5 मार्च संत तुकाराम महाराज की जन्मजयंती

राष्ट्रचेतना के अमर गायक और मराठी संस्कृति के प्राणपुरुष संत तुकाराम महाराज जयंती पर उनकी लोकमंगल साधना और देशहितकारी जीवन दृष्टि का स्मरण

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भारत की संत परंपरा ने सदैव समाज को दिशा दी है। जब भी धर्म और नैतिकता पर संकट आया तब किसी न किसी महापुरुष ने जन्म लेकर जनमानस को जागृत किया। सत्रहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र की पावन भूमि देहू में ऐसे ही एक तेजस्वी संत का अवतरण हुआ जिन्हें हम संत तुकाराम महाराज के नाम से जानते हैं। उनकी जयंती का पावन अवसर हमें उनके जीवन आदर्शों और राष्ट्रहितकारी संदेशों को स्मरण करने का अवसर देता है।
 
संत तुकाराम महाराज मराठी संस्कृति के प्राण हैं। उन्होंने भक्ति को केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे जनजीवन से जोड़ा। उनका संपूर्ण जीवन भगवान विठ्ठल की अनन्य भक्ति में समर्पित था। वे वारकरी परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र थे और पंढरपुर के विठोबा को अपना आराध्य मानते थे। उनकी वाणी में ऐसी सरलता और आत्मीयता थी कि सामान्य किसान व्यापारी स्त्री पुरुष सभी उनके अभंग गाकर आत्मिक आनंद का अनुभव करते थे।
 
तुकाराम महाराज ने अपने अभंगों के माध्यम से समाज को जागृत किया। उन्होंने आडंबर और पाखंड का विरोध किया। उनका स्पष्ट संदेश था कि केवल बाहरी कर्मकांड से मन की शुद्धि नहीं होती। यदि भीतर से मन निर्मल न हो तो तीर्थयात्रा भी व्यर्थ है। कद्दू की कथा इसी सत्य को प्रकट करती है कि बाहरी स्नान से कड़वाहट नहीं जाती जब तक भीतर परिवर्तन न हो। यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी।
 
मराठी भाषा को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में उनका अप्रतिम योगदान है। उन्होंने संस्कृत के गूढ़ तत्वों को सरल मराठी में व्यक्त किया ताकि सामान्य जन भी धर्म के गूढ़ रहस्यों को समझ सके। उनके अभंग केवल भक्ति गीत नहीं बल्कि सामाजिक क्रांति के घोष थे। उन्होंने जाति अहंकार और ऊंच नीच की भावना का विरोध किया। उनके समागम में हर वर्ग का व्यक्ति समान भाव से बैठता था। यही भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
 
देशहित में संत का दायित्व केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं होता। संत समाज का नैतिक प्रहरी होता है। तुकाराम महाराज ने अपने समय की विकृतियों को पहचाना और समाज को सजग किया। उन्होंने परिश्रम ईमानदारी और करुणा का संदेश दिया। उनका जीवन सादगी का प्रतीक था। वे स्वयं कठिन परिस्थितियों से गुजरे परंतु कभी ईश्वर भक्ति और मानव सेवा से विमुख नहीं हुए।
 
उनकी वाणी में राष्ट्रचेतना की झलक भी मिलती है। जिस काल में वे रहे उसी समय महाराष्ट्र में स्वराज्य की भावना जागृत हो रही थी। संतों की शिक्षाओं ने जनमानस में आत्मविश्वास और स्वाभिमान जगाया। भक्ति के माध्यम से उन्होंने लोगों को भीतरी शक्ति दी। जब मन मजबूत होता है तभी समाज और राष्ट्र मजबूत बनता है। इस दृष्टि से तुकाराम महाराज का योगदान अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रनिर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 
तुकाराम महाराज की एक विशेषता थी कि वे विरोध और अपमान के बावजूद क्षमा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ते थे। जिन लोगों ने उनका विरोध किया वे भी अंततः उनकी महानता से प्रभावित होकर उनके शिष्य बने। यह उनके चरित्र की विशालता को दर्शाता है। उन्होंने कभी प्रतिशोध का मार्ग नहीं अपनाया बल्कि प्रेम से सबको जीता। यही सच्चे संत की पहचान है।
 
उनकी वाणी में करुणा और समता का संदेश है। वे कहते हैं कि सच्चा ब्राह्मण वही है जो ब्रह्म को जानता है। इस कथन में सामाजिक समरसता का गूढ़ संदेश छिपा है। उन्होंने कर्म और गुण को महत्व दिया न कि जन्म को। इस प्रकार उन्होंने समाज को विभाजन से बचाने का प्रयास किया। आज जब समाज में भेदभाव और कटुता की प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं तब तुकाराम महाराज की शिक्षा और भी आवश्यक हो जाती है।
 
तुकाराम महाराज के जीवन का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग उनका वैकुंठ गमन माना जाता है। वारकरी परंपरा में यह विश्वास है कि वे शरीर सहित भगवान के धाम को प्रस्थान कर गए। इस प्रसंग का आध्यात्मिक महत्व यह है कि संत का जीवन और मृत्यु दोनों लोककल्याण के लिए होते हैं। उन्होंने यह संदेश दिया कि जो व्यक्ति पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति करता है उसे ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होती है।
 
मराठी संस्कृति में तुकाराम बीज और उनकी जयंती बड़े श्रद्धाभाव से मनाई जाती है। देहू और पंढरपुर में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं। हजारों वारकरी उनके अभंग गाते हुए उनकी स्मृति को प्रणाम करते हैं। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है। इन अवसरों पर समाज सेवा और सत्संग के माध्यम से उनके आदर्शों को जनजन तक पहुंचाया जाता है।
 
आज आवश्यकता है कि हम तुकाराम महाराज की शिक्षाओं को केवल स्मरण तक सीमित न रखें बल्कि अपने जीवन में उतारें। तीर्थयात्रा का वास्तविक अर्थ मन की यात्रा है। यदि हम अपने भीतर की कड़वाहट ईर्ष्या और द्वेष को त्याग दें तो वही सच्ची जयंती मनाना होगा। राष्ट्रहित तभी सुरक्षित रहेगा जब नागरिक नैतिक और संवेदनशील होंगे। संतों की वाणी हमें यही प्रेरणा देती है।
 
संत तुकाराम महाराज ने दिखाया कि भक्ति और समाज सुधार एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने धर्म को जीवन का आधार बनाया परंतु उसे मानव सेवा से जोड़ा। उनका संदेश है कि ईश्वर हर हृदय में निवास करता है इसलिए किसी से घृणा न करो। यही विचार भारत की सनातन संस्कृति की आत्मा है।
 
उनकी जयंती पर हम संकल्प लें कि सत्य प्रेम और करुणा को अपने जीवन का आधार बनाएंगे। मराठी संस्कृति के इस अमर संत ने हमें जो आध्यात्मिक और सामाजिक धरोहर दी है वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। राष्ट्रचेतना के इस महान गायक को शत शत नमन।
 
कांतिलाल मांडोत

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