अहिंसा कायरता नहीं बल्कि मानवता का उज्ज्वल प्रतीक
अहिंसा विवेकपूर्ण साहस का मार्ग है न कि निष्क्रियता का
अहिंसा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह केवल हिंसा का अभाव नहीं बल्कि प्रेम करुणा दया सहिष्णुता और आत्मबल का ऐसा महान संदेश है जो मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। अहिंसा मनुष्य को दुर्बल नहीं बनाती बल्कि उसके भीतर साहस संयम और आत्मविश्वास का संचार करती है। यही कारण है कि भारतीय मनीषियों ने अहिंसा को धर्म का सर्वोच्च स्वरूप माना है। अहिंसा का अर्थ किसी भी जीव को मन वचन और कर्म से कष्ट न पहुंचाना है। यह केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रहती बल्कि परिवार समाज राष्ट्र और पूरे विश्व को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाती है।
अहिंसा की दृष्टि अत्यंत व्यापक और विराट है। इसमें संकीर्णता के लिए कोई स्थान नहीं है। यह किसी जाति धर्म भाषा प्रदेश अथवा संप्रदाय की सीमाओं में बंधी हुई विचारधारा नहीं है। जिस प्रकार गंगा का निर्मल जल सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध रहता है उसी प्रकार अहिंसा भी संपूर्ण मानवता के लिए समान रूप से उपयोगी है। यदि इसे किसी विशेष वर्ग या समुदाय तक सीमित कर दिया जाए तो इसका वास्तविक स्वरूप नष्ट हो जाएगा। अहिंसा का संदेश समस्त विश्व के लिए है और इसकी शक्ति किसी भी हथियार से अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि अहिंसा ने अनेक बार असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को संभव बनाया है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजी शासन जैसी विशाल शक्ति को चुनौती दी। उन्होंने न तो हथियार उठाए और न ही हिंसा का सहारा लिया। फिर भी सत्याग्रह असहयोग आंदोलन और दांडी यात्रा जैसे आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध दिया। करोड़ों भारतीयों की नैतिक शक्ति के सामने अंग्रेजी साम्राज्य को झुकना पड़ा। यह सिद्ध हो गया कि आत्मबल और सत्य पर आधारित अहिंसा किसी भी सैन्य शक्ति से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
अहिंसा का अर्थ कभी भी कायरता नहीं होता। कायर व्यक्ति भय के कारण संघर्ष से बचता है जबकि अहिंसक व्यक्ति अन्याय का सामना साहस और आत्मविश्वास के साथ करता है। अहिंसा वीरों का धर्म है क्योंकि इसके लिए अत्यंत धैर्य त्याग और आत्मसंयम की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति क्रोध और प्रतिशोध की भावना पर विजय प्राप्त कर लेता है वही वास्तविक अर्थों में वीर कहलाता है। हिंसा करना सरल हो सकता है किंतु क्षमा करना और शांति बनाए रखना कहीं अधिक कठिन है। इसलिए अहिंसा दुर्बलों का नहीं बल्कि आत्मबल से परिपूर्ण व्यक्तियों का मार्ग है।
अहिंसा मनुष्य को यह शिक्षा देती है कि वह अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे के अधिकारों का हनन न करे। प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। किसी भी समाज या राष्ट्र के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। विवाद चाहे व्यक्तिगत हो या अंतरराष्ट्रीय उसका समाधान संवाद समझदारी और शांतिपूर्ण प्रयासों से खोजा जाना चाहिए। यदि शांति स्थापित करने के लिए त्याग और बलिदान देना पड़े तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। यही सच्ची अहिंसा का स्वरूप है।
यह भी सत्य है कि अहिंसा अन्याय को सहन करने की शिक्षा नहीं देती। अन्याय करना जितना बड़ा अपराध है उतना ही बड़ा अपराध अन्याय को कायरता के कारण स्वीकार कर लेना भी है। यदि किसी व्यक्ति समाज या राष्ट्र पर अत्याचार हो रहा हो तो उसका प्रतिकार करना आवश्यक है। अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अन्याय के सामने हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहे। यदि देश धर्म समाज और मानवता की रक्षा के लिए आवश्यक हो तो साहसपूर्ण कदम उठाना भी कर्तव्य बन जाता है। इसलिए अहिंसा विवेकपूर्ण साहस का मार्ग है न कि निष्क्रियता का।
भारतीय संतों और महापुरुषों ने अपने जीवन से अहिंसा की महानता को सिद्ध किया है। भगवान महावीर ने संपूर्ण जीवन अहिंसा और करुणा का संदेश दिया। उन्होंने प्रत्येक जीव में आत्मा का वास माना और सभी के प्रति दया का व्यवहार करने की प्रेरणा दी। उनके विचार आज भी विश्वभर में शांति और सहअस्तित्व की भावना को मजबूत करते हैं। महात्मा बुद्ध ने भी प्रेम करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश देकर समाज की अनेक बुराइयों का विरोध किया। उन्होंने हिंसा और घृणा के स्थान पर मैत्री और करुणा को अपनाने की शिक्षा दी। उनके उपदेश आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक बने हुए हैं।
इस शिक्षा का वास्तविक अर्थ कायरता नहीं बल्कि घृणा का उत्तर प्रेम से देना है। यह मनुष्य के भीतर की महानता को प्रकट करता है और समाज में वैमनस्य के स्थान पर सद्भाव को बढ़ावा देता है।आधुनिक युग में जब संसार युद्ध आतंकवाद हिंसा और कट्टरता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है तब अहिंसा की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। आज विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है किंतु साथ ही विनाशकारी हथियारों का भी निर्माण किया है। ऐसे समय में यदि विश्व को स्थायी शांति चाहिए तो उसे अहिंसा सहिष्णुता और संवाद की राह अपनानी होगी। परिवार से लेकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक हर स्तर पर प्रेम विश्वास और सहयोग की भावना विकसित करनी होगी।
अहिंसा केवल युद्ध न करने का नाम नहीं है बल्कि अपने व्यवहार विचार और वाणी में भी शालीनता बनाए रखना है। कटु शब्द भी हिंसा का रूप होते हैं और मधुर वचन भी अहिंसा की अभिव्यक्ति बन सकते हैं। जब मनुष्य अपने भीतर से घृणा ईर्ष्या और द्वेष को समाप्त कर देता है तब उसके जीवन में शांति और संतोष का उदय होता है। यही शांति समाज और राष्ट्र तक पहुंचकर विश्व शांति का आधार बनती है।
अंततः कहा जा सकता है कि अहिंसा मानव सभ्यता की सबसे महान उपलब्धियों में से एक है। यह कायरता नहीं बल्कि आत्मबल सत्य साहस और मानवता का उज्ज्वल प्रतीक है। अहिंसा हमें न्याय के लिए संघर्ष करना सिखाती है किंतु घृणा और प्रतिशोध के बिना। यह प्रेम करुणा और क्षमा के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अहिंसा के आदर्शों को अपनाए तो विश्व में शांति सद्भाव और भाईचारे की स्थापना संभव है। यही वह मार्ग है जो मानवता को विनाश से बचाकर विकास समृद्धि और स्थायी शांति की ओर ले जा सकता है।
कांतिलाल मांडोत


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