क्या संभावित अमेरिका-ईरान युद्ध वैश्विक युद्ध का आगाज होगा
अमेरिका की भीषण जंगी तैयारी
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्ध की आशंका केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रही है बल्कि उसके पीछे गहरी सामरिक तैयारियाँ और दीर्घकालिक सैन्य रणनीतियाँ भी काम कर रहीं हैं। अब अमेरिका अपनी जंगली लाव- लश्कर के साथ ईरान को चारों तरफ से घेरने की तैयारी में तैनात हो गया है। अब यदि कभी प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति बनती है, तो यह समझना आवश्यक होगा कि अमेरिका विशिष्ट प्रकार की सैन्य तैयारी और युद्ध क्षमता के साथ मैदान में उतर सकता है, और ऐसी तैयारी किसी क्षेत्रीय संघर्ष को व्यापक वैश्विक टकराव की दिशा में धकेल सकती है। अमेरिका विश्व की सबसे सशक्त सैन्य शक्तियों में शुमार माना जाता है, जिसकी वैश्विक उपस्थिति अनेक महाद्वीपों में फैले सैन्य अड्डों, नौसैनिक बेड़ों और वायुसेना ठिकानों के रूप में दिखाई देती है।
खाड़ी क्षेत्र में उसकी स्थायी और अस्थायी सैन्य तैनाती पहले से मौजूद है, जिसमें विमानवाहक पोत समूह, मिसाइल विध्वंसक जहाज़, पनडुब्बियाँ और उन्नत लड़ाकू विमान शामिल होते हैं। अमेरिकी सामरिक सिद्धांत “फोर्स प्रोजेक्शन” पर आधारित है, अर्थात वह अपनी सैन्य शक्ति को दूरस्थ क्षेत्रों में तेज़ी से तैनात करने की क्षमता रखता है। अमेरिका की युद्ध तैयारी का एक प्रमुख आयाम उसकी वायु श्रेष्ठता है। अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान, लंबी दूरी के बमवर्षक और ड्रोन नेटवर्क उसे शुरुआती चरण में शत्रु के वायु रक्षा तंत्र, संचार नेटवर्क और सामरिक ठिकानों को निष्क्रिय करने की क्षमता प्रदान करते हैं।
किसी संभावित युद्ध में अमेरिका पहले चरण में “शॉक एंड ऑ” जैसी रणनीति अपनाते हुए मिसाइल हमलों और सटीक बमबारी के माध्यम से ईरान की कमांड एंड कंट्रोल संरचना को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। इसके अतिरिक्त उसकी साइबर युद्ध बड़ी ताकत है, जिसके माध्यम से वह शत्रु के विद्युत ग्रिड, बैंकिंग तंत्र और सैन्य संचार प्रणाली को बाधित कर सकता है।नौ-सैनिक दृष्टि से फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
यदि युद्ध छिड़ता है तो अमेरिकी नौसेना समुद्री मार्गों की सुरक्षा और ईरान की नौसैनिक गतिविधियों को नियंत्रित करने पर विशेष ध्यान देगी। विमानवाहक पोत समूह किसी भी तटीय लक्ष्य पर दूर से ही आक्रमण करने में सक्षम होते हैं। साथ ही पनडुब्बियों से दागी जाने वाली क्रूज़ मिसाइलें ईरान के भीतर गहरे स्थित ठिकानों तक पहुंच सकती हैं। अमेरिका की मिसाइल रक्षा प्रणाली और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय भी उसकी तैयारी का हिस्सा होता है।
अमेरिका की सामरिक तैयारी केवल प्रत्यक्ष युद्ध तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह अपने सहयोगी देशों और सैन्य गठबंधनों के माध्यम से दबाव बनाने की नीति भी अपनाता है। खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे, क्षेत्रीय साझेदारों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास, और उन्नत हथियार प्रणालियों की तैनाती एक प्रकार का शक्ति प्रदर्शन भी होते हैं। इसके अतिरिक्त आर्थिक प्रतिबंध और वित्तीय नाकेबंदी भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा होते हैं, जिनका उद्देश्य शत्रु देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर युद्ध क्षमता को सीमित करना होता है।
हालांकि, यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि ईरान पारंपरिक युद्ध में अमेरिका से कमजोर होते हुए भी असममित युद्ध रणनीति में दक्ष माना जाता है। वह मिसाइलों, ड्रोन, समुद्री माइंस और प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों को निशाना बना सकता है। इसलिए अमेरिकी तैयारी में केवल आक्रमण ही नहीं, बल्कि रक्षा और क्षति-नियंत्रण की योजना भी शामिल रहती है।
मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल होगा। यदि इस संघर्ष में अन्य महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होती हैं, तो स्थिति और जटिल हो सकती है। रूस और चीन जैसे देश कूटनीतिक या सीमित सामरिक समर्थन के माध्यम से शक्ति संतुलन बनाने का प्रयास कर सकते हैं। वहीं इज़राइल अपनी सुरक्षा चिंताओं के कारण सक्रिय भूमिका निभा सकता है। ऐसी स्थिति में युद्ध क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर प्रभाव डाल सकता है, विशेषकर ऊर्जा बाज़ार और वैश्विक व्यापार पर।
नअमेरिका की सामरिक तैयारी का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता भी है, यद्यपि परमाणु हथियारों का उपयोग अंतिम विकल्प माना जाता है। परमाणु त्रिस्तरीय प्रणाली भूमि आधारित मिसाइलें, पनडुब्बी से प्रक्षेपित मिसाइलें और रणनीतिक बमवर्षक उसे व्यापक प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करती हैं। यही कारण है कि पूर्ण विश्व युद्ध की संभावना अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, क्योंकि परमाणु शक्ति संतुलन बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष टकराव को रोकने में भूमिका निभाता है।
अमेरिका की युद्ध तैयारी बहुआयामी, तकनीकी रूप से उन्नत और वैश्विक नेटवर्क पर आधारित है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है तो प्रारंभिक चरण में अमेरिका अपनी वायु, नौसैनिक और साइबर क्षमता का व्यापक उपयोग कर सामरिक बढ़त लेने का प्रयास करेगा। किंतु यह संघर्ष विश्व युद्ध में तब्दील होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अन्य महाशक्तियाँ किस हद तक प्रत्यक्ष रूप से शामिल होती हैं और कूटनीतिक प्रयास कितने सफल रहते हैं।
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में प्रत्यक्ष विश्व युद्ध सभी के लिए विनाशकारी होगा, इसलिए संभावना अधिक यही है कि सामरिक तैयारी के बावजूद बड़े देश पूर्ण युद्ध से बचने का प्रयास करेंगे और संघर्ष को सीमित दायरे में रखने की रणनीति अपनाएँगे। वैश्विक स्तर पर यह लगातार प्रयास किया जा रहे हैं कि अमेरिका ईरान युद्ध जो बाद में वैश्विक युद्ध में परिवर्तित हो सकता है,को न होने दिया जाए अन्यथा प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध की तरह अमेरिका तीसरे विश्व युद्ध का निर्णायक देश फिर साबित होगा जो पूरे वैश्विक देश के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है।

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