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भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान शिक्षा: सोच-समझकर आगे बढ़ने की आवश्यकता
प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
भारतीय शिक्षा जगत में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ का पुनरुत्थान निश्चय ही एक स्वागतयोग्य पहल है। यह केवल अतीत के गौरव का स्मरण नहीं, बल्कि बौद्धिक आत्मविश्वास के पुनर्निर्माण का प्रयास भी है। किंतु इसकी सार्थकता इस बात पर निर्भर करेगी कि श्रद्धा और तर्क के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है। विज्ञान शिक्षा का उद्देश्य किसी परंपरा को भावनात्मक आग्रह से स्वीकार करना नहीं, बल्कि परीक्षण, प्रमाण और तार्किक सुसंगति के आधार पर सत्य की खोज करना है। अतः विरासत का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसे वर्तमान संदर्भ में विवेकपूर्ण ढंग से पुनर्जीवित किया जाए।
आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में स्थान मिले या नहीं, बल्कि यह है कि उसका स्वरूप, मानक और सीमाएँ क्या हों। भारतीय ज्ञान परंपरा एक बहुस्तरीय अवधारणा है, जिसमें गणित, खगोल, आयुर्वेद, कृषि, पर्यावरण, वास्तुकला और अर्थशास्त्र जैसे विज्ञान-सम्मत विषय भी सम्मिलित हैं; साथ ही दर्शन, परा-चेतना और जीवन-शैली संबंधी चिंतन भी इसका हिस्सा है। इस समग्र ज्ञान को बिना विवेक के ‘विज्ञान’ के एक ही साँचे में ढालना न तो अकादमिक दृष्टि से उचित है और न ही शिक्षा की गुणवत्ता के लिए हितकर। इसलिए विषय-वस्तु का श्रेणीबद्ध वर्गीकरण अनिवार्य प्रतीत होता है।
विज्ञान शिक्षा की दृष्टि से भारतीय ज्ञान संपदा को पाँच श्रेणियों में समझा जा सकता है। पहली श्रेणी में वह ज्ञान और खोजें आती हैं, जो आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर पूर्णतः प्रमाणित हैं। इसमें आर्यभट्ट से लेकर आधुनिक भारत के वैज्ञानिकों—जैसे जगदीश चंद्र बसु, सी. वी. रमन, सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाद साहा, होमी भाभा, विक्रम साराभाई, श्रीनिवास रामानुजन, वेंकटरमन रामकृष्णन और ए. पी. जे. अब्दुल कलाम—के वैज्ञानिक योगदान सम्मिलित हैं। इनके प्रमाणित शोधों को पाठ्यक्रम में प्रमुखता देना न केवल न्यायसंगत होगा, बल्कि विद्यार्थियों में वैज्ञानिक आत्मविश्वास भी विकसित करेगा।
दूसरी श्रेणी में वे प्राचीन भारतीय अवधारणाएँ रखी जा सकती हैं, जिन्हें आधुनिक विज्ञान प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार नहीं करता, किंतु जिनसे वैज्ञानिक चिंतन को वैचारिक प्रेरणा मिलती है। सांख्य दर्शन का प्रकृति-परिवर्तन सिद्धांत, उपनिषदों का ऊर्जा-चेतना संबंध, रस-शास्त्र की धातु अवधारणाएँ अथवा दशावतार में विकास की प्रतीकात्मक कल्पना—इन सभी को ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि स्थापित वैज्ञानिक सत्य के रूप में।
तीसरी श्रेणी में वे विषय आते हैं, जो प्रथम दृष्टया विज्ञान-सम्मत प्रतीत होते हैं, किंतु जिनका वैश्विक प्रमाणीकरण अभी शेष है, जैसे आयुर्वेद के कुछ उपचार, पारंपरिक कृषि प्रणालियाँ अथवा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कुछ वैज्ञानिक-तकनीकी दावे। इन्हें अंतिम सत्य के रूप में नहीं, बल्कि संभावित अनुसंधान विषय के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी अंधानुकरण के बजाय वैज्ञानिक परीक्षण की ओर प्रवृत्त हों। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि विश्व के अनेक विश्वविद्यालय भारतीय ग्रंथों में निहित विज्ञान-सम्मत तथ्यों को समझने और प्रमाणित करने में लगे हैं—ऐसे में भारत का पीछे रह जाना दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
चतुर्थ श्रेणी दार्शनिक और प्रतीकात्मक चिंतन की है, जैसे सांख्य और वैशेषिक दर्शन। इनका उद्देश्य जीवन-दृष्टि प्रदान करना रहा है, अतः इन्हें विज्ञान की पाठ्य-पुस्तकों के बजाय ‘विज्ञान का इतिहास और दर्शन’ जैसे पाठ्यक्रमों में स्थान देना अधिक उपयुक्त होगा। पाँचवीं श्रेणी में भारतीय वैज्ञानिकों के जीवन-संघर्ष और प्रेरक कथाएँ सम्मिलित की जानी चाहिए, जिससे यह संदेश मिले कि भारत में रहते हुए भी विश्वस्तरीय शोध संभव है।
यह भी स्मरणीय है कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं है। आधुनिक भारत के वैज्ञानिकों और शोध संस्थानों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहनीय अनुसंधान किए हैं। इन्हें पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर देशज अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
विशेष ध्यान देने योग्य पहलू है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए अनेकों लेखकों ने इस परंपरा से जुड़े हुए विभिन्न विषयों पर न केवल पुस्तकें, अध्याय एवं शोध-लेख आदि का लेखन किया है(जिनका वैज्ञानिक कसौटी पर परीक्षण अभी शेष है)बल्कि इन्हें पाठ्यक्रम में सम्मिलित करवाने के लिए भी निरंतर प्रयासरत रहे हैं, कुछ को सफलता भी मिली है। मेरा ऐसा मानना है कि ऐसी किसी भी लेखन को पाठ्यक्रम, संदर्भ-ग्रंथ या पाठ्य-पुस्तक में तभी स्थान मिले, जबकि वह आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरती हो।
अंततः आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विज्ञान-सम्मत तत्वों का आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर परीक्षण और प्रमाणीकरण किया जाए। वैज्ञानिकों और संस्कृत विद्वानों के संयुक्त प्रयास, समर्पित शोध पीठों और दीर्घकालिक परियोजनाओं के माध्यम से परंपरा को भावनात्मक बहस का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अन्वेषण का विषय बनाया जाए। यही संतुलित दृष्टि भारतीय शिक्षा को वैज्ञानिक भी बनाएगी और बौद्धिक रूप से परिपक्व भी।

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