अवैध खनन और कानून व्यवस्था पर हमला

सख्त कार्रवाई और कड़ी निगरानी की जरूरत

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देश के कई हिस्सों में अवैध खनन केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। हाल ही में हरियाणा के पानीपत जिले के इसराना क्षेत्र में घटी घटना ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर दिया। एसआई सुरेंद्र कुमार अपनी टीम के साथ खनन चेकिंग ड्यूटी पर थे, जब उन्हें सूचना मिली कि बिना ई-रवाना या अनुमति के मिट्टी का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। पुलिस टीम ने गाड़ी नंबर एसआर 6, 4384 को रोका, लेकिन चालक आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने न केवल प्रशासन बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया।
 
जब पुलिस ने नियमानुसार कार्रवाई करते हुए गाड़ी को आरटीए पार्किंग भेजने का निर्णय लिया, तो आरोपियों ने खुलेआम पुलिस की कार्रवाई में बाधा डाली। रास्ते में एक अन्य वाहन HR26CM 2871 को आगे लगाकर पुलिस की गाड़ी रोकी गई, सिपाही को जबरन नीचे उतारा गया और जब्त की गई गाड़ी छीनकर फरार हो गए। इतना ही नहीं, जाते-जाते मिट्टी को सड़क पर खाली कर दिया गया और पुलिस को धमकी दी गई कि “पंगा मत लेना।” यह केवल एक गाड़ी छीनने की घटना नहीं है, बल्कि यह राज्य की कानूनी व्यवस्था को खुली चुनौती है।
 
अवैध खनन लंबे समय से देश के विभिन्न राज्यों में फल-फूल रहा है। यह गतिविधि नदियों, खेतों और सार्वजनिक भूमि को नुकसान पहुंचाती है। इससे भू-क्षरण बढ़ता है, जलस्तर प्रभावित होता है और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है। लेकिन जब अवैध खनन करने वाले तत्व पुलिस या प्रशासन पर ही हमला करने लगें, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। यह दर्शाता है कि कुछ लोगों में कानून का भय कम हो रहा है और वे संगठित तरीके से प्रशासन को चुनौती देने का साहस जुटा रहे हैं।
 
ऐसी घटनाओं के पीछे अक्सर आर्थिक लालच और संगठित गिरोहों की भूमिका होती है। अवैध खनन से त्वरित लाभ मिलता है, इसलिए इसमें शामिल लोग जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। कई बार स्थानीय स्तर पर दबाव, राजनीतिक संरक्षण या सामाजिक प्रभाव के कारण भी इन तत्वों के हौसले बुलंद रहते हैं। जब सख्त और त्वरित दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाता है कि कानून से बच निकलना संभव है। यही कारण है कि बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं।
 
भारतीय कानून में सरकारी ड्यूटी में बाधा डालने, पुलिस पर हमला करने और अवैध खनन जैसे अपराधों के लिए प्रावधान मौजूद हैं। भारतीय दंड संहिता के तहत सरकारी कर्मचारी के कार्य में बाधा डालना दंडनीय अपराध है। अवैध खनन के लिए खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के तहत भी सख्त प्रावधान हैं। इसके बावजूद यदि जमीनी स्तर पर इन कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होता, तो उनका अस्तित्व मात्र कागजी बनकर रह जाता है। कानून का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि अपराध को रोकना भी होता है। जब दंड का भय समाप्त हो जाता है, तो अपराधी तत्व निर्भीक हो जाते हैं।
 
इस प्रकार की घटनाएं पुलिस बल के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। जो कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी निभाते हैं, यदि उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाए या उनके साथ धक्का-मुक्की कर सरकारी वाहन छीना जाए, तो यह न केवल व्यक्तिगत अपमान है बल्कि पूरे तंत्र की प्रतिष्ठा पर आघात है। यदि पुलिसकर्मियों को यह भरोसा न हो कि राज्य उनके पीछे मजबूती से खड़ा है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
 
कड़ी निगरानी की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि अवैध खनन अक्सर सुनियोजित तरीके से किया जाता है। इसमें स्थानीय नेटवर्क, ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था और अवैध सामग्री के विपणन तक का संगठित ढांचा शामिल होता है। आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन सर्विलांस, जीपीएस ट्रैकिंग और ई-रवाना सिस्टम का प्रभावी उपयोग कर इस पर अंकुश लगाया जा सकता है। साथ ही, खनन क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण और अचानक छापेमारी से अपराधियों को यह संदेश दिया जा सकता है कि प्रशासन सतर्क है।
 
न्यायिक प्रक्रिया की गति भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। यदि ऐसे मामलों में आरोपपत्र दाखिल करने और सुनवाई में लंबा समय लग जाता है, तो अपराधियों का हौसला बढ़ता है। त्वरित न्याय और उदाहरणात्मक सजा से ही समाज में यह संदेश जाएगा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। साथ ही, यदि पुलिस पर हमला करने जैसे अपराधों को गंभीर श्रेणी में रखकर कठोर दंड सुनिश्चित किया जाए, तो यह भविष्य में ऐसे दुस्साहस को रोकने में सहायक होगा।
 
समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कई बार स्थानीय लोग अवैध खनन को “सामान्य” मान लेते हैं या आर्थिक लाभ के कारण चुप रहते हैं। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट अंततः समाज के ही हितों के विरुद्ध है। खेतों की उपजाऊ मिट्टी का नुकसान, जलस्रोतों का क्षरण और सड़कों की क्षति सीधे तौर पर आम नागरिक को प्रभावित करते हैं। यदि समाज सजग हो और प्रशासन को सहयोग दे, तो ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।
 
सरकारों को भी चाहिए कि वे केवल कार्रवाई तक सीमित न रहें, बल्कि वैकल्पिक रोजगार और पारदर्शी खनन नीतियों को बढ़ावा दें। जब वैध प्रक्रियाएं सरल और पारदर्शी होंगी, तो अवैध गतिविधियों की गुंजाइश कम होगी। साथ ही, पुलिस बल को पर्याप्त संसाधन, सुरक्षा और कानूनी समर्थन प्रदान करना अनिवार्य है। यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि सरकारी ड्यूटी में बाधा डालना या पुलिस पर हमला करना किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
 
इसराना की घटना केवल एक स्थानीय समाचार नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक समस्या का प्रतीक है। यदि समय रहते इस पर कठोर और समन्वित कदम नहीं उठाए गए, तो कानून व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है। आवश्यक है कि प्रशासन, न्यायपालिका और समाज मिलकर ऐसी घटनाओं के विरुद्ध सख्त रुख अपनाएं। कड़ी निगरानी, त्वरित कार्रवाई और कठोर दंड ही वह रास्ता है जिससे अवैध खनन और पुलिस पर हमले जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। कानून का राज तभी स्थापित होगा जब हर नागरिक को यह विश्वास हो कि नियमों का पालन सभी पर समान रूप से लागू होता है और उल्लंघन करने वालों को निश्चित रूप से दंड मिलेगा।
 
कांतिलाल मांडोत

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