परिवर्तन की दहलीज पर बांग्लादेश
महेन्द्र तिवारी
दक्षिण एशिया की राजनीति में समय-समय पर ऐसे मोड़ आते रहे हैं जो केवल किसी एक देश के सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक दिशा और सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं। बांग्लादेश में हाल ही में हुए संसदीय चुनावों और उसके बाद तारिक रहमान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह घटना केवल एक राजनीतिक दल की जीत या एक नेता के उदय का प्रसंग नहीं है, बल्कि एक ऐसे दौर का संकेत है जिसमें जनता की आकांक्षाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की नई व्याख्या सामने आ सकती है। वर्षों तक राजनीतिक ध्रुवीकरण और सत्ता संघर्ष से गुजरने के बाद यह परिवर्तन उस समाज की बेचैनी और उम्मीदों दोनों को प्रतिबिंबित करता है।
तारिक रहमान का राजनीतिक सफर स्वयं बांग्लादेश के हालिया इतिहास का एक प्रतीकात्मक प्रतिबिंब रहा है। एक ऐसे परिवार में जन्म लेने के कारण जहाँ राजनीति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी, उन्होंने सत्ता के निकट रहकर अवसर भी देखे और विवादों का सामना भी किया। भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते देश छोड़ना और लंबे समय तक विदेश में रहना उनके जीवन का वह अध्याय रहा जिसने उन्हें आलोचना और सहानुभूति दोनों दिलाई। निर्वासन के वर्षों में उन्होंने पार्टी के भीतर रणनीतिक भूमिका निभाई, जिससे यह धारणा बनी कि वे भले ही भौगोलिक रूप से दूर हों, लेकिन राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। जब परिस्थितियाँ बदलीं और वे वापस लौटे, तो उनकी वापसी केवल व्यक्तिगत पुनर्स्थापना नहीं थी, बल्कि उनके समर्थकों के लिए एक प्रतीकात्मक पुनरागमन था — एक ऐसा क्षण जिसमें वे स्वयं को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर सके।
2024 के जनआंदोलन ने बांग्लादेश की राजनीति में जो उथल-पुथल पैदा की, उसने सत्ता संरचना को बदलकर रख दिया। लंबे समय तक प्रभावशाली रही अवामी लीग को सत्ता से हटना पड़ा और इससे राजनीतिक रिक्तता उत्पन्न हुई। इस रिक्तता को भरने के लिए जो चुनाव हुए, उनमें मतदाताओं की भागीदारी और परिणामों ने स्पष्ट संकेत दिया कि जनता परिवर्तन की आकांक्षा रखती है। यह परिवर्तन कितना स्थायी या प्रभावी होगा, यह भविष्य के शासन पर निर्भर करेगा, लेकिन तत्कालीन परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया अभी भी जनता के लिए अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। चुनावों में विपक्ष की अनुपस्थिति या सीमित भागीदारी पर सवाल भी उठे, परंतु इसके बावजूद यह घटना राजनीतिक शक्ति संतुलन में निर्णायक बदलाव के रूप में दर्ज हुई।
तारिक रहमान की जीत के साथ उनके सामने जो जिम्मेदारियाँ आई हैं, वे केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नैतिक और संस्थागत भी हैं। एक ऐसे देश में जहाँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अक्सर वैचारिक से अधिक व्यक्तिगत संघर्ष में बदल जाती रही है, वहाँ लोकतांत्रिक विश्वास बहाल करना सबसे बड़ी चुनौती है। कानून-व्यवस्था की मजबूती, न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और आर्थिक स्थिरता को सुनिश्चित करना केवल नीतिगत निर्णयों से नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता से भी जुड़ा होता है। जनता के लिए परिवर्तन का अर्थ केवल नेतृत्व बदलना नहीं बल्कि जीवन की परिस्थितियों में ठोस सुधार देखना है। यदि नई सरकार इन अपेक्षाओं पर खरी उतरती है, तो यह सत्ता परिवर्तन इतिहास में सकारात्मक मोड़ के रूप में दर्ज होगा; अन्यथा यह भी अस्थायी राजनीतिक उतार-चढ़ाव की श्रेणी में शामिल हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण आयाम भारत-बांग्लादेश संबंधों से भी जुड़ा है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक निकटता, ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक साझेदारी लंबे समय से संबंधों को आकार देते रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के साथ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नई सरकार इन संबंधों को किस दिशा में ले जाएगी। भारत द्वारा प्रतिनिधि भेजकर शपथ समारोह में भागीदारी जताना कूटनीतिक निरंतरता का संकेत है, वहीं नई सरकार द्वारा संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की इच्छा एक नए संवाद की संभावना खोलती है। सीमा प्रबंधन, जल बंटवारा, व्यापार और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे केवल द्विपक्षीय समझौतों का विषय नहीं बल्कि लाखों लोगों के जीवन से जुड़े प्रश्न हैं। इसलिए इन पर होने वाला संवाद आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद उत्पन्न राजनीतिक विमर्श भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन के साथ आरोप-प्रत्यारोप और वैचारिक संघर्ष सामने आते हैं, परंतु दीर्घकालीन स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता संस्थागत मर्यादा के भीतर रहे। यदि नई सरकार अपने विरोधियों को केवल राजनीतिक पराजित मानने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा समझे, तो इससे राजनीतिक वातावरण में संतुलन आ सकता है। वहीं यदि प्रतिशोध की भावना हावी होती है, तो इससे सामाजिक विभाजन गहरा सकता है। यह संतुलन साधना किसी भी नए नेतृत्व के लिए सबसे कठिन परीक्षा होती है।
तारिक रहमान का शपथ ग्रहण इस मायने में प्रतीकात्मक भी है कि यह परंपराओं से अलग आयोजन के रूप में सामने आया है। स्थान और स्वरूप में परिवर्तन को केवल औपचारिक बदलाव के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसे प्रतीक अक्सर जनता के मन में नए अध्याय की अनुभूति पैदा करते हैं। हालाँकि वास्तविक परिवर्तन प्रतीकों से आगे बढ़कर नीतियों और क्रियान्वयन में दिखाई देता है। इसलिए यह क्षण जितना आशा का है, उतना ही सावधानी से मूल्यांकन का भी है।
दक्षिण एशिया का इतिहास बताता है कि राजनीतिक परिवर्तन अक्सर भावनात्मक ऊर्जा से भरे होते हैं, परंतु उनकी सफलता प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक समावेशन पर निर्भर करती है। बांग्लादेश ने आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक सूचकांकों में पिछले दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसे बनाए रखना और आगे बढ़ाना किसी भी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। साथ ही वैश्विक आर्थिक दबाव, जलवायु परिवर्तन और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे ऐसे हैं जिनसे निपटने के लिए संतुलित कूटनीति और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता होगी।
अंततः यह कहा जा सकता है कि तारिक रहमान का सत्ता में आगमन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि एक संभावनाओं से भरा क्षण है। इसमें उम्मीद भी है और अनिश्चितता भी, समर्थन भी है और आलोचना भी। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि वह किसी भी परिवर्तन को अंतिम सत्य नहीं मानता, बल्कि उसे निरंतर संवाद और मूल्यांकन की प्रक्रिया का हिस्सा बनाता है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह नया अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ता है, परंतु फिलहाल यह घटना उस क्षेत्रीय राजनीति की धड़कन को सुनने का अवसर देती है जहाँ जनता, नेतृत्व और पड़ोसी देश मिलकर इतिहास की अगली पंक्तियाँ लिखते हैं।

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