मंदिरों में उमड़ती आस्था के बीच बार-बार क्यों टूटती है सुरक्षा की व्यवस्था?

"अशोकधाम से पहले भी कई धर्मस्थलों पर भगदड़ ने ली जान, हादसों के बाद जांच और घोषणाएं होती हैं, लेकिन भीड़ प्रबंधन की कमियां फिर सामने आ जाती हैं"

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बिहार के लखीसराय स्थित अशोकधाम मंदिर में सोमवार को हुई भगदड़ ने एक बार फिर देश के धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। श्रावण के तीसरे सोमवार को भगवान शिव के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे। सुबह करीब साढ़े छह बजे दर्शन की कतार स्टेशन के पास अशोकधाम हॉल्ट तक पहुंच गई थी। इसी दौरान पुरुषों की कतार के पास बिजली का पोल गिरने और करंट फैलने की अफवाह से अचानक अफरा-तफरी मच गई। देखते ही देखते महिलाओं की कतार में दबाव बढ़ा और भगदड़ में सात महिला श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हुए। प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य शुरू किया तथा घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं।
 
अशोकधाम की घटना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि बिहार में इसी साल कुछ महीने पहले नालंदा के शीतला माता मंदिर में भी ऐसी ही त्रासदी हो चुकी है। 31 मार्च 2026 को चैत्र महीने के अंतिम मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां शीतला के दर्शन के लिए पहुंचे थे। भारी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से आठ महिलाओं की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। उस घटना के बाद भीड़ वाले प्रमुख धर्मस्थलों पर सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए व्यवस्थाएं मजबूत करने की जरूरत सामने आई थी।
 
लेकिन सवाल यही है कि हादसे के बाद बनने वाली योजनाएं जमीन पर कितनी उतरती हैं। अशोकधाम की घटना ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है। जब किसी मंदिर में विशेष पर्व, सावन के सोमवार, नवरात्रि, जन्माष्टमी या अन्य धार्मिक अवसर पर सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक श्रद्धालु पहुंचने की संभावना पहले से मालूम होती है, तो उस भीड़ के अनुरूप प्रवेश, निकास, कतार, बैरिकेडिंग, आपातकालीन रास्ते, चिकित्सा सुविधा और अफवाहों से निपटने की व्यवस्था क्यों नहीं हो पाती?
 
पिछले दो वर्षों के घटनाक्रम को देखें तो देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ का दबाव कई बार जानलेवा साबित हुआ है। 12 अगस्त 2024 को बिहार के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर क्षेत्र स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर में सावन सोमवार के दौरान भगदड़ जैसी स्थिति बनी थी। बड़ी संख्या में श्रद्धालु जल चढ़ाने पहुंचे थे। इस हादसे में सात श्रद्धालुओं की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद मंदिरों में भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे थे।
 
इसके बाद 2024 की सबसे बड़ी धार्मिक भीड़ त्रासदियों में उत्तर प्रदेश का हाथरस हादसा रहा। 2 जुलाई 2024 को हाथरस जिले में एक धार्मिक सत्संग के बाद भगदड़ मच गई। अंतिम आंकड़ा 121 मृतकों तक पहुंचा और मृतकों में बड़ी संख्या महिलाओं तथा बच्चों की थी। यह हादसा मंदिर के भीतर नहीं, बल्कि धार्मिक आयोजन स्थल पर हुआ था, लेकिन इससे यह साफ हुआ कि बड़ी संख्या में लोगों को एक सीमित क्षेत्र में जुटाने के बाद उनके सुरक्षित आवागमन की योजना कितनी महत्वपूर्ण होती है।
 
साल 2025 में भी मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में भीड़ से जुड़े हादसे थमे नहीं। 8 जनवरी 2025 को आंध्र प्रदेश के तिरुपति में वैकुंठ द्वार दर्शन के लिए टोकन लेने के दौरान भगदड़ मच गई। इस घटना में छह श्रद्धालुओं की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। हजारों श्रद्धालु विशेष दर्शन के लिए जुटे थे और टोकन वितरण केंद्रों के आसपास भीड़ का दबाव बढ़ गया था।
 
29 जनवरी 2025 को प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान संगम क्षेत्र में भीड़ का दबाव बढ़ने से भगदड़ हुई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार करीब 30 लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में श्रद्धालु घायल हुए। महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में करोड़ों लोगों की संभावित मौजूदगी के कारण भीड़ प्रबंधन अपने आप में सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस हादसे ने फिर दिखाया कि लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था के बीच एक छोटी-सी अव्यवस्था भी गंभीर परिणाम दे सकती है।
 
3 मई 2025 को गोवा के शिरगांव स्थित श्री लैराई देवी मंदिर के वार्षिक उत्सव में भगदड़ ने छह लोगों की जान ले ली और बड़ी संख्या में श्रद्धालु घायल हुए। बाद में सरकार द्वारा गठित जांच समिति ने इसे पूरी तरह रोके जा सकने वाला हादसा बताया और खराब योजना, निर्देशों के पालन में कमी तथा अपर्याप्त बुनियादी सुविधाओं जैसी कमियों को जिम्मेदार ठहराया। यह निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि ऐसे हादसे केवल अचानक पैदा हुई अफरा-तफरी का परिणाम नहीं होते, बल्कि पहले से मौजूद व्यवस्थागत कमियां भी उनकी जमीन तैयार करती हैं।
 
29 जून 2025 को ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर के पास भगदड़ में तीन श्रद्धालुओं की मौत हुई और 50 से अधिक लोग घायल हुए। हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए जुटे थे। घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों पर भी सवाल उठे और राज्य सरकार ने जांच के साथ अधिकारियों पर कार्रवाई की।
 
27 जुलाई 2025 को उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित मनसा देवी मंदिर में भीड़ के दबाव ने आठ लोगों की जान ले ली। मंदिर तक पहुंचने वाले संकरे रास्ते और सीढ़ियों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। बिजली के तार से जुड़े खतरे की अफवाह से लोगों में घबराहट बढ़ी और भगदड़ की स्थिति बन गई। यह घटना अशोकधाम हादसे से इसलिए भी जुड़ती नजर आती है क्योंकि दोनों मामलों में बिजली से संबंधित भय या अफवाह ने भीड़ के व्यवहार को अचानक बदल दिया।
 
इसके अगले ही दिन 28 जुलाई 2025 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी स्थित अवसानेश्वर मंदिर में भी बिजली के तार से जुड़ी घटना के बाद भगदड़ जैसी स्थिति बनी। अधिकारियों के अनुसार एक जीवित बिजली का तार टिन की छत पर गिर गया था, जिससे अफरा-तफरी मची। हादसे में दो श्रद्धालुओं की मौत हुई और 32 लोग घायल हुए।इन घटनाओं को एक साथ देखने पर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। कई जगह भीड़ पहले से अनुमानित थी। धार्मिक पर्वों की तारीख पहले से तय थी। मंदिरों की लोकप्रियता और संभावित श्रद्धालुओं की संख्या भी प्रशासन से छिपी नहीं थी। फिर भी प्रवेश और निकास के अलग-अलग रास्ते, नियंत्रित कतारें, भीड़ की घनत्व पर निगरानी, आपातकालीन निकासी और स्पष्ट सूचना व्यवस्था जैसी बुनियादी चीजें कई स्थानों पर पर्याप्त नहीं दिखीं।
 
भगदड़ में अक्सर लोगों को नुकसान किसी एक व्यक्ति के धक्का देने से नहीं, बल्कि भीड़ के सामूहिक दबाव से होता है। जब हजारों लोग एक ही दिशा में अचानक आगे बढ़ते हैं और सामने रास्ता संकरा हो, बैरिकेड हो या निकास बंद हो, तो कुछ ही क्षणों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। अफवाह इस खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। अशोकधाम और मनसा देवी की घटनाओं में बिजली से जुड़े भय ने लोगों के व्यवहार को अचानक प्रभावित किया। ऐसे में अफवाहों को रोकने के लिए तत्काल सार्वजनिक घोषणा और प्रशिक्षित कर्मचारियों की मौजूदगी भीड़ प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए।
 
धार्मिक स्थलों की सुरक्षा केवल पुलिस बल की संख्या बढ़ाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए आयोजन से पहले जोखिम का आकलन, संभावित भीड़ का वैज्ञानिक अनुमान, प्रवेश और निकास की क्षमता का परीक्षण, आपातकालीन मार्गों की उपलब्धता, बिजली और अग्नि सुरक्षा की जांच, चिकित्सा दल की तैनाती और लगातार निगरानी जरूरी है। जिस रास्ते से हजारों लोग निकलने वाले हों, वहां किसी भी तरह की रुकावट या विपरीत दिशा से आने वाली भीड़ गंभीर खतरा बन सकती है।
 
सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हादसे के बाद जांच और मुआवजे तक व्यवस्था सीमित न रहे। हर बड़े धार्मिक आयोजन के बाद यह देखा जाना चाहिए कि तय सुरक्षा मानकों का पालन वास्तव में हुआ या नहीं। अगर किसी मंदिर में लाखों श्रद्धालु पहुंचने की संभावना है तो वहां केवल धार्मिक आयोजन की तैयारी नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की भी उतनी ही गंभीर तैयारी होनी चाहिए।
 
भारत में आस्था की शक्ति बहुत बड़ी है। मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर उमड़ने वाली भीड़ इसी आस्था की अभिव्यक्ति है। श्रद्धालु दर्शन के लिए घर से निकलता है तो उसके मन में विश्वास होता है कि वह सुरक्षित लौटेगा। इसलिए प्रशासन, मंदिर प्रबंधन और आयोजन समितियों की पहली जिम्मेदारी यही है कि आस्था को अव्यवस्था में न बदलने दिया जाए।
 
अशोकधाम की घटना ने एक बार फिर चेतावनी दी है। हादसे के बाद संवेदना, जांच और मुआवजा जरूरी हैं, लेकिन उनसे भी अधिक जरूरी है कि अगली भीड़ जुटने से पहले व्यवस्था दुरुस्त हो। यदि हर त्रासदी के बाद वही सवाल उठते रहें और अगली धार्मिक भीड़ में वही कमियां दोहराई जाती रहें, तो जांच और घोषणाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। अब समय है कि मंदिरों और बड़े धार्मिक आयोजनों की सुरक्षा को व्यवस्था का वैकल्पिक हिस्सा नहीं, बल्कि आयोजन की पहली अनिवार्यता माना जाए।
 
कांतिलाल मांडोत
 
 

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