भवन की नहीं, एक विश्वास की रचना है। यह उस संकल्प का साकार रूप है जिसने सिद्ध किया कि समाज यदि अपनी ज्ञान-परंपरा का संरक्षण करे, तो खोई विरासत भी पुनः जीवंत हो उठती है। यह स्थल संतों, श्रावकों और समर्पित साधकों के सामूहिक पुरुषार्थ का साक्षी है, जिसने ऐसी चेतना जगाई है जो आज भी पीढ़ियों का पथ आलोकित कर रही है। परिसर में निर्माणाधीन भव्य मुक्ताकाश समवशरण मंदिर उसी दूरदृष्टि का प्रतीक है। 41 हजार वर्गफुट में आकार ले रहा बुंदेलखंड का प्रथम मुक्ताकाश समवशरण मंदिर जैन परंपरा की भव्यता को नई ऊँचाई दे रहा है।
श्रुतधाम : एक स्थान नहीं, एक सतत आंदोलन
मध्यप्रदेश के बीना, सागर में स्थित श्रुतधाम आज केवल तीर्थ नहीं, भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। यहाँ अतीत भविष्य का पथ प्रशस्त करता है, इतिहास वर्तमान से संवाद करता है और श्रुत केवल पढ़ा नहीं, जिया जाता है। इसी कारण श्रुतधाम भवन नहीं, एक चेतना है; संस्था नहीं, सतत प्रवाहित सांस्कृतिक अभियान है। जैन श्रुत परंपरा के पुनर्जीवन के साथ यह समूची भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण का भी सशक्त केंद्र बन चुका है।


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