संपादकीय

फर्जी मुकदमों की बढ़ती चुनौती: एससी-एसटी और पॉक्सो कानूनों के कथित दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल

भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं...
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रील बनाम रियल लाइफ 

मनोज कुमार अग्रवाल     आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते  याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे  और सामाजिक न्याय एवं विज्ञान की व्याख्या करते नहीं...
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तनाव के बढ़ते कारण और संतुलित जीवन की आवश्यकता

आज का युग विज्ञान तकनीक और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य ने विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए हैं। इसके बावजूद उसका जीवन पहले की अपेक्षा अधिक तनावपूर्ण होता जा रहा है। बाहरी सुख सुविधाओं की वृद्धि के...
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हे समाज, कुछ चेहरों की भूल पर हर बेटी को दोषी मत ठहराओ

कृति आरके जैन यदि किसी मोहल्ले में एक घर की दीवार गिर जाए, तो क्या पूरा शहर जर्जर घोषित कर दिया जाता है? यदि एक डॉक्टर लापरवाह निकल जाए, तो क्या पूरा चिकित्सा जगत अपराधी हो जाता...
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ऑपरेशन मिलाप : बिछड़ों को अपनों से मिलाने का मानवीय अभियान, परिवारों के आंसुओं में लौटी खुशियों की रोशनी

किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का...
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हिंसा राजनीतिक अस्थिरता और मानवाधिकार संकट के बीच घिरा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर गंभीर अशांति और हिंसा का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को तनाव और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब...
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मौत की फैक्ट्री ने खोली व्यवस्था की पोल,सबूतों के बाद भी यदि जिम्मेदार बच जाएं तो न्याय अधूरा रहेगा

जयपुर के खोह नागोरियान क्षेत्र में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट और आगजनी की घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने वाली त्रासदी है।...
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भारतीयता गर्व की अनुभूति

भारतीय संस्कृति आज भी सारगर्भित और कल भी देश में नहीं अपितु जग में आलोकित थी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सत्यार्थ, कालांतर में  भारत वर्ष मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण...
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