आजादी का अमृत और आम आदमी

स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, यह आत्ममंथन का दिन भी है।

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राजीव शुक्ला

देश 79वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज पर खड़ा है। तिरंगा हर तरफ दिखाई दे रहा हैदेशभक्ति के गीत वातावरण में गूंज रहे हैं और आजादी के संघर्ष की स्मृतियां फिर से हमारे सामने हैं। इन 79 वर्षों में भारत ने निस्संदेह लंबा सफर तय किया है। कभी खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाला देश आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक भारत ने अपनी क्षमता का परिचय दिया है। सड़करेलबिजलीबैंकिंगमोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को बदला है।

लेकिन स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन भी है। सवाल यह नहीं कि भारत ने कितनी बड़ी इमारतें बनाईंकितने किलोमीटर सड़कें बनाई या अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई। असली सवाल यह है कि इन उपलब्धियों का लाभ उस सामान्य नागरिक तक कितना पहुंचाजिसके नाम पर विकास की पूरी राजनीति खड़ी की जाती हैकिसी देश की वास्तविक प्रगति का सबसे विश्वसनीय पैमाना उसकी राजधानी के चमकते रास्ते नहींबल्कि छोटे शहर के दुकानदारगांव के किसानकारखाने के मजदूरनौकरी तलाशता युवाबच्चों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करता परिवार और बीमारी के समय अस्पताल का खर्च उठाने वाला आम आदमी है। यही वह कसौटी है जिस पर आजादी के 79 वर्षों के सफर को परखना होगा। विकास की चमक और जिंदगी की वास्तविकता भारत में विकास दिखाई देता है। महानगरों में एक्सप्रेसवे हैंनए हवाई अड्डे हैंमेट्रो रेल हैडिजिटल भुगतान है और आधुनिक कारोबारी केंद्र हैं। छोटे शहर भी बदल रहे हैं। गांवों में सड़क और बिजली की पहुंच पहले की तुलना में बेहतर हुई है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने सूचना को लगभग हर हाथ तक पहुंचा दिया है। लेकिन विकास की यह तस्वीर पूरी कहानी नहीं है। एक तरफ भारत में तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में परिवार आज भी स्थायी और पर्याप्त आय की तलाश में हैं। एक तरफ डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार है और दूसरी तरफ रोजगार की गुणवत्तानियमित आमदनी और सामाजिक सुरक्षा की चिंता बनी हुई है। यही विरोधाभास आज के भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना महत्वपूर्ण हैलेकिन नागरिक की आर्थिक सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अगर किसी परिवार की आय बढ़ती महंगाई के सामने लगातार कमजोर पड़ रही हैअगर शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च उसके बजट को हिला देता हैअगर पढ़ा-लिखा युवा रोजगार के लिए वर्षों इंतजार करता हैतो केवल सकल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े उसकी चिंता को समाप्त नहीं कर सकते।

आम आदमी के लिए विकास का मतलब क्या है?

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सरकारों के लिए विकास के अनेक पैमाने हो सकते हैं। सकल घरेलू उत्पादऔद्योगिक उत्पादननिर्यातविदेशी निवेशसड़क निर्माणरेलवे परियोजनाएं और डिजिटल लेन-देन—ये सभी विकास की तस्वीर के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। लेकिन आम आदमी के लिए विकास की परिभाषा कहीं सरल है। उसके लिए विकास का अर्थ है—घर में पर्याप्त आमदनीबच्चों के लिए अच्छी शिक्षाबीमारी में सस्ता और गुणवत्तापूर्ण इलाजसुरक्षित रोजगारसम्मानजनक जीवनन्याय तक आसान पहुंच और भविष्य को लेकर भरोसा।

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एक किसान के लिए विकास का अर्थ केवल आधुनिक कृषि तकनीक नहींबल्कि उसकी उपज का उचित मूल्य और खेती को टिकाऊ बनाने वाली व्यवस्था भी है। एक मजदूर के लिए विकास का अर्थ केवल औद्योगिक परियोजना नहींबल्कि नियमित कामउचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा है।

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एक युवा के लिए विकास का अर्थ केवल स्टार्टअप या डिजिटल इंडिया नहींबल्कि अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी या व्यवसाय का वास्तविक अवसर है। एक छोटे व्यापारी के लिए विकास का अर्थ केवल बड़े बाजार नहींबल्कि ऐसा कारोबारी वातावरण है जिसमें वह बिना अनावश्यक दबाव के अपना व्यवसाय चला सके। और एक सामान्य परिवार के लिए विकास का सबसे बड़ा अर्थ है—महीने के अंत में घर का बजट न बिगड़े। आजादी के 79 वर्षों में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक विशाल युवा आबादी का निर्माण भी है। भारत का युवा वर्ग देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। लेकिन यही युवा वर्ग अगर रोजगार और अवसरों की कमी से निराश होता है तो यही ताकत चुनौती में बदल सकती है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी की तलाश में वर्षों भटकता युवा केवल अपना समय नहीं खोताबल्कि उसका आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है।

सरकारी नौकरियां सीमित हैं और निजी क्षेत्र में भी हर नौकरी स्थायी सुरक्षा नहीं देती। 79 साल बाद सवाल वही है

79 साल पहले भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियां तोड़ी थीं। आज हमारे सामने बेड़ियों का स्वरूप अलग है—गरीबीबेरोजगारीअसमानतामहंगाईभ्रष्टाचारन्याय में देरीअवसरों की असमानता और व्यवस्था के प्रति नागरिक का अविश्वास।

इनसे लड़ाई किसी एक सरकारदल या विचारधारा की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी है।

आज जब हम तिरंगे को सलाम करेंगे तो हमें अपनी उपलब्धियों पर गर्व जरूर करना चाहिए। लेकिन गर्व के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है।

क्योंकि स्वतंत्रता दिवस का अर्थ केवल यह याद करना नहीं कि हम आजाद हुए थे।

इसका अर्थ यह पूछना भी है कि क्या देश का अंतिम नागरिक अपने जीवन में उस आजादी को महसूस कर पा रहा हैभारत ने 79 वर्षों में बहुत कुछ हासिल किया है। अब चुनौती यह है कि विकास की चमक और आम आदमी की जिंदगी के बीच की दूरी कम की जाए। जब देश की आर्थिक प्रगति का लाभ शहर से गांव तकउद्योग से मजदूर तकतकनीक से सामान्य नागरिक तक और सरकारी योजना से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगातभी विकास का दावा वास्तविक अर्थ में सफल माना जाएगा। आजादी का अमृत तभी सार्थक होगाजब उसका स्वाद देश के हर नागरिक की जिंदगी में महसूस हो। तिरंगा केवल आसमान में ऊंचा न हो—हर भारतीय का जीवन भी सम्मानअवसर और सुरक्षा के साथ उतना ही ऊंचा उठे। यही स्वतंत्रता के अगले पड़ाव की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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