सीईसी के विरोध में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन लोकतंत्र की रक्षा या संस्थाओं पर दबाव?
इसी आधार पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष तथा सत्तापक्ष के बीच टकराव अब राजनीतिक बहस से निकलकर सड़क तक पहुंच गया है। इंडिया गठबंधन के मार्च, धरने और प्रदर्शन ने इस विवाद को और तीखा कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण तथा पिछले चुनावों में कथित वोट चोरी के आरोप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। उसका दावा है कि यदि किसी वैध मतदाता का नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाया जाता है अथवा चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया जाता है तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है। इसी आधार पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
विपक्ष इस आंदोलन को संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। राहुल गांधी सहित इंडिया गठबंधन के नेताओं का तर्क है कि मतदाता सूची शुद्ध और पारदर्शी होना लोकतंत्र की पहली शर्त है। उनका कहना है कि चुनाव में जनता को बिना किसी भय और संदेह के अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने वोट बचाओ, देश बचाओ जैसे अभियान के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी कर रहा है और आरोप लगा रहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंच सकता है।
इसी विवाद के बीच इंडिया गठबंधन के मार्च ने राजनीतिक वातावरण को और गरमा दिया। सुबह करीब दस बजे शुरू हुए मार्च को संसद मार्ग पर रोक दिया गया। कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। इसके बाद राहुल गांधी आकाशवाणी भवन की ओर चले गए और वहां लंबे समय तक धरने पर बैठे रहे। राहुल गांधी सीईसी से मिलने की मांग पर अड़े रहे। उनके साथ प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेता भी मौजूद रहे। करीब सात घंटे तक चले घटनाक्रम के बाद रात लगभग आठ बजे पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बस में बैठाकर वहां से हटाया। इससे पहले राहुल गांधी के बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराने की तस्वीरें भी चर्चा में रहीं। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की बात कही और कथित वोट चोरी को देश के साथ गंभीर विश्वासघात के रूप में पेश किया।
दूसरी ओर चुनाव आयोग इन आरोपों को निराधार और गैर-जिम्मेदाराना बताता रहा है। आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची का संशोधन एक नियमित और कानूनी प्रक्रिया है। नए मतदाताओं के नाम जोड़ना, मृत अथवा स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना और सूची को अद्यतन करना चुनाव व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है। आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया को राजनीतिक आरोपों के आधार पर पक्षपातपूर्ण बताना उचित नहीं है। सत्तापक्ष भी विपक्ष के आरोपों को संवैधानिक संस्था पर दबाव बनाने की राजनीति बता रहा है।
भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आंदोलन पर तीखी प्रतिक्रिया दी। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं की छवि खराब करने के लिए बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं और ऐसी राजनीति देश को अराजकता की ओर ले जा सकती है। भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी की राजनीतिक शैली और कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर भी सवाल उठाए। संबित पात्रा तथा सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर राजनीतिक संघर्ष को संस्थागत टकराव में बदलने का आरोप लगाया।
विवाद केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। आगरा में ज्ञानेश कुमार के आवास से जुड़ी घटना ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ाया। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, पूर्व में उनके घर पर कथित तौर पर वोट चोर और गद्दार जैसे शब्द लिखे जाने के बाद महिलाओं ने कलश यात्रा निकालकर गंगाजल का छिड़काव किया और सुंदरकांड का पाठ किया। ऐसी घटनाएं यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि राजनीतिक विरोध की सीमा आखिर कहां तक होनी चाहिए। किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान, धमकी या परिवार को विवाद में घसीटना लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके के जंतर-मंतर प्रदर्शन को बांग्लादेश और नेपाल के आंदोलनों से जोड़ने की चर्चा भी सामने आई। दिपके ने ऐसी तुलना को खारिज करते हुए कहा कि उनका आंदोलन भारत के स्थानीय राजनीतिक और चुनावी मुद्दों पर आधारित है। सोशल मीडिया पर बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी द्वारा सीजेसी के समर्थन के दावे वाली तस्वीरों और संदेशों को लेकर भी विवाद हुआ। उपलब्ध तथ्य-जांच सामग्री में ऐसे कुछ दावों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए गए फर्जी दावों के रूप में बताया गया है। इसलिए बिना प्रमाण किसी विदेशी संगठन अथवा बाहरी शक्ति से आंदोलन को जोड़ना भी उचित नहीं होगा।
मतदाता सूची को लेकर विवाद भारत की राजनीति में नया नहीं है। अलग-अलग दल चुनाव दर चुनाव मतदाता सूचियों में मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित मतदाताओं अथवा कथित फर्जी नामों की शिकायतें उठाते रहे हैं। लेकिन किसी भी आरोप को प्रमाणित करने के लिए ठोस दस्तावेज, जांच और कानूनी प्रक्रिया आवश्यक है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती है। यदि विपक्ष के पास गंभीर प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने, निर्वाचन आयोग के समक्ष रखने और न्यायिक प्रक्रिया में जाने का रास्ता खुला है। दूसरी ओर आयोग पर भी यह जिम्मेदारी है कि वह उठाए गए सवालों का पारदर्शी और तथ्यपूर्ण जवाब दे, ताकि मतदाताओं का विश्वास मजबूत बना रहे।
विरोध जरूरी लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा भी सर्वोपरि
लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी है। चुनाव आयोग जैसी संस्था से सवाल पूछना भी लोकतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता। यदि मतदाता सूची को लेकर वास्तविक संदेह है तो विपक्ष को उसे मजबूती से उठाना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि विरोध का तरीका कैसा हो। संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसलिए किसी संस्था की आलोचना तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि ऐसे आरोपों और नारों के माध्यम से जिनसे संस्था की विश्वसनीयता पर बिना न्यायिक निष्कर्ष के अंतिम फैसला सुनाया जाने लगे।
देशद्रोह या गद्दारी जैसे गंभीर आरोप राजनीतिक मंच से तय नहीं किए जा सकते। किसी अधिकारी या संस्था के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तभी उचित होगी जब कानून के अनुसार आरोप प्रमाणित हों और सक्षम जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया उसका आधार बने। लोकतांत्रिक अधिकारों के कथित उल्लंघन को गंभीरता से लेना जरूरी है, लेकिन उसे स्वतः देशद्रोह की श्रेणी में रखना भी कानूनी दृष्टि से उचित नहीं है। यही बात सत्तापक्ष पर भी लागू होती है। केवल इसलिए कि आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए हैं, उन्हें बिना जांच के खारिज कर देना भी जनता के विश्वास के लिए उचित नहीं होगा।
वास्तविक चुनौती यही है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष दिखाई ही नहीं, बल्कि उसकी प्रत्येक प्रक्रिया में पारदर्शिता भी दिखाई दे और विपक्ष भी अपने आरोपों को प्रमाणों के साथ सामने रखे। सरकार को भी चाहिए कि वह आलोचना का जवाब राजनीतिक कटाक्ष से अधिक तथ्यात्मक ढंग से दे। विपक्ष को आंदोलन का अधिकार है, लेकिन आंदोलन को ऐसी स्थिति तक नहीं पहुंचना चाहिए जहां सरकारी कामकाज बाधित हो, कानून-व्यवस्था संकट में पड़े या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के व्यक्तिगत सम्मान को चोट पहुंचे।
इस पूरे घटनाक्रम में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए एक बड़ा सबक है। चुनाव लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं और मतदाता उसका केंद्र है। मतदाता सूची पर संदेह हो तो उसे दूर करना सत्ता की जिम्मेदारी है और प्रमाणित गड़बड़ी सामने लाना विपक्ष की। लेकिन सड़क का संघर्ष संविधान से ऊपर नहीं हो सकता और सत्ता की ताकत भी लोकतांत्रिक सवालों से ऊपर नहीं हो सकती। इसलिए वर्तमान विरोध तभी देश और लोकतंत्र के लिए सार्थक माना जाएगा, जब उसका लक्ष्य किसी व्यक्ति या संस्था को अपमानित करना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में जनता के विश्वास को और मजबूत करना हो। यही स्वस्थ लोकतंत्र की असली कसौटी है।
कांतिलाल मांडोत
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