राजनीति
भरोसे के लायक नहीं है चीन और जिनपिंग
द्विपक्षीय समझौतों और शांति स्थापित करने के वादों के बावजूद सीमा पर चीनी सेना की गतिविधियां इस अविश्वास को गहरा करती हैं।
मनोज कुमार अग्रवाल
चीन की विश्वसनीयता को लेकर वैश्विक राजनीति, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में अलग-अलग दृष्टिकोण और गंभीर चिंताएं व्यक्त की जाती हैं। कई देश और विश्लेषक चीन की नीतियों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में उसके साथ व्यावहारिक सहयोग भी जारी है।
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से तनाव है। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से भारत में चीन के प्रति अविश्वास काफी बढ़ा है। द्विपक्षीय समझौतों और शांति स्थापित करने के वादों के बावजूद सीमा पर चीनी सेना की गतिविधियां इस अविश्वास को गहरा करती हैं।
चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है, जिससे फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ताइवान जैसे पड़ोसी देशों के साथ उसका लगातार टकराव बना रहता है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसलों को न मानना भी उसके प्रति अविश्वास का एक बड़ा कारण है।चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' परियोजना के तहत कई विकासशील देशों जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान और कुछ अफ्रीकी देश को भारी कर्ज दिया गया।
जब ये देश कर्ज चुकाने में असमर्थ होते हैं, तो चीन उनके रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों जैसे श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह पर नियंत्रण कर लेता है। इसे वैश्विक स्तर पर आर्थिक शोषण के रूप में देखा जाता है। चीनी तकनीकी कंपनियों (जैसे हुवावे, टिकटॉक) पर डेटा चोरी और जासूसी के आरोप लगते रहे हैं, जिसके कारण कई देशों ने उन पर प्रतिबंध लगाए हैं। कोविड-19 महामारी की शुरुआत के दौरान सूचनाओं को दबाने और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पूर्ण सहयोग न करने के आरोपों ने भी वैश्विक स्तर पर चीन की छवि को नुकसान पहुंचाया।
वैश्विक मंच पर शांति और कूटनीति के कितने ही दावे क्यों न किए जाएं, लेकिन चीन का चरित्र और उसकी विस्तारवादी नीतियां हमेशा से संदेह के घेरे में रही हैं। पड़ोसी देशों की भूमि पर अवैध कब्जा जमाने की उसकी पुरानी आदत किसी से छिपी नहीं है। भारत भी इस विस्तारवाद का एक प्रमुख निशाना रहा है, विशेष रूप से हमारा सामरिक और भौगोलिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य अरुणाचल प्रदेश। हाल ही में एक बार फिर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति और तनाव ने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि बीजिंग के इरादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।
प्रश्न केवल किसी एक घटना का नहीं, उस व्यवहार का है जिसमें बातचीत के साथ दबाव बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। भारत के लिए संदेश स्पष्ट है कि संबंध सुधारने की इच्छा के साथ ाथ सुरक्षा संबंधी सतर्कता और राष्ट्रीय हितों पर दृढ़ता अनिवार्य है। निःसंदेह अरुणाचल प्रदेश पर भारत की स्थिति स्पष्ट और अडिग है। यह राज्य भारत का अभिन्न अंग है, जहां संविधान के अंतर्गत निर्वाचित सरकार और प्रशासन कार्य करते हैं। वहां के नागरिक भारतीय लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार हैं।
चीन द्वारा राज्य को 'दक्षिण तिब्बत' कहना या उसके विभिन्न स्थानों के लिए अपने नाम जारी करना इस वास्तविकता को नहीं बदल सकता। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की अपनी व्याख्या के आधार पर किसी पड़ोसी के भूभाग सी के भूभाग पर दावा करना स्वीकार्य अंतरराष्ट्रीय व्यवहार नहीं है। ऐसी गतिविधियां विवाद के समाधान की संभावनाओं को मजबूत करने के बजाय संदेह और असुरक्षा बढ़ाती हैं। पूर्वी क्षेत्र के सीमा विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मैकमोहन रेखा से जुड़ी है।
भारत इसे अपनी पूर्वी सीमा का आधार मानता है, जबकि चीन इसकी वैधता स्वीकार नहीं करता। लेकिन ऐतिहासिक मतभेद वर्तमान में तनाव बढ़ाने का औचित्य नहीं बन सकते। जब सीमा के प्रश्न पर संवाद के तंत्र मौजूद हैं, तब जरूरी है कि उन्हीं के माध्यम से समाधान तलाशा जाए। वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर अलग-अलग धारणाओं के बीच सैनिकों की गतिविधियों में संयम और सहमत व्यवस्थाओं का पालन विशेष महत्व रखता है। किसी भी पक्ष की एकतरफा कार्रवाई गलत आकलन को गंभीर टकराव में बदल सकती है।
प्रस्तुत विवरण में भारत के विदेश मंत्रालय ने तनाव को गश्त के निर्धारित तौर-तरीकों से विचलन से जोड़ा है, जबकि चीन अपनी गतिविधियों को नियमित सीमा प्रबंधन बताता है। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच असली कसौटी जमीन पर शांति है। समझौतों के पालन का दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब सैनिक टकराव घटें, संवाद प्रभावी हो और तनावपूर्ण परिस्थितियों का शीघ्र समाधान निकले। भरोसा बार-बार दोहराए गए बयानों से नहीं बनता। उसके लिए निरंतर जिम्मेदार व्यवहार जरूरी है। चीन को समझना होगा कि सीमा पर अनिश्चितता बनाए रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों में सामान्यता की अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है।
गलवान की त्रासदी भारत की सामरिक स्मृति का गंभीर अध्याय है। उसने स्पष्ट किया कि सीमा पर लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाएं भी अचानक पैदा हुई हिंसक परिस्थितियों में अपर्याप्त साबित हो सकती हैं। इसलिए जवानों की तैयारी में कठिन भूगोल, निकट संघर्ष, त्वरित प्रतिक्रिया और आधुनिक निगरानी तकनीक का समावेश आवश्यक है। ड्रोन तथा ड्रोन-रोधी प्रणालियों की उपयोगिता भी इसी संदर्भ में बढ़ती है। हालांकि, आधुनिकीकरण की सफलता केवल उपकरण खरीदने से तय नहीं होगी।
प्रशिक्षण की गुणवत्ता, रखरखाव, सूचनाओं के आदान-प्रदान और सेना तथा अन्य सुरक्षा बलों के समन्वय से ही इन क्षमताओं का वास्तविक लाभ मिलेगा। अरुणाचल प्रदेश में सड़कें, सुरंगें और संचार सुविधाएं विकसित करना इसी तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दुर्गम पहाड़ों, कठिन मौसम और लंबी दूरी के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच चुनौतीपूर्ण रहती है। बेहतर संपर्क से सुरक्षा बलों की आवाजाही और रसद व्यवस्था मजबूत होती है। साथ ही स्थानीय लोगों को अस्पतालों, विद्यालयों, बाजारों और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच मिलती है।
सेला सुरंग जैसी परियोजनाओं का महत्व इसी व्यापक दृष्टि से समझना चाहिए। सीमांत क्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक कल्याण को जोड़ता है। परियोजनाओं की गति के साथ निर्माण की गुणवता, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।
चीन के प्रति प्रभावी नीति भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर दीर्घकालिक राष्ट्रीय सामर्थ्य पर आधारित होनी चाहिए। रक्षा उत्पादन, तकनीकी क्षमता, आर्थिक मजबूती और महत्वपूर्ण आपूर्ति व्यवस्थाओं में अनावश्यक निर्भरता कम करना इस दिशा में जरूरी है। सार्वजनिक विमर्श में भी सरकारी बयानों, स्वतंत्र रूप से पुष्ट सूचनाओं और अप्रमाणित दावों का अंतर बनाए रखना चाहिए। भारत को अपनी संप्रभुता पर अडिग रहते हुए शांति के प्रत्येक सार्थक अवसर का उपयोग करना होगा।
चीन की विश्वसनीयता की अंतिम कसौटी उसके आश्वासन नहीं, उनका पालन है। स्थायी संबंधों का रास्ता सीमा पर संयम, पारस्परिक सम्मान और व्यवहार में दिखाई देने वाली जिम्मेदारी से होकर ही निकलेगा। लेकिन चीन की विस्तारवादी नीतियों और उसकी चालाक कूटनीति को देखते हुए यह पूरी तरह स्पष्ट है कि उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। उसके मोठे बयानों के पीछे हमेशा कोई न कोई भू-राजनीतिक चाल छिपी होती है। भारत को अपनी रक्षात्मक और आक्रामक क्षमताओं को इसी प्रकार मजबूत बनाए रखना होगा।
सीमा पर मजबूत बुनियादी ढांचा, अत्याधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित कमांडो बल और कूटनीतिक दृढ़ता ही वह त्रिस्तरीय कवच है जो चीन को उसकी औकात याद दिला सकता है। भारत की यह स्पष्ट नीति होनी चाहिए कि 'शांति की चाह रखो, लेकिन हर परिस्थिति के लिए पूरी तरह तैयार रहो।' जब तक भारत अपनी सीमाओं पर सैन्य और रणनीतिक रूप से अजय नहीं बनता, तब तक ड्रैगन की कुटिल नजरों से पूरी तरह निजात पाना संभव नहीं है।
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