एक कलाकार से कहीं बड़ा बन गया एक नाम — किशोर कुमार

हर घर की अपनी कहानी थी, पर धुन अक्सर एक ही थी, कुछ आवाज़ें इतिहास नहीं बनतीं, जीवन का स्वभाव बन जाती हैं

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कृति आरके जैन

समय बहुत कुछ छीन लेता हैलेकिन कुछ स्वर उसकी पकड़ से बाहर रह जाते हैं। वे उम्र नहीं गिनतेपीढ़ियाँ जोड़ते हैं। जब भी वे सुनाई देते हैंमन के बंद दरवाज़े बिना आहट खुलने लगते हैं। किशोर कुमार उसी विरल परंपरा के कलाकार हैं। अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे आभास कुमार गांगुली ने संगीत को केवल मनोरंजन नहीं रहने दियाउसे मनुष्य की निजी स्मृतियों का सबसे विश्वसनीय साथी बना दिया। उनकी जयंती इसलिए याद रहती है क्योंकि यह उस आवाज़ का दिन है जिसने हँसी को भी सुर दिया और पीड़ा को भी गरिमा। उनके स्वर में जीवन के लगभग सभी रंग बसते थे। इसलिए उनका हर गीत सुनते ही बीता हुआ समय अनायास वर्तमान में लौट आता है।

बड़े कलाकार जन्म से नहींसाधना से पहचान पाते हैं। खंडवा के आभास कुमार गांगुली की यात्रा भी ऐसी ही थी। पिता कुंजीलाल गांगुली वकील थेबड़े भाई अशोक कुमार सिनेमा में स्थापित। उनके बुलावे पर वे मुंबई पहुँचे। 'शिकारीसे अभिनय शुरू हुआपर मन गायकी में रमा। संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिलीसुननाआत्मसात करना और स्वर देना ही उनकी साधना थी। आरंभ में के.एल. सहगल का प्रभाव रहालेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। 'ज़िद्दीका 'मरने की दुआएँ क्यों माँगूँपहली बड़ी पहचान बना। फिर 1969 में 'आराधनाने इतिहास रच दिया। 'मेरे सपनों की रानीऔर 'रूप तेरा मस्तानाने सिद्ध किया कि कई बार नायक से पहले उसकी आवाज़ लोगों के दिलों पर राज करती है।

जब कोई कलाकार भावनाओं की भाषा बन जाता हैतब उसके गीत समय की सीमा नहीं मानते। किशोर कुमार के लिए सत्तर का दशक ऐसा ही स्वर्णकाल था। 'चिंगारी कोई भड़केमें विरह की आँच है, 'ये शाम मस्तानीमें जीवन की खुली मुस्कान, 'ये जो चिलमन हैमें चंचल शरारत और 'ज़िंदगी के सफर मेंमें समय का निर्विकार सत्य। 'मेरे सामने वाली खिड़की मेंयह साबित करता है कि हँसी भी उतनी ही गहरी कलात्मक अभिव्यक्ति हो सकती है जितनी करुणा। लगभग सत्ताईस सौ गीतों का उनका संसार केवल उपलब्धि नहींभारतीय संवेदनाओं का जीवित अभिलेख है। प्रेमपीड़ामस्तीदर्शनआशा और निराशा—मानवीय अनुभव का शायद ही कोई रंग हो जिसे उनकी आवाज़ ने स्पर्श न किया हो।

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बहुत कम आवाज़ें चेहरों नहींव्यक्तित्वों की पहचान बनती हैं। किशोर कुमार का स्वर किसी एक नायक तक सीमित नहीं रहा। राजेश खन्ना की रोमानी आभाअमिताभ बच्चन का तेजदेव आनंद की चपलता और धर्मेंद्र की देसी सहजता—हर रूप में सहज ढल गया। आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जुगलबंदी ने हिंदी फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं। 'दम मारो दम', 'जाने जाँ ढूँढ़ता फिर रहाऔर 'चुरा लिया है तुमनेने युवाओं की धड़कनों को नई लय दी। एस.डी. बर्मनलक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी के साथ उन्होंने अनगिनत कालजयी गीत रचे। 'हमें तुमसे प्यार कितना', 'हाय रे वो दिन क्यों न आएऔर 'खाइके पान बनारस वालाबताते हैं कि उनकी आवाज़ हर भाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी।

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कुछ लोग अपनी कला से पहचाने जाते हैंकुछ अपनी कला की सीमाएँ तोड़कर। किशोर कुमार दूसरी श्रेणी के कलाकार थे। गायकी उनकी पहचान अवश्य बनीपर अभिनेतासंगीतकारगीतकार और फिल्मकार के रूप में भी उन्होंने 'झुमरू', 'दूर गगन की छाँव मेंऔर 'दूर का राहीजैसी फिल्मों से गहरी मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी। 'दूर गगन की छाँव मेंआज भी एक सैनिक के मन की सबसे मार्मिक सिनेमाई अभिव्यक्तियों में गिनी जाती है। कला के सम्मान पर समझौता उन्हें स्वीकार नहीं था। पारिश्रमिक न मिलने पर आधा मेकअप लगाकर सेट पर पहुँचना या आधा गीत छोड़ देना इसी स्वाभिमान की मिसाल था।

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हर मधुर स्वर अपने हिस्से की खामोशी भी ढोता है। किशोर कुमार का जीवन भी इससे अछूता नहीं रहा। रुमा गुहा ठाकुरतामधुबालायोगिता बाली और लीना चंदावरकर के साथ उनके चार विवाह हुएपर मधुबाला का साथ हिंदी सिनेमा की सबसे मार्मिक प्रेमकथाओं में गिना जाता है। उनकी बीमारी और असमय निधन ने किशोर कुमार को भीतर तक बदल दिया। उस दर्द की प्रतिध्वनि उनके अनेक दर्दभरे गीतों में महसूस होती है। 13 अक्टूबर 1987 को मात्र अट्ठावन वर्ष की आयु में हृदयाघात ने उनकी जीवन-यात्रा थाम दी। अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर खंडवा लाया गया। वे लौट तो अपनी जन्मभूमि आएपर भारतीय संगीत में जो सन्नाटा छोड़ गएवह आज भी वैसा ही गूँजता है।

लोकप्रियता समय के साथ धुंधली पड़ सकती हैलेकिन सच्ची कला हर दौर की कसौटी पर और अधिक उजली होकर लौटती है। किशोर कुमार की आवाज़ इसका जीवंत प्रमाण है। 'जीवन के सफर में राहीआज भी आगे बढ़ने का विश्वास जगाता हैजबकि 'कुछ तो लोग कहेंगेसमाज की रूढ़ मानसिकता पर आज भी उतनी ही पैनी चोट करता है। यही उनकी कला की सबसे बड़ी विजय है कि उनके गीत मनोरंजन की सीमाएँ लाँघकर जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन गए। इसलिए उनकी आवाज़ हर पीढ़ी में नए अर्थनई आत्मीयता और नई प्रासंगिकता के साथ सुनाई देती है।

समय अंततः उसी कला के आगे ठहरता हैजिसमें मनुष्य अपने जीवन का अक्स पहचान ले। किशोर कुमार की विरासत इसी सत्य की साक्षी है। खंडवा से निकला उनका स्वर अमरता तक इसलिए पहुँचा क्योंकि उसमें बनावट नहींसच्चाई थीप्रदर्शन नहींसंवेदना थी। उन्होंने सिद्ध किया कि सच्ची कला हर दौर में नए अर्थों के साथ जीवित रहती है। जब तक किसी उत्सव में उनके गीत मुस्कान बनकर गूँजेंगेकिसी अकेले मन को उनका स्वर संबल देगाकिसी प्रेम में उनकी धुन धड़केगी और जीवन की राह पर कोई मुसाफिर उन्हें गुनगुनाएगातब तक किशोर दा स्मृति नहींभारतीय जनमानस की जीवित धड़कन बने रहेंगे।

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