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देश की युवा पीढ़ी के महान आदर्श हैं - अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद
अपने जीवन का प्रत्येक क्षण भारत माता की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया
भारत की आज़ादी के अमर सेनानी, महान क्रांतिकारी और अदम्य राष्ट्रभक्त शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज 120वीं जयंती है। यह अवसर केवल उनके जन्म का स्मरण करने का नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन, राष्ट्र्भक्ति, त्
अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को तत्कालीन अलीराजपुर रियासत (वर्तमान मध्य प्रदेश) के भाबरा गांव में हुआ था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी तथा माता जगरानी देवी थीं। भाभरा की पावन धरती पर ही उनका बचपन बीता। बाल्यकाल से ही उनमें स्वाभिमान, निर्भीकता और राष्ट्रप्रेम के संस्कार स्पष्ट दिखाई देते थे। यही कारण था कि मात्र दस-बारह वर्ष की आयु में उन्होंने घर-परिवार का मोह त्याग कर मातृभूमि की स्वतंत्रता को अपना जीवन-ध्येय बना लिया। आज जब पचास वर्ष के व्यक्ति को भी युवा कहा जाता है, तब यह कल्पना करना कठिन है कि एक दस बारह वर्ष का बालक अपनी जन्मभूमि की गलियों, माता पिता के स्नेह और बचपन की निश्छल दुनिया को छोड़कर केवल इसलिए निकल पड़े कि उसकी भारत माता पराधीन है। यह केवल साहस नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अद्वितीय समर्पण और असाधारण चरित्रबल का परिचायक था।
देश की स्वतंत्रता का अलख जगाने का संकल्प लेकर निकले बालक आज़ाद ने वर्ष 1921 में महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्वर बुलंद करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब अंग्रेज़ न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया "नाम — आज़ाद, पिता का नाम — स्वतंत्र और निवास — जेल।" यह उत्तर सुनकर न्यायाधीश क्रोधित हो उठा और उन्हें पंद्रह बेंतों की सजा सुनाई। किन्तु प्रत्येक बेंत के साथ बालक आज़ाद के मुख से "भारत माता की जय" और "वंदे मातरम्" का घोष गूँजता रहा। अंग्रेज़ी सत्ता की क्रूरता उनके साहस को डिगा नहीं सकी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और चन्द्रशेखर आज़ाद एक निर्भीक क्रांतिकारी के रूप में राष्ट्रीय चेतना के केंद्र बन गए। इसके बाद उनका संपर्क महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल से हुआ। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने और भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। आज़ाद का स्पष्ट विश्वास था कि "दासता मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है।" यही विचार उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया और अंतिम क्षण तक वे इसी अभिशाप के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।
स्वतंत्रता संग्राम का वह दौर, विशेषकर 1920 से 1930 के बीच का दशक, अंग्रेजी शासन के लिए सबसे कठिन समय था। क्रांतिकारियों की बढ़ती गतिविधियों ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी थी। यदि उस समय स्वतंत्रता आंदोलन की समस्त धाराएँ एकजुट हो जाती, तो संभव था कि भारत को स्वतंत्रता बहुत पहले ही मिल जाती। क्रांतिकारी संगठन को संचालित करने और हथियारों की व्यवस्था के लिए धन की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी कांड की योजना बनाई गई। सरकारी खजाना लूटकर अंग्रेजी शासन को यह संदेश दिया गया कि भारत के क्रांतिकारी अब केवल विरोध तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अन्याय का उत्तर उसी की भाषा में देंगे। काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी शासन बुरी तरह बौखला गया। देशभर में क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू हुई। विडंबना यह रही कि जिन हजारों क्रांतिकारियों तक अंग्रेज़ नहीं पहुँच सके, उनमें से अनेक अपने ही लोगों की विश्वासघात पूर्ण सूचनाओं के कारण गिरफ्तार हुए और फांसी के फंदे तक पहुँच गए। यह भारतीय इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय भी है कि विदेशी शासन से अधिक नुकसान अपनों की गद्दारी ने पहुँचाया।
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बिखरने लगी, किंतु चन्द्रशेखर आज़ाद ने परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने संगठन की कमान अपने हाथों में ली और निराश साथियों में नया उत्साह भरते हुए क्रांतिकारी आंदोलन को पुनः संगठित किया। बाद में इसी संगठन को नए स्वरूप में आगे बढ़ाते हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में विकसित किया गया। इसी काल में आज़ाद और भगत सिंह की जोड़ी अंग्रेजी शासन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई। दोनों ने देशभर के युवाओं में स्वतंत्रता की नई चेतना का संचार किया। भेष बदलकर, स्थान बदलते हुए और गुप्त रूप से संगठन का विस्तार करते हुए उन्होंने अंग्रेजी शासन की जड़ों को लगातार चुनौती दी। जहाँ भी आज़ाद जाते, वहाँ ऐसे युवाओं की टोली तैयार कर देते, जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहती। संसाधनों का घोर अभाव होने के बावजूद आज़ाद का आत्मविश्वास कभी कम नहीं हुआ। उनके सामने उस ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। फिर भी यह अकेला क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन के लिए इतना बड़ा खतरा बन चुका था कि उसकी गिरफ्तारी के लिए पूरे देश में जाल बिछा दिया गया। उसकी सूचना देने वालों के लिए इनाम घोषित किए गए, किंतु आज़ाद हर बार अंग्रेजों को चकमा देकर निकल जाते थे। उनका प्रिय उद्घोष आज भी हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रभक्ति का संचार करता है—
"दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।"
यह केवल कविता की पंक्ति नहीं थी, बल्कि उनके जीवन का अटल संकल्प था। उन्होंने कभी जीवित अंग्रेज़ों के हाथों बंदी न बनने की प्रतिज्ञा की थी और जीवन के अंतिम क्षण तक उस प्रतिज्ञा का अक्षरशः पालन किया। जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव गिरफ्तार कर लिए गए, तब भी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनके साथियों को छुड़ाने के अनेक प्रयास किए। वे चाहते थे कि देश के सभी बड़े नेता वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर स्वतंत्रता के इस निर्णायक संघर्ष में एकजुट हों, किंतु परिस्थितियों उनके अनुकूल नहीं बन सकीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने अभियान को कभी रुकने नहीं दिया और अंतिम क्षण तक अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।
27 फरवरी 1931 का वह ऐतिहासिक दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अमर रहेगा। इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथियों की रिहाई और क्रांतिकारी गतिविधियों की भावी रणनीति पर चर्चा के लिए पहुँचे थे। वे अपने साथियों की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि एक विश्वासघाती की सूचना पर अंग्रेज़ी पुलिस ने पूरे पार्क को चारों ओर से घेर लिया। अचानक हुई इस घेराबंदी के बाद भी आज़ाद ने धैर्य और अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने साथियों को सुरक्षित निकल जाने का अवसर दिया और स्वयं अंग्रेज़ी सैनिकों से अकेले मोर्चा लेते रहे। जब तक उनकी पिस्तौल में गोलियाँ रहीं, वे दुश्मनों पर कहर बनकर टूटते रहे। अंततः जब उनके पास केवल एक अंतिम गोली शेष रह गई और गिरफ्तारी निश्चित दिखाई देने लगी, तब उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए वही अंतिम गोली स्वयं को मार ली। इस प्रकार उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर यह सिद्ध कर दिया कि "आज़ाद जीवित पकड़ा नहीं जाएगा। "स्वाभिमान आज़ाद के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी।
वे जो संकल्प कर लेते थे, उसे हर परिस्थिति में पूरा करते थे। कठिनाइयाँ, अभाव, भूख, प्यास और मृत्यु का भय भी उन्हें अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं कर सका। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग, साहस और बलिदान से सिद्ध होती है! आज, जब देश की नई पीढ़ी आधुनिकता और तकनीकी सुविधाओं के बीच अपना भविष्य गढ़ रही है, तब उसे यह भी जानना चाहिए कि स्वतंत्र भारत की यह खुली हवा किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे असंख्य अमर बलिदानियों के रक्त से सिंचित विरासत है। यदि नई पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण करेगी, तभी राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व, कर्तव्यबोध और स्वाभिमान की भावना और अधिक सशक्त होगी।
मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में उन्होंने अपने रक्त से मातृभूमि की स्वतंत्रता का अभिषेक कर दिया। उनकी शहादत ने पूरे देश में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला और प्रचंड कर दी। अंग्रेज़ी सरकार यह समझ चुकी थी कि यदि क्रांतिकारियों की विचारधारा को समय रहते नहीं रोका गया, तो उसका भारत पर शासन अधिक दिनों तक टिक नहीं सकेगा। यही कारण था कि कुछ ही दिनों बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को भी निर्धारित तिथि से पहले गुप्त रूप से फांसी दे दी गई। इन अमर बलिदानियों ने यह सिद्ध कर दिया कि मातृभूमि के सम्मान के लिए मृत्यु भी जीवन से अधिक गौरवशाली हो सकती है। उन्होंने सत्ता, धन और प्रलोभनों को ठुकराकर अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए, इसलिए उनका बलिदान भारतीय इतिहास की सबसे उज्ज्वल धरोहर है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह संकल्प लिया गया था कि देश अपने शहीदों के बलिदान को सदैव स्मरण रखेगा। समय-समय पर उनके सम्मान में कार्यक्रम आयोजित होंगे और नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से परिचित कराया जाएगा। किंतु समय बीतने के साथ अनेक स्थानों पर शहीद स्मरण समारोह केवल औपचारिकता बनकर रह गए। कहीं वे राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का मंच बन गए तो कहीं राष्ट्रभावना की अपेक्षा दलगत हित अधिक महत्वपूर्ण हो गए। यह स्थिति उन महान बलिदानियों के प्रति हमारी कृतज्ञता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
आज की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि युवा आधुनिक तकनीक से जुड़ रहे हैं, बल्कि यह है कि वे अपने इतिहास और अपने राष्ट्र नायकों से दूर होते जा रहे हैं। वर्ष में केवल दो राष्ट्रीय पर्वों पर सोशल मीडिया पर संदेश या तिरंगे की तस्वीर लगा देना देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता। सच्ची राष्ट्रभक्ति तब जागृत होती है, जब युवा अपने राष्ट्र के इतिहास, संस्कृति, संविधान और उन महापुरुषों को जानता है, जिनके त्याग के कारण वह स्वतंत्र भारत में सम्मानपूर्वक जीवन जी रहा है। विडंबना यह भी है कि आज का युवा देश विदेश के पर्यटन स्थलों की यात्रा तो करता है, किंतु चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, सुखदेव, राजगुरु और अन्य महान क्रांतिकारियों की जन्मस्थलियों तथा स्मारकों तक पहुँचने की प्रेरणा उसके भीतर बहुत कम दिखाई देती है।
जब तक नई पीढ़ी अपने वास्तविक नायकों को नहीं जानेगी, तब तक राष्ट्रप्रेम केवल नारों तक सीमित रहने का खतरा बना रहेगा। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति के युग में सूचना का अभाव नहीं है, लेकिन प्रेरणा का संकट अवश्य दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसके महानायक केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें शिक्षा, संस्कृति, मीडिया और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण का आधार बनाया जाए। सरकारों का भी यह दायित्व है कि अमर शहीदों के जीवन-दर्शन को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अधिक व्यापक रूप से स्थान दिया जाए। शहीद स्मारकों को केवल औपचारिक आयोजन स्थलों के बजाय राष्ट्रीय प्रेरणा केंद्र बनाया जाए, जहां युवा पीढ़ी जाकर अपने इतिहास को अनुभव कर सके। राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन महानायकों की स्मृति राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चेतना का स्थायी प्रतीक बननी चाहिए।
वास्तव में चन्द्रशेखर आज़ाद का जीवन केवल भारत के युवाओं के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व की युवा पीढ़ी के लिए साहस, स्वाभिमान, राष्ट्रनिष्ठा और चरित्रबल की अमर गाथा है। उनके जीवन का प्रत्येक अध्याय यह सिखाता है कि राष्ट्र सबसे ऊपर है और व्यक्ति का सर्वोच्च धर्म अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना है।
यदि हम सचमुच चाहते हैं कि भारत की युवा पीढ़ी नशे, अपराध, हिंसा और नैतिक पतन से दूर रहे, तो उसे आधुनिक तकनीक के साथ-साथ चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, सुखदेव, राजगुरु, अशफ़ा
अरविंद रावल


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