AI का दौर और इंसान का रोजगार

इसका असर केवल नौकरी बाजार पर नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षा, उपभोग और सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा

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राजीव शुक्ला

तकनीक ने हमेशा इंसान की जिंदगी को बदलने का काम किया है। पहिए से लेकर इंटरनेट तक और कंप्यूटर से लेकर स्मार्टफोन तकहर बड़ी तकनीकी क्रांति ने काम करने का तरीका बदला है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI जिस तेजी से हमारी दुनिया में प्रवेश कर रहा हैवह पिछली तकनीकी क्रांतियों से कुछ अलग है। इस बार मशीनें केवल इंसान की ताकत या गति की बराबरी नहीं कर रहींबल्कि वे पढ़नेलिखनेविश्लेषण करनेअनुवाद करनेचित्र बनानेकोड तैयार करने और निर्णय लेने में भी इंसान की सहायता करने लगी हैं।

यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि AI कितना शक्तिशाली होगाबल्कि यह है कि AI के बढ़ते प्रभाव के बीच इंसान का रोजगार और उसकी भूमिका क्या होगीयह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत जैसे युवा देश में रोजगार केवल आर्थिक आवश्यकता नहींबल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार भी है। करोड़ों युवा शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में हैं। यदि आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे काम स्वचालित हो जाते हैं जिन पर आज मनुष्य निर्भर हैतो इसका असर केवल नौकरी बाजार पर नहींबल्कि परिवारशिक्षाउपभोग और सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा। मशीनें नौकरी छीनेंगी या काम का स्वर

AI को लेकर सबसे बड़ी चिंता यही है कि मशीनें इंसानों की नौकरियां छीन लेंगी। यह चिंता पूरी तरह निराधार भी नहीं है। डेटा एंट्रीसामान्य ग्राहक सेवासाधारण कंटेंट तैयार करनाअनुवाददस्तावेजों का प्रारंभिक विश्लेषण और कुछ प्रकार के प्रशासनिक कार्यों में AI पहले ही बदलाव ला रहा है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि तकनीकी परिवर्तन हमेशा केवल रोजगार खत्म नहीं करते। वे नए रोजगार पैदा भी करते हैं। जब कंप्यूटर आया थातब अनेक लोगों को लगा था कि कार्यालयों में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों की जरूरत समाप्त हो जाएगी। कुछ पुराने काम निश्चित रूप से खत्म हुएलेकिन कंप्यूटर ऑपरेटरसॉफ्टवेयर इंजीनियरडिजिटल डिजाइनरसाइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और अनेक नई भूमिकाएं भी पैदा हुईं। AI के साथ भी ऐसा हो सकता है।

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अंतर केवल इतना है कि इस बार परिवर्तन की गति बहुत तेज है। इसलिए नई नौकरियां पैदा होने और पुराने रोजगार खत्म होने के बीच यदि पर्याप्त समय और प्रशिक्षण नहीं मिलातो बड़ी संख्या में लोग संक्रमणकाल में बेरोजगारी का सामना कर सकते हैं। असली खतरा AI नहींकौशल की कमी है। AI को रोजगार का दुश्मन मान लेना शायद समस्या का सही समाधान नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि क्या हमारा शिक्षा और प्रशिक्षण तंत्र युवाओं को उस भविष्य के लिए तैयार कर रहा हैजिसमें AI रोजमर्रा के काम का हिस्सा होगा?

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आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा परीक्षा और डिग्री पर केंद्रित है। नौकरी बाजार तेजी से बदल रहा हैलेकिन पाठ्यक्रम अक्सर उसी गति से नहीं बदलते। कल का कर्मचारी केवल यह जानकर सफल नहीं होगा कि कंप्यूटर कैसे चलाना है। उसे यह भी समझना होगा कि AI से बेहतर परिणाम कैसे लिए जाएंउसके उत्तरों की सत्यता कैसे जांची जाए और उसके इस्तेमाल में नैतिक सीमाएं क्या हैं। इसलिए आने वाले समय में AI से प्रतिस्पर्धा करने वाले कर्मचारी से ज्यादा महत्वपूर्ण AI के साथ काम करने वाला कर्मचारी होगा। AI भारत के लिए खतरा जितना हैउससे कहीं बड़ा अवसर भी हो सकता है। भारत के पास विशाल युवा आबादीमजबूत आईटी क्षेत्रतकनीकी प्रतिभा और दुनिया भर में सेवाएं देने का अनुभव है।

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यदि AI को केवल नौकरी खत्म करने वाली मशीन के बजाय उत्पादकता बढ़ाने वाले उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो छोटे कारोबारी से लेकर बड़े उद्योग तक इसका लाभ उठा सकते हैं। एक छोटा व्यापारी AI की मदद से बाजार का विश्लेषण कर सकता है। किसान मौसमबाजार और फसल संबंधी जानकारी के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ सकता है। शिक्षक विद्यार्थियों के लिए व्यक्तिगत अध्ययन सामग्री तैयार कर सकता है। डॉक्टरों के लिए AI जांच और सूचना विश्लेषण में सहायक हो सकता है। सरकारी विभाग आंकड़ों के विश्लेषण और सेवाओं की निगरानी को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

अर्थात सवाल यह नहीं होना चाहिए कि AI इंसान को हटाएगा या नहींबल्कि यह होना चाहिए कि इंसान AI का इस्तेमाल करके अपनी क्षमता कितनी बढ़ा सकता है। लेकिन हर व्यक्ति समान स्थिति में नहीं होगा। यहीं से AI की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती सामने आती है। जिस व्यक्ति के पास बेहतर शिक्षाडिजिटल संसाधन और नई तकनीक सीखने का अवसर होगावह AI से लाभ उठा सकता है। लेकिन जिसके पास न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हैन इंटरनेट की पर्याप्त सुविधा और न प्रशिक्षण का अवसरउसके लिए AI रोजगार का संकट बढ़ा सकता है। इससे समाज में एक नई आर्थिक खाई पैदा हो सकती है।

यदि सरकार और निजी क्षेत्र ने समय रहते इस अंतर को कम नहीं कियातो तकनीकी विकास आर्थिक असमानता को और बढ़ा सकता है। AI की चर्चा अक्सर कारखानों और कम-कौशल वाले कामों तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है। आज AI लेखनडिजाइनप्रोग्रामिंगकानूनी दस्तावेजों के प्रारंभिक विश्लेषणवित्तीय रिपोर्टों और शोध जैसे कई क्षेत्रों में सहायता कर रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि डॉक्टरवकीलपत्रकारशिक्षक या इंजीनियर समाप्त हो जाएंगे। बल्कि उनके काम का स्वरूप बदलेगा। भविष्य में शायद एक पत्रकार से केवल खबर लिखने की अपेक्षा नहीं होगीबल्कि उससे यह भी अपेक्षा होगी कि वह AI से प्राप्त सूचना की विश्वसनीयता जांच सके। एक शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रहेगाबल्कि विद्यार्थियों को सही डिजिटल और बौद्धिक दिशा देने वाला मार्गदर्शक बनेगा।

यानी नौकरी से ज्यादा महत्वपूर्ण नौकरी के भीतर बदलती भूमिका होगी। AI के दौर में सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल निवेश आकर्षित करना या तकनीकी कंपनियों को बढ़ावा देना नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी परिवर्तन का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचे। इसके लिए स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर AI तथा डिजिटल कौशल को व्यावहारिक शिक्षा से जोड़ना होगा। युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर पुनःकौशल और कौशल-वृद्धि कार्यक्रम चलाने होंगे। छोटे कारोबारियों और पारंपरिक व्यवसायों को भी नई तकनीक अपनाने में मदद करनी होगी। साथ ही श्रम कानूनों और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी नए सिरे से विचार करना होगा। यदि किसी उद्योग में तकनीकी बदलाव के कारण कर्मचारियों की संख्या कम होती हैतो प्रभावित कर्मचारियों को दोबारा प्रशिक्षण और नए रोजगार की दिशा में सहायता मिलनी चाहिए। AI जितना भी विकसित हो जाएइंसान की कुछ क्षमताएं ऐसी हैं जिन्हें केवल तकनीकी दक्षता से नहीं बदला जा सकता।

संवेदनशीलतानैतिक विवेकसामाजिक समझनेतृत्वरचनात्मक सोचसंवाद और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। मशीन बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण कर सकती हैलेकिन उस जानकारी का सामाजिक अर्थ क्या है और उसका इस्तेमाल किस सीमा तक होना चाहिए—यह सवाल अंततः मनुष्य को ही तय करना होगा। इसलिए भविष्य का सबसे मूल्यवान कर्मचारी वह नहीं होगा जो मशीन से लड़ने की कोशिश करेगाबल्कि वह होगा जो मशीन की क्षमता और मानवीय विवेक को एक साथ इस्तेमाल करना जानता होगा।

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