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नाबालिग वाहन चालकों के आतंक से लीलती ज़िंदगियाँ
भारत में नाबालिग बच्चों द्वारा वाहन चलाने से होने वाली दुर्घटनाओं का ग्राफ प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इन दुर्घटनाओं में लगभग 50% मौतें स्वयं नाबालिग बच्चों की होती हैं, जो शासन-प्रशासन और अभिभावकों के लिए गंभीर चिंतन का विषय है । नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने की समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की प्रमुख समस्या बन चुकी है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ही नहीं, बल्कि देश के सभी महानगर, नगर, कस्बे, गाँव और यहाँ तक कि गलियों के निवासी भी इस समस्या से त्रस्त हैं।
आज देश के किसी भी हिस्से में देख लें, अधिकतर नाबालिग बच्चे महंगी बाइकें और बड़ी कारें बेखौफ होकर तेज रफ्तार में दौड़ाते नजर आ जाते हैं। कानून के अनुसार नाबालिग द्वारा वाहन चलाना अपराध की श्रेणी में आता है, इसके बावजूद समाज स्वयं अपने बच्चों को इस अपराध की ओर धकेल रहा है। वहीं व्यवस्था बनाए रखने वाले जिम्मेदार अधिकारी भी अक्सर इस पर कठोर कार्रवाई करने के बजाय नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे दुर्घटनाओं में नाबालिगों की जान जाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 199A के अनुसार नाबालिग द्वारा वाहन चलाना दंडनीय अपराध है। इसके लिए संबंधित वाहन मालिक या अभिभावक को तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अब तक कितने अभिभावकों को वास्तव में सजा हुई है, यह स्वयं एक प्रश्न है। यदि कुल दुर्घटनाओं के 25% मामलों में भी अभिभावकों को सजा मिली हो, तो यह बड़ी बात होगी । देश को नाबालिग वाहन चालकों के आतंक से बचाने के लिए केंद्र, राज्य और जिला प्रशासन को कठोर एवं सख्त रुख अपनाना होगा। जो भी नाबालिग वाहन चलाते पाए जाएँ, उनके अभिभावकों या संबंधित वाहन मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए तथा जुर्माने की राशि में वृद्धि की जानी चाहिए।
यदि अभिभावक शासकीय सेवा में हों तो उनकी वेतन वृद्धि रोकी जाए, और यदि वे शासकीय सेवा में नहीं हैं तो उन्हें मिलने वाली सरकारी योजनाओं के लाभ अस्थायी रूप से बंद किए जाएँ। जब तक कठोर आर्थिक दंड और सुविधाओं पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी । नाबालिग वाहन चालकों के इस बढ़ते आतंक को समाप्त करने के लिए केंद्र एवं सभी राज्य सरकारों को एक्शन मोड में आकर ठोस और सख्त कदम उठाने होंगे। तभी परिवारों के चिराग और निर्दोष नागरिकों की जिंदगियाँ सुरक्षित रह पाएँगी, अन्यथा बरती गई, तो यह “रफ्तार का रोमांच” मासूम जिंदगियों को लीलता रहेगा। कानून का भय, सामाजिक जागरूकता और अभिभावकों की जिम्मेदारी—इन तीन स्तंभों पर ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है। अन्यथा, सड़कों पर यह अराजकता यूं ही निर्दोष जिंदगियों को निगलती रहेगी।
अरविंद रावल

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