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खामनेई की मौत पर छाती पीटने वाले, निर्दोष भारतीयों की मौत पर मौन क्यों थे?
अमेरिका इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की मृत्यु के बाद भारत सहित अनेक देशों में उनके समर्थकों द्वारा छाती पीट-पीटकर मातम मनाया जा रहा है और अमेरिका तथा इजराइल की आलोचना की जा रही है। किंतु प्रश्न यह है कि युद्ध हो या आतंकवाद, उसके घाव सदैव गहरे और त्रासद होते हैं। उनकी टीस लंबे समय तक जनमानस को व्यथित करती रहती है । ईरान के सुप्रीम लीडर के रूप में लगभग 36 वर्षों तक सत्ता में रहे खामनेई के शासनकाल में कितने निर्दोष लोगों ने दमन और कठोर नीतियों का सामना किया, यह किसी से छिपा नहीं है। क्या मातम मनाने वाले उनके समर्थकों को यह स्मरण है? जब किसी देश के नागरिक स्वयं अपने सर्वोच्च नेता की मृत्यु पर सड़कों पर उतरकर जश्न मनाते दिखाई दें, तो यह शासन और जनता के बीच गहरे असंतोष का संकेत देता है। ऐसे में भारत में शोक प्रकट करने वाले लोग आखिर किस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं ?
ईरानी सुप्रीम खामनेई पर आरोप रहे कि उन्होंने महिलाओं की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगाए । हिजाब को अनिवार्य करना और इस्लामी नियमों की कठोर व्याख्या के आधार पर सामाजिक जीवन को नियंत्रित करना उनकी नीतियों का हिस्सा रहा । आधुनिक युग में जब ईरान की महिलाओं और युवाओं ने स्वतंत्रता तथा समान अधिकारों की मांग उठाई, तब विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से दबाया गया। अनेक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की है । यह भी विचारणीय है कि जब भारत में आतंकी हमलों में निर्दोष नागरिक मारे गए, तब क्या इन शोक प्रकट करने वालों ने उतनी ही तीव्रता से संवेदना व्यक्त की ? यदि हम सचमुच मानवीय मूल्यों के पक्षधर हैं, तो हमारी संवेदनाएं चयनात्मक नहीं होनी चाहिए । हिंसा चाहे कहीं भी हो ईरान में या भारत में उसकी समान रूप से निंदा होनी चाहिए ।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते । कभी ईरान और इजरायल के संबंध सामान्य थे, किंतु वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें कट्टर विरोधी बना दिया। मध्य-पूर्व के कई देश, जैसे सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत, भी इस तनावपूर्ण वातावरण से प्रभावित रहे हैं । निस्संदेह, किसी भी युद्ध की विभीषिका अत्यंत भयावह होती है। हुक्मरानों के अहंकार की कीमत अंततः आम नागरिकों, महिलाओं, बच्चों और सैनिकों को ही चुकानी पड़ती है। अतः किसी भी शासक की मृत्यु पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देने से पूर्व उसके शासनकाल का समग्र और निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है । यदि हम वास्तव में मानवता के पक्षधर हैं, तो हमें हर निर्दोष की पीड़ा पर समान रूप से संवेदनशील होना चाहिए चाहे वह किसी भी देश या धर्म का क्यों न हो।
अरविंद रावल

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