लंबित मुकदमे : न्याय में देरी की भारी कीमत

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है।

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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति का मुकदमा वर्षों या दशकों तक अदालतों में लंबित रहता हैतो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। भारत में करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार (08 दिसंबर 2025 तक): सुप्रीम कोर्ट: 90,897 मामले लंबित

उच्च न्यायालय: 63,63,406 मामले लंबित जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय: 4,84,57,343 मामले लंबित कुल लंबित मामले: लगभग 5.49 करोड़ (5,48,11,646)।  इन लंबित मामलों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव केवल पीड़ित पक्ष पर ही नहींबल्कि उन आरोपियों पर भी पड़ता हैजिनका अपराध अभी तक अदालत में सिद्ध नहीं हुआ है।

"जब तक अपराध सिद्ध न होतब तक व्यक्ति निर्दोष है" – भारतीय न्याय व्यवस्था का यह मूल सिद्धांत व्यवहार में कई बार कमजोर पड़ जाता है। वर्षों तक मुकदमे झेलने वाला आरोपी सामाजिकआर्थिक और मानसिक रूप से ऐसी सजा भुगतता हैजो कई बार अदालत द्वारा दी जाने वाली वास्तविक सजा से भी अधिक कठोर साबित होती है। लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ- देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित हैं। जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं— न्यायाधीशों के हजारों पद रिक्त होना।

मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या। बार-बार स्थगन  मिलना। पुलिस जांच और चार्जशीट दाखिल करने में देरी। गवाहों का समय पर उपस्थित न होना।

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आधुनिक तकनीक का सीमित उपयोग। इन कारणों से न्याय की प्रक्रिया लंबी होती चली जाती है।

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आरोपी की सबसे बड़ी पीड़ा- जब किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता हैतो उसके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ एक साथ आ जाती हैं। यदि उसे गिरफ्तार कर लिया जाए तो उसे जेल में समय बिताना पड़ सकता है। जमानत मिलने के बाद भी उसकी परेशानियाँ समाप्त नहीं होतीं। आरोपी को बार-बार अदालत में पेश होना पड़ता है। हर तारीख पर नौकरी या व्यवसाय छोड़कर अदालत जाना पड़ता है। कई बार मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ती और केवल अगली तारीख मिल जाती है। यह प्रक्रिया वर्षों तक चलती रहती है। सामाजिक बदनामी समाज में किसी व्यक्ति पर मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसकी छवि प्रभावित हो जाती है। भले ही बाद में अदालत उसे पूरी तरह निर्दोष घोषित कर देलेकिन उस पर लगा आरोप लोगों की स्मृति में बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरी मिलने में कठिनाई होती है। कई सरकारी नौकरियों में लंबित मुकदमे भी परेशानी का कारण बन जाते हैं। परिवार को भी सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। आर्थिक नुकसान- लंबे मुकदमों की सबसे बड़ी मार आर्थिक होती है। वकीलों की फीसअदालत आने-जाने का खर्चदस्तावेजों पर होने वाला खर्च,

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काम-धंधे में नुकसाननौकरी छूटने का खतराकई परिवार मुकदमे लड़ते-लड़ते आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। मानसिक तनाव- वर्षों तक मुकदमा झेलने वाला व्यक्ति लगातार तनाव में रहता है। उसे हर समय फैसले की चिंता सताती रहती है। परिवार के सदस्यों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। कई मामलों में मानसिक अवसादस्वास्थ्य समस्याएँ और पारिवारिक विवाद बढ़ जाते हैं। यदि अंत में आरोपी निर्दोष निकले तो?0यह सबसे गंभीर प्रश्न है। कई बार अदालत वर्षों बाद आरोपी को यह कहते हुए बरी कर देती है कि उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। उसके जीवन के कई वर्ष बीत चुके होते हैं।

सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो चुकी होती है।

आर्थिक नुकसान हो चुका होता है। मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ चुकी होती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि व्यक्ति निर्दोष थातो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई कौन करेगापीड़ित पक्ष भी प्रभावित- न्याय में देरी केवल आरोपी के लिए ही नहींबल्कि पीड़ित के लिए भी कष्टदायक होती है। पीड़ित वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता है। गवाह कमजोर पड़ जाते हैंसाक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं और कई बार न्याय का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। सुधार की आवश्यकता- न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई सुधार आवश्यक हैं— न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्र भरनानई अदालतों की स्थापनाई-कोर्ट और डिजिटल सुनवाई का विस्तार,अनावश्यक स्थगन पर सख्तीपुलिस जांच की गुणवत्ता में सुधारछोटे मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतेंवैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को बढ़ावागवाह संरक्षण प्रणाली को मजबूत करनान्याय में देरीन्याय से वंचित करना अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध उक्ति है—"Justice delayed is justice denied." अर्थात न्याय में देरीन्याय से वंचित करने के समान है। यह बात आरोपी और पीड़ित—दोनों पर समान रूप से लागू होती है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमा झेलना पड़ेतो वह भी न्याय से वंचित है। यदि पीड़ित को वर्षों तक निर्णय का इंतजार करना पड़ेतो उसके साथ भी न्याय अधूरा रह जाता है।

भारतीय न्यायपालिका पर जनता का विश्वास आज भी मजबूत हैलेकिन बढ़ते लंबित मुकदमे इस विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं हैबल्कि समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। अदालतों में लंबित मामलों को कम करनान्यायाधीशों की संख्या बढ़ानातकनीक का अधिक उपयोग करना और मुकदमों के त्वरित निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था करना समय की मांग है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगीजब निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक आरोपी बनकर न जीए और पीड़ित को न्याय के लिए अनंत प्रतीक्षा न करनी पड़े। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहींबल्कि समय पर और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।

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