ग्राम पंचायत नौगांव में इंटरलॉकिंग भुगतान पर गंभीर सवाल, निजी खर्च से काम कराने वाले ग्रामीण का दावा—प्रधान व फर्म की भूमिका पर उठे सवाल

प्रवीण तिवारी Picture
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मीरजापुर

मीरजापुर। विकासखंड हलिया के ग्राम पंचायत नौगांव में मंदिर से किरण सिंह के घर तक बिछाई गई इंटरलॉकिंग को लेकर अब भुगतान और निर्माण कार्य की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जिस इंटरलॉकिंग को किरण सिंह ने अपने निजी खर्च से मजदूरी और सामग्री लगाकर बिछवाया, उसका भुगतान ग्राम प्रधान और संबंधित फर्म की मिलीभगत से करा लिया गया। मामले को लेकर ग्रामीण स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं तेज हैं और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

 

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बताया जा रहा है कि इंटरलॉकिंग कार्य के संबंध में जब जेई विनोद कुमार से बातचीत की गई तो उन्होंने इंटरलॉकिंग कार्य का भुगतान किए जाने की बात स्वीकार की। वहीं संबंधित फर्म के मालिक आशुतोष पांडेय ने बताया कि भुगतान दो हिस्सों में हुआ था। उनके अनुसार भुगतान में से एक लाख रुपये कमीशन के रूप में ग्राम प्रधान को दिए गए, जबकि शेष राशि के संबंध में सामग्री दिए जाने की बात कही गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

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इधर किरण सिंह का आरोप है कि इंटरलॉकिंग का पूरा काम उन्होंने अपने व्यक्तिगत पैसों से कराया है। उनका कहना है कि न तो उन्हें इंटरलॉकिंग की सामग्री के नाम पर कोई भुगतान मिला और न ही मजदूरी की रकम वापस की गई। किरण सिंह के मुताबिक यदि सरकारी धन से नियमानुसार इंटरलॉकिंग का निर्माण कराया गया होता तो सड़क की तैयारी से लेकर निर्माण की गुणवत्ता तक निर्धारित मानकों का पालन किया जाता, लेकिन मौके पर जमीन के ऊपर ही इंटरलॉकिंग बिछा दी गई है।

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किरण सिंह ने निर्माण की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि इंटरलॉकिंग के नीचे पर्याप्त आधार सामग्री नहीं डाली गई है और बॉर्डर भी सही तरीके से तैयार नहीं किया गया। उनका आरोप है कि इस्तेमाल की गई ईंटें भी बेहद घटिया गुणवत्ता की हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि काम मौके पर मानक के अनुरूप नहीं हुआ तो आखिर सरकारी भुगतान किस आधार पर और किसके नाम पर किया गया।

 

पूरे मामले ने ग्राम पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर होने वाले भुगतान और धरातल पर कार्य की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकारी धन से कार्य का भुगतान हुआ है तो मौके पर उसकी गुणवत्ता, माप, सामग्री और भुगतान से जुड़े अभिलेखों की जांच होना बेहद जरूरी है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इंटरलॉकिंग किसके द्वारा कराई गई, किसके नाम से भुगतान हुआ और भुगतान के बाद वास्तविक लाभार्थी कौन है।

 

मामले में लगाए गए कमीशन, भुगतान और घटिया निर्माण के आरोप बेहद गंभीर हैं। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इस प्रकरण की स्थलीय जांच कराकर भुगतान की प्रक्रिया, निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट करता है या फिर ग्राम पंचायत के इस कथित खेल पर पर्दा पड़ा रहता है। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तथा सरकारी धन के दुरुपयोग की स्थिति में धनराशि की वसूली की मांग की है।

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