सुविधाएँ बढ़ीं, बजट बढ़ा, फिर भी व्यवस्था वहीं क्यों?

हाजिरी पूरी, कुर्सियाँ भरी — मगर जिम्मेदारी नदारद, भवन और साधन बढ़े, मगर सेवा का अर्थ घटता गया

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिकायतों की सूची लंबी है—अस्पताल में दवा नहींस्कूल में शिक्षक नहींसड़क पर रोशनी नहींकार्यालय में कर्मचारी नहीं। लेकिन सवाल हो कि जो हैवह काम कर रहा है या नहींतो आवाज़ धीमी पड़ जाती है। डॉक्टर हैंमरीज के सामने नहींशिक्षक हैंकक्षा में नहींकर्मचारी हैंसीट पर नहींअधिकारी हैंदायित्व पर नहीं। अस्पताल में मशीन हैजाँच नहींस्कूल में प्रयोगशाला हैप्रयोग नहींमैदान हैखेल नहींटंकी हैनल में पानी नहीं। समस्या सिर्फ सुविधाओं की कमी नहींमौजूद साधनों और पदों का अपने उद्देश्य से गायब होना है। संसाधन हैंकुर्सियाँ भरी हैंपरिणाम नहीं। सवाल है—इस दिखाई देती अनुपस्थिति को कब तक अनदेखा करेंगे?

हमने सुविधाओं को सेवा का माध्यम नहींनिजी लाभ का साधन बना लिया है। सरकारी अस्पताल का डॉक्टर सरकारी समय में निजी मरीजों में व्यस्त हैजबकि ओ.पी.डी. में गरीब अपनी बारी का इंतजार करता है। शिक्षक कक्षा के लिए नियुक्त हैमगर उसकी ऊर्जा निजी कोचिंग में खपती है। सरकारी वाहन जनता के लिए हैमगर निजी आवागमन में चलता हैसरकारी कंप्यूटर काम के लिए हैमगर निजी कारोबार में इस्तेमाल होता है। सरकारी फोनसमयकमरा और संसाधन—नाम सरकारीइस्तेमाल निजी। यहीं से सुविधा का चरित्र बदल जाता है। जो साधन जनता की सेवा के लिए थावही किसी की निजी सुविधा और कमाई का जरिया बन जाता है।

विडंबना यह है कि हर समस्या का हल हम नई सुविधा में खोजते हैं—अस्पताल में भीड़ हो तो नया भवनपरिणाम कमजोर हों तो नई इमारतमशीन खराब हो तो नई मशीनकर्मचारी कम हों तो नई नियुक्ति। मगर पुरानी सुविधा का हिसाब कौन देगालाखों की मशीन खरीदी जाती हैतकनीशियन न मिले तो धूल खाती हैदवाइयाँ गोदाम भरती हैंवितरण की लापरवाही से जरूरतमंद तक नहीं पहुँचतीं और एक्सपायरी उन्हें निगल जाती है। स्कूल में स्मार्ट क्लासप्रोजेक्टर और स्क्रीन आ जाते हैंपर पढ़ाने का ढर्रा वही रहता है। प्रशिक्षण होते हैंप्रमाणपत्र बंटते हैंतस्वीरें खिंचती हैं—कक्षा में फिर भी रट्टा चलता है। संसाधन बढ़ते हैंबजट बढ़ता हैखर्च बढ़ता हैबस उपयोगिता वहीं की वहीं रहती है।

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सुविधाएँ शायद इसी लिए चुपचाप सवाल करती हैं। अस्पताल का बिस्तर पूछता है—“मैं मरीज के लिए था या सिर्फ औपचारिकता के लिए?” किताब पूछती है—“बच्चे तक पहुँची क्यों नहीं?” स्ट्रीट लाइट पूछती है—“मेरी रोशनी किस काम कीजब महीनों खराब पड़ी रहूँ?” सार्वजनिक शौचालय बनता हैसफाई के अभाव में बेकार हो जाता हैबस स्टैंड खड़ा हैमगर यात्री सुविधा से वंचित हैंपार्क बनता हैदेखरेख न हो तो कूड़े और टूटे सामान में बदल जाता है। इमारतें खड़ी हैंमशीनें खड़ी हैंयोजनाएँ कागज पर चल रही हैं—बस सेवा गायब है। सुविधा का शरीर बचा हैउद्देश्य मर चुका है।

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सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती हैजब हम दूसरों से ईमानदारी चाहते हैं और अपनी बारी पर “सिस्टम ऐसा ही है” कहकर बच निकलते हैं। डॉक्टर व्यवस्था कोशिक्षक विभाग कोकर्मचारी अधिकारी कोअधिकारी बजट को और नागरिक पूरे सिस्टम को दोष देता है। मगर सिस्टम है किससेहमसे ही। समय पर न पहुँचने वाला कर्मचारीबिना पढ़े फाइल बढ़ाने वाला अधिकारीकक्षा को औपचारिकता मानने वाला शिक्षकमरीज से ज्यादा निजी काम को तरजीह देने वाला डॉक्टर—ये सभी सिस्टम हैं। हम व्यवस्था बदलना चाहते हैंपर शुरुआत खुद से नहीं। सिस्टम को कोसना आसान हैअपने भीतर के स्वार्थ को देखना कठिन। यही हमारी असली सामूहिक विडंबना है।

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असली सवाल सुविधा के होने का नहींउसके सही इस्तेमाल का है। सही उपयोग हो तो मरीज को इलाजछात्र को समझकिसान को समय पर जानकारीनागरिक को समय पर प्रमाणपत्र और सड़क को रात में रोशनी मिलती है। दुरुपयोग हो तो डॉक्टर की कुर्सी भरी रहती हैसेवा खालीशिक्षक का वेतन आता हैमेहनत नहींकार्यालय खुला रहता हैसमाधान बंद। कहीं नौकरी जिम्मेदारी नहींस्थायी सुविधा बन जाती है—हाजिरी पूरीसमय पूराकाम अपनी मर्जी का। कहीं सरकारी संसाधन निजी काम मेंकहीं सार्वजनिक समय निजी लाभ में। यह सिर्फ व्यवस्था की कमजोरी नहींहमारी सामूहिक बेईमानी है—जिसे हम सुविधाजनक ढंग से “सिस्टम की समस्या” कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच जाते हैं।

अब विकास का सवाल भी बदलना होगा। हर बार “नई सुविधा कब मिलेगी?” से पहले पूछा जाए—जो मिलाउसका परिणाम क्या आया?” नया अस्पताल बनाने से पहले पुराने की दवा व्यवस्था देखी जाएनई मशीन लाने से पहले पूछा जाए कि पुरानी बंद क्यों हैनया स्कूल खोलने से पहले देखा जाए कि मौजूदा स्कूल बच्चों को क्या दे रहा हैनई सड़क से पहले पुरानी सड़क की मरम्मत का हिसाब हो। हर योजना के साथ देखभालजिम्मेदारी और परिणाम भी तय हों। सुविधा खरीदना आसान हैउसे उपयोगी बनाए रखना कठिन। बजट से भवनमशीन और फर्नीचर खरीदे जा सकते हैंईमानदार उपयोगजिम्मेदारी और संवेदना किसी निविदा में नहीं मिलती।

व्यवस्था केवल नई सुविधाओं से नहींसही नीयत से बदलती है। डॉक्टर के लिए मरीजशिक्षक के लिए कक्षाकर्मचारी के लिए सरकारी समयअधिकारी के लिए फाइल के पीछे खड़ा व्यक्ति और नागरिक के लिए सार्वजनिक संसाधन—जब सुविधा नहींजिम्मेदारी बन जाएँतो आधी समस्याएँ बिना नए खर्च के खत्म हो सकती हैं। नई सुविधाएँ जरूरी हैंपर पुरानी नीयत के साथ नहीं। असली सुविधा बजट नहींउसका ईमानदार उपयोग है। जिस दिन “मुझे क्या मिला?” से पहले “जो मिलाउससे किसका भला हुआ?” पूछा जाएगाउसी दिन व्यवस्था का हर साधन अपना असली अर्थ पाएगा। तब सुविधाएँ सिर्फ उपलब्ध नहीं होंगी—सार्थक होंगी।

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