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बाग़ी नेता: सिद्धांत या मजबूरी?
उत्तर प्रदेश में एक नई बहस शुरू हो गई है कि समाजवादी पार्टी में एक बड़ी टूट होने जा रही है।
उत्तर प्रदेश में एक नई बहस शुरू हो गई है कि समाजवादी पार्टी में एक बड़ी टूट होने जा रही है। एनडीए समर्थित कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने अपने ट्विटर अकाउंट से यह दाबा किया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा के 20 से 22 सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार बैठे हैं। सोशल मीडिया पर बाकायदा इनके नाम भी आ चुके हैं लेकिन अब इसमें कितना सच है और कितना झूठ ये तो वक्त ही बताएगा। हां ये तो आजकल की राजनीति में संभव है कि कुछ भी हो सकता है। जिन समाजवादी पार्टी के सांसदों के नाम लिये जा रहे हैं उन्होंने सोशल मीडिया पर आकर सफाई भी दी है कि भाई ऐसा कुछ नहीं है। उधर महाराष्ट्र मुंबई में भी उद्धव ठाकरे की शिव सेना पर भी ऐसे ही कुछ दावे किए जा रहे हैं। एकनाथ शिंदे ने स्पष्ट किया है आगे आगे देखो होता है क्या वहीं उद्धव ठाकरे ने कह दिया है कि बागी नेता सत्ता के साथ रहना चाहते हैं इसलिए ये टूट आसानी से की जातीं हैं। "पार्टी छोड़ दी, लेकिन जनता की सेवा नहीं छोड़ी।" ये लाइन हर बाग़ी नेता के प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुनाई देती है। लेकिन सच ये है कि 10 में से 8 बाग़ी नेता 6 महीने के अंदर सत्ता के साथ खड़े मिलते हैं। सवाल ये है - ये विचारधारा का संघर्ष है या सियासी सर्वाइवल का गणित? बाग़ी बनते क्यों हैं नेता इस पर एक ही सवाल सामने निकल कर आता है कि सब सत्ता की शरण में रहना चाहते हैं टिकट और पद न मिलने पर- चुनाव से 6 महीने पहले बगावत का मौसम शुरू होता है। जब हाईकमान किसी और को टिकट देता है, तो पुराना नेता "सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकता" कहकर निकल लेता है। अंदरूनी गुटबाजी- पार्टी में दो खेमे बन जाते हैं। जो हारता है, वो अक्सर बाग़ी बन जाता है। महाराष्ट्र में शिंदे-ठाकरे और अजित पवार-शरद पवार दोनों इसी कहानी के दो हिस्से हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियों का दबाव- ED, CBI, IT के नोटिस के बाद कई नेता पाला बदल लेते हैं। विपक्ष इसे "वॉशिंग मशीन" कहता है। सत्ता पक्ष कहता है "भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हो रही है"।
सत्ता से बाहर रहने का डर- क्षेत्रीय नेता जानते हैं कि 5 साल विपक्ष में रहने का मतलब है फंड, ठेके, कार्यकर्ताओं का टूटना। इसलिए वो सत्ता के करीब रहते हैं। बाग़ी सत्ता के साथ क्यों लौटते हैं?
कार्यकर्ता साथ नहीं छोड़ता- नेता अकेले नहीं चलता। उसके साथ 200-300 कार्यकर्ता होते हैं। अगर वो 5 साल विपक्ष में रहा, तो कार्यकर्ता बेरोजगार हो जाते हैं। ठेके बंद, पुलिस केस, दबाव। इसलिए नेता कहता है "जनता के हित में फैसला लिया"। विकास के नाम पर सौदेबाजी- "अगर मैं सत्ता में नहीं रहूंगा तो मेरा क्षेत्र पिछड़ जाएगा।" ये नैरेटिव वोटर को भी समझ आता है। कई बार सत्ता पक्ष बाग़ी को मंत्री बना देता है, बदले में वो अपने 5-10 विधायक साथ ले आता है। कानूनी बचाव-
दलबदल विरोधी कानून में एक खामी है। अगर 2/3 विधायक साथ हों तो अयोग्यता नहीं लगती। ये "विलय" कहलाता है। इसलिए बाग़ी पूरी गुटबंदी लेकर चलते हैं, अकेले नहीं। जनता की याददाश्त कमजोर होती है- 6 महीने बाद लोग भूल जाते हैं कि नेता ने किस पर आरोप लगाए थे। अगले चुनाव में वही नेता सत्ता पक्ष के सिंबल पर खड़ा होता है और जीत भी जाता है। इससे लोकतंत्र को क्या नुकसान होता है? जनादेश का अपमान- तुमने 2019 में पार्टी A को वोट दिया। 2022 में विधायक पार्टी B में चला गया। सरकार गिर गई। ये जनता का फैसला नहीं, विधायकों का सौदा बन जाता है। नीतियां अस्थिर होती हैं- 5 साल का प्रोजेक्ट 2 साल में बदल जाता है क्योंकि सरकार बदल गई। इंवेस्टर को भरोसा नहीं रहता। कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है- जो 10 साल से पार्टी के लिए लड़ा, वो देखता है कि बाहर से आया नेता मंत्री बन गया। फिर अगली बार वो भी बगावत का मन बनाता है। भरोसे का संकट-
CSDS के सर्वे में 62% लोगों ने कहा कि "नेता सिर्फ सत्ता के लिए पाला बदलते हैं"। ये अविश्वास लोकतंत्र की जड़ कमजोर करता है। क्या कहते हैं आंकड़े?
2014 से 2024 के बीच 450 से ज्यादा विधायक और सांसद ने पार्टी बदली। महाराष्ट्र: 2022-2024 में शिवसेना और NCP दोनों टूटीं। 40 से ज्यादा विधायक सत्ता पक्ष में चले गए। मध्य प्रदेश: 2020 में 22 कांग्रेस विधायक BJP में गए, सरकार गिर गई। बिहार: JDU ने 2017, 2022, 2024 में गठबंधन बदला। अधिकांश मामलों में बाग़ी नेता या तो मंत्री बने या बड़ी जिम्मेदारी मिली। क्या कोई रोक है? दलबदल विरोधी कानून 1985 बना था, लेकिन:
- स्पीकर का फैसला सालों लटकता है। तब तक विधायक मजा लेता है। 2/3 वाली छूट ने कानून को बेअसर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा कि स्पीकर 3 महीने में फैसला करें, लेकिन फॉलोअप नहीं होता। रास्ता क्या है? 2/3 वाली छूट खत्म करो*: अगर विधायक पार्टी छोड़ता है तो सीट खाली घोषित हो। 6 महीने में उपचुनाव हो। जनता फिर फैसला करे। फंडिंग ट्रांसपेरेंट हो- नेताओं के पास अचानक पैसा कहां से आता है, इसका हिसाब हो।
पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र- अगर कार्यकर्ता को लगेगा कि उसकी सुनी जाती है, तो बगावत कम होगी। वोटर की जवाबदेही- जब बाग़ी नेता दोबारा आए तो वोटर पूछे - "तुमने पार्टी बदली, मेरी समस्या बदली क्या?" बाग़ी नेता सत्ता के साथ रहना चाहते हैं क्योंकि राजनीति अब सेवा कम, सर्वाइवल ज्यादा बन गई है। नेता के पास दो रास्ते हैं - या तो 5 साल विपक्ष में रहकर लड़ो, या सत्ता के साथ रहकर काम करो। ज्यादातर दूसरा रास्ता चुनते हैं। समस्या नेता में नहीं, सिस्टम में है। जब तक दलबदल का फायदा नुकसान से ज्यादा होगा, तब तक ये सिलसिला नहीं रुकेगा। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब वोटर ये समझ ले कि वोट व्यक्ति को नहीं, पार्टी और सिद्धांत को जाता है। और जब सिद्धांत बिक जाए, तो अगली बार उस चेहरे को नकार दे।


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