छात्रों को प्रधानमंत्री की माफी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन छात्रों को माफ कर दिया है जिन्होंने जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया था।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन छात्रों को माफ कर दिया है जिन्होंने जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया था। यह एक बहुत बड़ी बात है कि देश के प्रधानमंत्री पर जिन छात्रों ने गन्दी गन्दी गलियों का प्रयोग किया हो और उन्हें माफ़ कर दिया जाये। शायद प्रधानमंत्री ने उन्हें सुधरने का एक मौका दिया है। सार्वजनिक स्थान पर कैमरे के सामने इस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग दंडनीय है।

इस तरह की भाषा को सहन नहीं किया जा सकता है। प्रशासन की तरफ़ से इस तरह के छात्रों की पहचान करके उन पर कार्यवाही करने की तैयारी चल रही थीइसी बीच सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक वीडियो आता है जिसमें वह कहते हैं कि मैं इन छात्रों पर कार्यवाही करने के पक्ष में नहीं हूंमैं इन्हें एक बार सुधरने का मौका देता हूं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो में कहा कि ये बचपन है और बचपन में गलतियां हो जाती हैं। जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर हुए छात्र आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया।

इस घटना ने देशभर में तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी। एक ओर कई लोगों ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बतायातो दूसरी ओर यह तर्क दिया गया कि युवाओं का आक्रोश परीक्षा व्यवस्था में लगातार हो रही गड़बड़ियों का परिणाम है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा संदेश दियाजिसने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे छात्रों को कठोर दंड देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने उन्हें "भटके हुए बच्चे" बताते हुए समाज से भी क्षमा और संवेदनशीलता का व्यवहार अपनाने की अपील की।

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प्रधानमंत्री का यह रुख केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार हैलेकिन किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद यदि सरकार प्रतिशोध की भावना से बचते हुए संवाद का रास्ता चुनती हैतो इसे लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत भी माना जा सकता है। हालांकियह भी स्पष्ट है कि क्षमा का अर्थ अभद्र भाषा या हिंसक व्यवहार को उचित ठहराना नहीं है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण हैजितना कि उसकी मर्यादा बनाए रखना। यदि आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो देता हैतो उसकी वैध मांगें भी कमजोर पड़ सकती हैं।

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इस पूरे प्रकरण में न्यायपालिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचने की बात कही और जिन छात्रों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं हैउन्हें राहत देने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार जांच और आवश्यक प्रक्रिया जारी रह सकती है।

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राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो प्रधानमंत्री का यह कदम विपक्ष की उस आलोचना का जवाब भी माना जा सकता हैजिसमें सरकार पर छात्रों के प्रति कठोर रवैया अपनाने के आरोप लगाए जा रहे थे। वहीं सरकार समर्थकों का मानना है कि क्षमा का संदेश देकर प्रधानमंत्री ने यह दिखाया कि वे युवाओं को विरोधी नहीं बल्कि देश का भविष्य मानते हैं।

दूसरी ओरइस पूरे घटनाक्रम से छात्रों और छात्र संगठनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है। लोकतांत्रिक आंदोलन तभी प्रभावी बनते हैं जब वे अनुशासनतथ्यों और मर्यादा के साथ आगे बढ़ें। अपशब्दहिंसा या व्यक्तिगत हमले किसी भी जनआंदोलन की नैतिक शक्ति को कम कर देते हैं।

नीट पेपर लीक जैसे मामलों ने लाखों छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाया है। ऐसे में सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल आंदोलनों को नियंत्रित करना नहींबल्कि परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना भी है। यदि सुधार लागू होते हैं और भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगती हैतभी इस पूरे आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य पूरा माना जाएगा। अंततः यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सीख है। सरकार को आलोचना सुनने का धैर्य रखना चाहिए और नागरिकों को विरोध की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। क्षमासंवाद और सुधार—यदि ये तीनों साथ चलते हैंतो लोकतंत्र और अधिक मजबूत बन सकता है।

लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान हर परिस्थिति में बना रहे। प्रोटेस्ट होते रहते हैं लेकिन इस तरह की अभद्र भाषा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह इन आंदोलनकारी छात्रों के लिए एक सबक है जिसको सीखना बहुत जरूरी है। हम जिस समाज में रहते हैं वहां इस तरह की अभद्र भाषा का कोई स्थान नहीं हैइसलिए आगे से ऐसा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए।

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