फेफड़ों का कैंसर : समय पर पहचान और सावधानी से बच सकती है जिंदगी

फेफड़ों के स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न बरती जाए और लगातार बने रहने वाले लक्षणों की चिकित्सकीय जांच कराई जाए

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हर साल 1 अगस्त को विश्व फेफड़े का कैंसर दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को फेफड़ों के कैंसर के कारणों, शुरुआती संकेतों, बचाव और समय पर जांच के महत्व के बारे में जागरूक करना है। फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है। चिंता की बात यह है कि इस बीमारी की शुरुआत कई बार बिना किसी स्पष्ट संकेत के होती है और जब तक लक्षण गंभीर रूप में सामने आते हैं, तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। ऐसे में जागरूकता, जोखिम की पहचान और समय पर चिकित्सकीय सलाह जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
 
विश्व फेफड़े का कैंसर दिवस की शुरुआत वर्ष 2012 में फोरम ऑफ इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटीज यानी एफआईआरएस ने अन्य स्वास्थ्य संगठनों के सहयोग से की थी। इस दिन का उद्देश्य केवल बीमारी के बारे में जानकारी देना नहीं है, बल्कि फेफड़ों के कैंसर से जुड़े भ्रम और सामाजिक कलंक को दूर करना, रोकथाम को बढ़ावा देना तथा शीघ्र निदान और बेहतर उपचार के लिए लोगों को प्रेरित करना भी है। वर्ष 2026 में भी इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि फेफड़ों के स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न बरती जाए और लगातार बने रहने वाले लक्षणों की चिकित्सकीय जांच कराई जाए।
 
फेफड़ों का कैंसर उस समय विकसित होता है जब फेफड़ों की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं और उनका नियंत्रण खत्म हो जाता है। धीरे-धीरे ये कोशिकाएं ट्यूमर का रूप ले सकती हैं और आसपास के ऊतकों को प्रभावित कर सकती हैं। आगे चलकर कैंसर रक्त या लसीका तंत्र के माध्यम से शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है। फेफड़ों के कैंसर को मुख्य रूप से नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर और स्मॉल सेल लंग कैंसर में बांटा जाता है। नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर अधिक सामान्य है, जबकि स्मॉल सेल लंग कैंसर अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ने और फैलने वाला प्रकार माना जाता है।
 
फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक तंबाकू और धूम्रपान है। लंबे समय तक धूम्रपान करने से जोखिम बढ़ता जाता है। हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि केवल धूम्रपान करने वालों को ही यह बीमारी होती है। धूम्रपान नहीं करने वाले लोग भी फेफड़ों के कैंसर का शिकार हो सकते हैं। निष्क्रिय धूम्रपान यानी दूसरे व्यक्ति के तंबाकू के धुएं के संपर्क में रहना भी जोखिम बढ़ाता है। इसके अलावा वायु प्रदूषण, घरेलू धुएं, रेडॉन गैस, एस्बेस्टस, सिलिका धूल, डीजल के धुएं और कुछ औद्योगिक रसायनों के लंबे समय तक संपर्क को भी जोखिम से जोड़ा गया है। कुछ लोगों में पारिवारिक इतिहास और आनुवंशिक संवेदनशीलता भी भूमिका निभा सकती है।
 
फेफड़ों के कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य श्वसन समस्याओं जैसे लगते हैं। लगातार बनी रहने वाली खांसी इसका महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। यदि खांसी तीन सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहे, बढ़ती जाए या पुरानी खांसी के स्वरूप में अचानक बदलाव आए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खांसी के साथ खून आना भी गंभीर संकेत है और ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय जांच जरूरी है। इसी तरह बिना स्पष्ट कारण सांस फूलना, सीने में लगातार दर्द या असहजता, आवाज में लगातार बदलाव, अत्यधिक थकान, भूख कम होना और बिना कोशिश के वजन कम होना भी ध्यान देने योग्य लक्षण हैं।
 
बार-बार होने वाले सीने के संक्रमण को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को बार-बार ब्रोंकाइटिस या निमोनिया होता है या उपचार के बावजूद संक्रमण अपेक्षा के अनुसार ठीक नहीं होता, तो चिकित्सक से सलाह लेना उचित है। हालांकि इन लक्षणों का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर ही है। संक्रमण, अस्थमा, सीओपीडी, टीबी और अन्य कई बीमारियों में भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसलिए स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
 
फेफड़ों का कैंसर शुरुआती अवस्था में बिना किसी लक्षण के भी हो सकता है। छोटा ट्यूमर शुरुआत में सांस की नलियों या आसपास के ऊतकों को प्रभावित नहीं करता, इसलिए व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है। यही वजह है कि अधिक जोखिम वाले लोगों में चिकित्सकीय सलाह के अनुसार स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण हो सकती है। स्क्रीनिंग में कम खुराक वाली सीटी जांच का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों में बीमारी का शुरुआती पता लगाना है जिनमें लक्षण नहीं हैं लेकिन जोखिम अधिक है।
 
अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों में आम तौर पर अधिक उम्र और लंबे समय तक धूम्रपान के इतिहास वाले लोगों के लिए कम खुराक वाली सीटी स्क्रीनिंग पर विचार किया जाता है। कई दिशानिर्देश 50 से 80 वर्ष की उम्र के उन लोगों में स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं जिनका धूम्रपान इतिहास कम से कम 20 पैक-वर्ष रहा हो और जो वर्तमान में धूम्रपान करते हैं या हाल के वर्षों में इसे छोड़ चुके हैं। हालांकि स्क्रीनिंग के मानदंड अलग-अलग दिशानिर्देशों में अलग हो सकते हैं। इसलिए हर व्यक्ति के लिए स्क्रीनिंग जरूरी नहीं होती और इसका निर्णय उम्र, धूम्रपान का इतिहास, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य जोखिमों को देखते हुए डॉक्टर करते हैं।
 
यह भी समझना जरूरी है कि स्क्रीनिंग और बीमारी के लक्षणों की जांच दो अलग-अलग बातें हैं। यदि किसी व्यक्ति को लगातार खांसी, खून वाली खांसी, सीने में दर्द या बिना कारण सांस लेने में परेशानी हो रही है तो उसे नियमित स्क्रीनिंग का इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को लक्षणों के कारण का पता लगाने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन की जरूरत होती है।
 
फेफड़ों के कैंसर की जांच के लिए डॉक्टर पहले मरीज के लक्षणों और स्वास्थ्य इतिहास को समझते हैं। इसके बाद जरूरत के अनुसार छाती का एक्स-रे या सीटी स्कैन कराया जा सकता है। यदि किसी संदिग्ध गांठ या असामान्य हिस्से का पता चलता है तो आगे की जांच की जाती है। पीईटी-सीटी का उपयोग कुछ मामलों में बीमारी के फैलाव का आकलन करने के लिए किया जाता है। कैंसर की पुष्टि के लिए आम तौर पर बायोप्सी की आवश्यकता होती है। इसमें संदिग्ध ऊतक का नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है। कुछ मामलों में कैंसर की प्रकृति समझने के लिए आणविक या बायोमार्कर परीक्षण भी किए जाते हैं, जिनसे उपचार का चयन करने में मदद मिल सकती है।
 
उपचार बीमारी के प्रकार और अवस्था के आधार पर तय होता है। शुरुआती अवस्था में कुछ मरीजों के लिए सर्जरी महत्वपूर्ण उपचार हो सकती है। कुछ परिस्थितियों में विकिरण उपचार का उपयोग किया जाता है। कीमोथेरेपी भी कई प्रकार के फेफड़ों के कैंसर में उपयोगी होती है। जिन मरीजों में विशेष आनुवंशिक बदलाव पाए जाते हैं, उनमें लक्षित उपचार का विकल्प उपलब्ध हो सकता है। प्रतिरक्षा चिकित्सा ने भी फेफड़ों के कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका बनाई है। उन्नत बीमारी में उपचार का उद्देश्य केवल कैंसर को नियंत्रित करना ही नहीं बल्कि दर्द, सांस की तकलीफ और अन्य परेशानियों को कम करके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना भी होता है।
 
फेफड़ों के कैंसर से बचाव की दिशा में सबसे प्रभावी कदम धूम्रपान से दूर रहना है। जो लोग धूम्रपान करते हैं, उनके लिए इसे छोड़ना किसी भी उम्र में लाभकारी है। घर और कार्यस्थल को धूम्रपान मुक्त रखना भी जरूरी है। प्रदूषण और हानिकारक रसायनों के संपर्क को कम करना तथा जोखिम वाले कार्यस्थलों पर सुरक्षा उपायों का पालन करना भी महत्वपूर्ण है। वायु प्रदूषण अधिक होने पर सावधानी बरतना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सुरक्षा उपाय अपनाना फायदेमंद हो सकता है।
 
विश्व फेफड़े का कैंसर दिवस हमें यह याद दिलाता है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है और इसके शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, खून वाली खांसी या बिना कारण वजन कम होने जैसे बदलाव दिखाई दें तो समय गंवाए बिना डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। दूसरी ओर, अधिक जोखिम वाले लेकिन बिना लक्षण वाले लोगों को अपने जोखिम के आधार पर स्क्रीनिंग की जरूरत के बारे में चिकित्सक से चर्चा करनी चाहिए।
 
कैंसर का नाम सुनना स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा कर सकता है, लेकिन आज जांच और उपचार के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। बीमारी का समय पर पता चलना उपचार के विकल्पों को बढ़ा सकता है और परिणाम बेहतर करने में मदद कर सकता है। इसलिए जागरूकता ही सबसे पहली सुरक्षा है। अपने जोखिम को समझना, तंबाकू से दूरी बनाना और शरीर में होने वाले लगातार बदलावों को गंभीरता से लेना फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण कदमों में शामिल हैं।
 
कांतिलाल मांडोत

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