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डॉक्टर डे: सफेद कोट में भगवान, धड़कनों के रखवाले को हजार सलाम
1 जुलाई को भारत में 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' मनाया जाता है। ये दिन सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। ये उस भरोसे का दिन है जो एक मरीज सबसे ज्यादा दर्द में भी एक अजनबी पर करता है। उस अजनबी का नाम है: डॉक्टर।
ये दिन क्यों ? डॉ. बिधान चंद्र रॉय की विरासत
डॉक्टर डे भारत में हर साल 1 जुलाई को पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और महान चिकित्सक डॉ. बिधान चंद्र रॉय की जयंती और पुण्यतिथि पर मनाया जाता है। डॉ. रॉय MBBS, MRCP और FRCS थे। उन्होंने बिना फीस लिए हजारों मरीजों का इलाज किया। राजनीति में आने के बाद भी वो रोज सुबह 4 बजे उठकर मरीज देखते थे। उनके लिए मरीज भगवान था और सेवा धर्म। इसी सोच को सलाम करने के लिए 1991 से 1 जुलाई को डॉक्टर डे घोषित हुआ। सफेद कोट के पीछे छुपी जिंदगी
हम डॉक्टर को सिर्फ OPD में 5 मिनट देखते हैं। पर उसके पीछे क्या है? नींद की कुर्बानी: 36 घंटे की ड्यूटी, इमरजेंसी कॉल, रात 2 बजे उठकर ICU दौड़ना। त्योहार, जन्मदिन, शादी सब हॉस्पिटल की ड्यूटी के आगे सेकेंड पर आ जाता है।
दिमाग का बोझ: एक गलत दवा, एक छूटा हुआ लक्षण, और किसी की पूरी दुनिया उजड़ सकती है। इसलिए हर केस में 100% दिमाग लगाना पड़ता है। डिप्रेशन और बर्नआउट डॉक्टरों में सबसे ज्यादा है।
जोखिम उठाकर सेवा: कोविड-19 में PPE किट पहनकर 12 घंटे काम करना, संक्रामक बीमारियों के बीच खड़े रहना, कभी-कभी मरीजों के परिजनों का गुस्सा झेलना। फिर भी वो भागते नहीं हैं। यही है मानव सेवा। किताबों से नहीं, जिगर से की जाने वाली सेवा। डॉक्टर सिर्फ इलाज नहीं करते, वो उम्मीद देते हैं। गांव का डॉक्टर : जहां MRI-CT नहीं, वहां स्टेथोस्कोप से बीमारी पकड़ लेता है। 50 रुपये फीस में 1 घंटे समझाता है। सर्जन: 8 घंटे टेबल पर झुका रहता है, ताकि किसी और को जिंदगी मिल जाए। बाल रोग विशेषज्ञ : रोते हुए बच्चे को चॉकलेट देकर इंजेक्शन लगाता है, और मां को हिम्मत देता है।
ग्रामीण MBBS डॉक्टर: बाढ़, महामारी, एक्सीडेंट में सबसे पहले वही पहुंचता है, एंबुलेंस से पहले। कोविड से लेकर डेंगू, हार्ट अटैक से लेकर डिलीवरी तक, हर संकट में सबसे आगे वो सफेद कोट ही खड़ा मिला। डॉक्टर भगवान नहीं हैं। वो इंसान हैं। उनसे गलती हो सकती है, वो थक सकते हैं। पर इरादा उनका हमेशा सेवा का ही होता है। भरोसा रखिए, सवाल पूछिए : गूगल डॉक्टर से पहले असली डॉक्टर की सुनिए। इज्जत दीजिए: इमरजेंसी में गाली की जगह धन्यवाद दीजिए। वो भी आपके जैसा इंसान है। सेल्फ-केयर : डॉक्टर को भी आराम, सम्मान और सुरक्षित माहौल चाहिए। हिंसा से उनका मनोबल टूटता है, इलाज नहीं सुधरता। निष्कर्ष: हजार सलाम कम हैं। डॉक्टर वो पुल है जो 'बीमारी' और 'जिंदगी' के बीच बना है। वो रात-रात भर जागकर हमारे अपनों की सांसें गिनते हैं। फीस लेते हैं, पर कई बार उम्मीद फ्री में दे देते हैं। इस 1 जुलाई को अपने फैमिली डॉक्टर, अपने शहर के उस सरकारी हॉस्पिटल के डॉक्टर, या उस जूनियर रेजिडेंट को एक मैसेज कर दीजिए। कहिए: "डॉक्टर साहब, आपकी मानव सेवा को हजार सलाम।" क्योंकि जब सब थक जाते हैं, तब भी धड़कन चलती रहती है। और उस धड़कन को चलाने वाला सफेद कोट होता है। लेकिन हम इसे भी नजरंदाज नहीं कर सकते कि चिकित्सा सेवा का व्यवसायीकरण हो चुका है और आम जनता का कहीं कहीं शोषण भी हो रहा है। आज इलाज मानव सेवा न रहकर बेहद महंगा व्यापार बन चुका है। अत्यधिक व्यवसायीकरण के समय में आज कई निजी अस्पताल व नर्सिंग होम लाभ कमाने का केंद्र बन गए हैं। मरीजों को अनावश्यक रूप से महंगी जांचें और दवाइयां लिखी जातीं हैं, जिससे आम आदमी बहुत परेशान है।


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