बंगाल में ‘दीदी बनाम मोदी’ की सीधी जंग, तमिलनाडु में द्रविड़ किले पर ‘विजय’ फैक्टर की दस्तक

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देश की सियासत एक बार फिर दो बड़े गैर-भाजपा शासित राज्यों,पश्चिम बंगाल और तमिलनाडुकी ओर टिकी है। दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो चुकी है और राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। एक ओर बंगाल में ‘दीदी बनाम मोदी’ की सीधी लड़ाई आकार ले रही है, तो दूसरी ओर तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक द्वंद्व के बीच अभिनेता विजय की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। इन दोनों राज्यों के चुनाव न केवल क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों पर भी गहरा असर डाल सकते हैं।
 
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी डेढ़ दशक से सत्ता में हैं। 34 साल तक चले वाम शासन के ‘लाल किले’ को भेदकर सत्ता में आईं ममता आज भी आक्रामक तेवर में नजर आती हैं। उनके लिए महिला मतदाता, अल्पसंख्यक समर्थन, सामाजिक योजनाएं और मजबूत बूथ कैडर चुनावी आधार की धुरी हैं। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने ग्रामीण और महिला वोट बैंक में गहरी पैठ बनाई है। इसके साथ ही ममता की सड़क पर उतरकर संघर्ष करने वाली छवि पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरती है। हाल के महीनों में भर्ती घोटाले, मंत्रियों की गिरफ्तारी, हजारों नियुक्तियों के रद्द होने और कुछ चर्चित घटनाओं ने सरकार की छवि पर सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन ममता इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए सीधे मुकाबले की रणनीति अपना रही हैं।
 
दूसरी ओर, भाजपा ने बंगाल में पिछले चुनाव में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की थी। 2021 के चुनाव में पार्टी ने 77 सीटें जीतकर खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया। भाजपा की रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे, ‘डबल इंजन’ सरकार के वादे और संगठित बूथ प्रबंधन पर टिकी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई केंद्रीय नेताओं के दौरे लगातार बढ़ रहे हैं। पार्टी घुसपैठ, भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराध और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है। फिर भी भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य स्तर पर ममता के कद का सर्वमान्य चेहरा खड़ा करना है। स्थानीय नेतृत्व की कमी और बंगाली अस्मिता के सवाल पर टीएमसी की आक्रामक राजनीति भाजपा के लिए कठिन परीक्षा बन सकती है।
 
बंगाल की राजनीति में ‘सड़क की ताकत’ को निर्णायक माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जो सड़क पर दिखता है, वही चुनावी धारणा गढ़ता है। फिलहाल ममता की सक्रियता और संगठन की जमीनी मौजूदगी उन्हें बढ़त देती दिखती है, लेकिन भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ा है और पार्टी अपने समर्थकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश में है कि सत्ता परिवर्तन संभव है। वाम दल और कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि विपक्षी वोटों का बिखराव होता है तो इसका सीधा लाभ टीएमसी को मिल सकता है।
 
तमिलनाडु की तस्वीर अलग है, लेकिन उतनी ही रोचक। यहां पांच दशकों से द्रविड़ दलों का वर्चस्व कायम है। मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और विपक्षी अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बीच रहा है। 2021 में डीएमके ने बहुमत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन सामाजिक कल्याण योजनाओं, क्षेत्रीय अस्मिता और केंद्र के साथ टकराव की राजनीति को आधार बना रहे हैं। हिंदी थोपने के आरोप और संघीय ढांचे के मुद्दे को भी डीएमके जोर-शोर से उठा रही है।
 
एआईएडीएमके, जो कभी जे. जयललिता के नेतृत्व में मजबूत धुरी थी, उनके निधन के बाद से आंतरिक खींचतान से जूझ रही है। पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में है, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। भाजपा राज्य में अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करना चाहती है और 50 से अधिक सीटों की मांग कर रही है, जबकि एआईएडीएमके सीमित साझेदारी के पक्ष में है। भाजपा की कोशिश एआईएडीएमके से अलग हुए नेताओं को फिर से साथ लाकर व्यापक एनडीए खड़ा करने की है।
 
तमिलनाडु की राजनीति में इस बार सबसे बड़ा नया फैक्टर अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) है। युवाओं और दक्षिण तमिलनाडु में विजय की लोकप्रियता ने चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की संभावना बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीवीके 10-15 प्रतिशत वोट भी हासिल करती है तो यह पारंपरिक समीकरणों को बदल सकता है। विजय खुद को भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने डीएमके और भाजपा दोनों से दूरी बनाकर तीसरे मोर्चे की संभावना खुली रखी है।कांग्रेस इस राज्य में डीएमके के साथ गठबंधन में है और अधिक सीटों की मांग कर रही है, लेकिन अंतिम फैसला सीट शेयरिंग वार्ता पर निर्भर करेगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए तमिलनाडु में विस्तार की चुनौती बरकरार है, क्योंकि यहां राष्ट्रीय दलों की भूमिका अब तक सीमित रही है।
 
दोनों राज्यों में एक समान तत्व है।पहचान की राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं का प्रभाव। बंगाल में जहां महिला और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक माने जाते हैं, वहीं तमिलनाडु में सामाजिक न्याय, भाषा और क्षेत्रीय गर्व का मुद्दा अहम है। भाजपा इन दोनों राज्यों में अपनी जड़ें गहरी करने की कोशिश में है, लेकिन उसे स्थानीय भावनाओं और मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व की दीवार से जूझना पड़ रहा है।
 
आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या पुनरावृत्ति का प्रश्न नहीं हैं। यह क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति की परीक्षा भी है। बंगाल में यदि ममता फिर जीतती हैं तो उनका कद राष्ट्रीय विपक्ष की धुरी के रूप में और मजबूत होगा। वहीं भाजपा यदि सीटों में बड़ी बढ़त दर्ज करती है तो पूर्वी भारत में उसका विस्तार नया अध्याय लिखेगा। तमिलनाडु में डीएमके की वापसी द्रविड़ मॉडल की पुष्टि मानी जाएगी, जबकि एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन की सफलता दक्षिण भारत में भाजपा की संभावनाओं को नई ऊर्जा दे सकती है। और यदि विजय की पार्टी उल्लेखनीय प्रदर्शन करती है, तो यह राज्य की राजनीति में स्थायी बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
 
इस तरह 2026 के विधानसभा चुनाव बंगाल और तमिलनाडु में केवल सरकार चुनने का अवसर नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा तय करने की निर्णायक घड़ी बनते जा रहे हैं। देश की निगाहें अब इन दो राज्यों पर टिकी हैं, जहां हर रैली, हर बयान और हर गठबंधन भविष्य की राजनीति की पटकथा लिख रहा है।फिर भी कयास लगाए जा रहे है कि मतदाता जंगलराज से परेशान है ओर इसकी तैयारी कर चुकी भाजपा जीत का दावा कर परिवर्तन की पूर्ण सम्भावना बताई जा रही है। 
 
कांतिलाल मांडोत

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