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यूपी का चुनावी मैदान: मुकाबला फिर से भाजपा बनाम सपा
उत्तर प्रदेश की सियासत का गणित पिछले 30 साल से लगभग तय है। यहाँ सत्ता की चाबी हमेशा दो बड़े खेमों के पास रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव भी इसी स्क्रिप्ट पर आगे बढ़ता दिख रहा है।
राजीव शुक्ल
उत्तर प्रदेश की सियासत का गणित पिछले 30 साल से लगभग तय है। यहाँ सत्ता की चाबी हमेशा दो बड़े खेमों के पास रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव भी इसी स्क्रिप्ट पर आगे बढ़ता दिख रहा है। मैदान में कई दल हैं, पर असली सीधी टक्कर भाजपा vs सपा के बीच ही होगी। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को पीछे छोड़ दिया था। प्रदेश में भाजपा को 33 जबकि सपा को 37 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। लेकिन यह संभव है कि विधानसभा का चुनावी गणित अलग हो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में काफी लोकप्रिय हो चुके हैं खासकर अपने कड़े फैसले को लेकर। इसलिए विधानसभा चुनाव के गणित को अलग तरीकों से देखना होगा। भाजपा: 'डबल इंजन' से 'ट्रिपल अटैक' की तैयारी- भाजपा यूपी में 2017 और 2022 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। उसका कोर नैरेटिव 3 चीजों पर टिका है: हिंदुत्व + विकास: अयोध्या में राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, प्रयागराज कुंभ को भाजपा अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। साथ में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, नोएडा फिल्म सिटी, ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट जैसे विकास प्रोजेक्ट फ्रंट पर हैं। लॉ एंड ऑर्डर: 'माफिया राज खत्म' और 'बुलडोजर मॉडल' भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना है। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक इसे कानून-व्यवस्था की गारंटी के रूप में बेचा जा रहा है।
केंद्र + राज्य का तालमेल: मोदी का चेहरा राष्ट्रीय स्तर पर और योगी का चेहरा राज्य स्तर पर। यह 'डबल इंजन' 2024 लोकसभा में कुछ सीटों पर झटका खाने के बाद भी संगठन के लिए सबसे बड़ा भरोसा है। भाजपा की चुनौती: किसानों की नाराजगी, महंगाई, बेरोजगारी और आरक्षण जैसे मुद्दे। 2024 लोकसभा में पिछड़ा-दलित वोट में हुई सेंध को वापस लाना संगठन की प्राथमिकता है। सपा: 'पीडीए' फॉर्मूले से वापसी की कोशिश- अखिलेश यादव ने 2022 के बाद अपनी राजनीति को पूरी तरह रीसेट किया। सपा अब 'एम-वाई समीकरण' से आगे बढ़कर 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के फॉर्मूले पर खेल रही है। सोशल इंजीनियरिंग: भाजपा के 'नॉन-यादव OBC + नॉन-जाटव दलित' मॉडल को काटने के लिए सपा ने कुर्मी, निषाद, पाल, जाटव के अलावा मुस्लिम वोट को एकजुट करने की कोशिश की। 2024 लोकसभा में इसका असर दिखा भी।
रोजगार और महंगाई: पेपर लीक, अग्निवीर, बेरोजगारी और महंगाई को सपा मुख्य मुद्दा बना रही है। 'बेरोजगारी भत्ता' और पुरानी पेंशन बहाली जैसे वादे इसी दिशा में हैं। अखिलेश का सॉफ्ट हिंदुत्व: मंदिर जाने, कावड़ यात्रा, और समाजवादी पीडीए पंचायत से सपा उस 'तुष्टीकरण' के टैग को तोड़ने की कोशिश कर रही है जो उसे पहले घेरता था। सपा की चुनौती: संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना, परिवारवाद के आरोप से बचाना, और मुस्लिम+यादव के बाहर दूसरे पिछड़ों को स्थायी तौर पर जोड़ना।
बाकी दल कहाँ हैं? - बसपा: मायावती अभी भी दलित वोट की सबसे बड़ी ध्रुव हैं, पर 2022 और 2024 में उनका वोट बैंक खिसका। अगर वो अकेले लड़ती हैं तो वो भाजपा या सपा में से एक का नुकसान करेंगी, पर खुद सत्ता की रेस से बाहर दिख रही हैं। कांग्रेस: राहुल-प्रियंका के यूपी फोकस के बाद भी संगठन जमीन पर कमजोर है। वो कुछ सीटों पर सपा को फायदा या नुकसान दे सकती है, पर मुख्य मुकाबला नहीं। RLD + अन्य: जयंत चौधरी NDA में हैं। निषाद पार्टी, अपना दल भाजपा के साथ। ओम प्रकाश राजभर भी भाजपा के साथ। ये सब वोट कटवा या वोट ट्रांसफर का काम करेंगे, पर फ्रेम भाजपा vs सपा ही रहेगा। तो फैसला क्या होगा? यूपी में चुनाव हमेशा जाति, धर्म, विकास और कानून-व्यवस्था के मिश्रण से तय होता है। 2027 में भी फ्रेम यही रहेगा। भाजपा का दांव: हिंदुत्व + विकास + लॉ एंड ऑर्डर + मोदी-योगी का डबल चेहरा। सपा का दांव : पीडीए एकता + बेरोजगारी-महंगाई + 2024 की मोमेंटम। बसपा का वोट जिस तरफ शिफ्ट हुआ, और ब्राह्मण-ठाकुर-बनिया vs OBC-दलित-मुस्लिम का ध्रुवीकरण जिस हद तक हुआ, उसी पर सीटों का गणित बनेगा। जमीन पर चाहे जितने दल पोस्टर लगाएं, वोटर के दिमाग में लड़ाई दो ही खेमों के बीच है। एक तरफ योगी-मोदी की भाजपा, दूसरी तरफ अखिलेश की सपा। यूपी 2027 = भाजपा vs सपा। बाकी सब असर डालने वाले खिलाड़ी हैं, मुख्य खिलाड़ी ये दो ही हैं।


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