जंतर-मंतर पर सीजेपी का धरना कितना सार्थक?

देश में जब भी किसी बड़ी परीक्षा को लेकर विवाद खड़ा होता है, तब उसका असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र, सरकार और समाज पर पड़ता है।

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देश में जब भी किसी बड़ी परीक्षा को लेकर विवाद खड़ा होता हैतब उसका असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे शिक्षा तंत्रसरकार और समाज पर पड़ता है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार विवादों के केंद्र में रही है। प्रश्नपत्र लीकपरीक्षा की निष्पक्षता पर सवालपरिणामों को लेकर विवाद और पारदर्शिता की मांग ने लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों को चिंतित किया है।

इसी पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर पर सीजेपी द्वारा नीट छात्रों के समर्थन में दिया गया धरना चर्चा का विषय बना। सवाल यह है कि क्या इस तरह का धरना वास्तव में छात्रों के हित में सार्थक साबित होता है या यह केवल राजनीतिक और सामाजिक संदेश देने का माध्यम बनकर रह जाता है।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार- भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। जंतर-मंतर लंबे समय से देश में जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है।

जब लाखों छात्र किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी बात पर्याप्त रूप से नहीं सुनी जा रहीतब शांतिपूर्ण धरना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा माना जा सकता है। यदि धरने का उद्देश्य छात्रों की वास्तविक समस्याओं को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक पहुंचाना होतो इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की सकारात्मक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। छात्रों की आवाज को मिला मंच-

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धरने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह बिखरी हुई आवाजों को एक मंच देता है। देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाले छात्र अपनी समस्याओं को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं उठा पातेलेकिन किसी सामूहिक आंदोलन के माध्यम से उनकी मांग राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाती है। नीट जैसी परीक्षा में शामिल होने वाले लाखों छात्र वर्षों की तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैंतो उनका मानसिक तनाव और भविष्य की चिंता स्वाभाविक है। धरने के माध्यम से यही संदेश दिया जाता है कि छात्रों की मेहनत और भविष्य सर्वोपरि है। सरकार और संस्थाओं पर बढ़ता है दबाव-

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लोकतांत्रिक आंदोलनों का एक उद्देश्य जवाबदेही तय करना भी होता है। जब किसी परीक्षा को लेकर व्यापक विरोध होता हैतो संबंधित एजेंसियों और सरकार पर जांच करानेसुधार लागू करने और पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव बनता है।

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यदि धरने के कारण परीक्षा प्रणाली में सुधारसुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनेपेपर लीक रोकने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसे कदम उठाए जाते हैंतो आंदोलन को सार्थक कहा जा सकता है। केवल विरोध नहींसमाधान भी जरूरी- किसी भी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ जुटाने से तय नहीं होती। यदि धरने के दौरान परीक्षा सुधारतकनीकी सुरक्षापारदर्शी जांचसमयबद्ध कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम जैसे ठोस सुझाव दिए जाएंतो उसका प्रभाव कहीं अधिक सकारात्मक होता है।

सिर्फ परीक्षा रद्द करने या विरोध दर्ज कराने से आगे बढ़कर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने पर भी ध्यान देना आवश्यक है। राजनीतिक हस्तक्षेप पर उठते हैं सवाल- ऐसे आंदोलनों में अक्सर विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी शामिल हो जाते हैं। इससे आंदोलन को व्यापक समर्थन तो मिलता हैलेकिन कई बार आरोप लगते हैं कि छात्रों के मुद्दों का राजनीतिक लाभ उठाया जा रहा है।

यदि किसी भी संगठन का उद्देश्य वास्तव में छात्रों के हितों की रक्षा करना हैतो आंदोलन को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखते हुए केवल शिक्षा सुधार और छात्रों के अधिकारों पर केंद्रित रहना चाहिए।

छात्रों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव- नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र पहले से ही अत्यधिक दबाव में रहते हैं। परीक्षा विवाद और लगातार चल रहे आंदोलनों का असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

इसलिए किसी भी आंदोलन को इस प्रकार संचालित किया जाना चाहिए कि छात्रों में अनिश्चितता और भय बढ़ने के बजाय उन्हें भरोसा मिले कि उनकी समस्याओं का समाधान खोजा जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता- नीट विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि केवल परीक्षा आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि पूरी प्रक्रिया में आधुनिक तकनीकमजबूत साइबर सुरक्षाप्रश्नपत्र की गोपनीयतापरीक्षा केंद्रों की निगरानी और निष्पक्ष जांच व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाया जाए।

यदि आंदोलन इन सुधारों की दिशा में सरकार और संबंधित संस्थाओं को ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करता हैतो उसका दीर्घकालिक प्रभाव सकारात्मक हो सकता है।

नीट छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पर सीजेपी का धरना लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता हैबशर्ते उसका उद्देश्य छात्रों के हितों की रक्षापरीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता सुनिश्चित करना हो।

किसी भी आंदोलन की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उसके परिणामस्वरूप क्या ठोस बदलाव हुएक्या छात्रों का विश्वास बहाल हुआ और क्या भविष्य में ऐसी समस्याओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए। अंततः यह याद रखना होगा कि नीट केवल एक परीक्षा नहींबल्कि लाखों युवाओं के सपनों और भविष्य से जुड़ा विषय है।

इसलिए सरकारपरीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियोंन्यायपालिकासामाजिक संगठनों और छात्रों—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि परीक्षा प्रणाली को निष्पक्षपारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जाए। तभी किसी भी धरने या आंदोलन की सार्थकता वास्तविक अर्थों में सिद्ध होगी।

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