शिवाजी महाराज: एक अजेय योद्धा और आदर्श सुशासन के प्रणेता

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महेन्द्र तिवारी

 

भारतीय इतिहास के फलक पर छत्रपति शिवाजी महाराज एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक सदियों बाद भी धुंधली नहीं हुई है। उनका जीवन केवल एक राजा की विजय गाथा नहीं, बल्कि एक दबे-कुचले समाज के आत्मसम्मान की वापसी का महाकाव्य है। 17वीं शताब्दी का वह कालखंड जब संपूर्ण भारत विदेशी आक्रांताओं के पैरों तले रौंदा जा रहा था, उत्तर में मुगलों का कट्टर शासन था और दक्षिण में बीजापुर व गोलकुंडा की सल्तनतें अपनी जड़ें जमाए हुए थीं, उस अंधकारमय समय में शिवाजी ने 'स्वराज्य' की मशाल जलाई। 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में जन्में इस बालक के भाग्य में केवल जागीरदारी भोगना नहीं, बल्कि एक नए राष्ट्र का निर्माण करना लिखा था। उनकी माता जीजाबाई ने उनके बाल मन में रामायण और महाभारत के पात्रों के माध्यम से जो संस्कार बोए, उन्होंने शिवाजी को केवल एक योद्धा नहीं बल्कि एक धर्मनिष्ठ और नीतिवान शासक बनाया। पिता शाहजी भोंसले की सैन्य प्रतिभा और माता के आध्यात्मिक मार्गदर्शन ने उन्हें वह दृष्टि दी जिससे उन्होंने समझ लिया था कि गुलामी की बेड़ियाँ केवल तलवार से नहीं, बल्कि संगठित शक्ति और स्वाभिमान से टूटती हैं। शिवाजी का बचपन पुणे के मावल क्षेत्र की पहाड़ियों में बीता, जहाँ उन्होंने प्रकृति के साथ-साथ वहां के सीधे-सादे मावलों के हृदय को भी जीता। इन्हीं मावलों को उन्होंने अपनी सेना की रीढ़ बनाया और उन्हें सिखाया कि स्वराज्य के लिए मरना नहीं, बल्कि लड़कर जीतना ही एकमात्र विकल्प है।

शिवाजी महाराज की सैन्य प्रतिभा का पहला परिचय तब मिला जब मात्र 16 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने तोरण दुर्ग पर अधिकार कर लिया। यह उस समय की महान शक्तियों को एक स्पष्ट चुनौती थी। उन्होंने धीरे-धीरे चाकन, कोंडाणा और पुरंदर जैसे किलों को अपने अधिकार में लेकर अपनी शक्ति का विस्तार करना शुरू किया। उनकी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था 'गनिमी कावा' यानी छापामार युद्ध पद्धति। वे जानते थे कि मुगलों और आदिलशाही की विशाल सेनाओं का सामना खुले मैदान में करना आत्मघाती होगा, इसलिए उन्होंने सह्याद्रि की दुर्गम पहाड़ियों को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उनकी सेना छोटी थी लेकिन अत्यंत तीव्रगामी और अनुशासित थी। शिवाजी ने किलों के महत्व को बखूबी समझा था, उनका मानना था कि जिसके पास दुर्ग है, उसी के पास भूमि है। इसीलिए उन्होंने न केवल पुराने किलों की मरम्मत करवाई बल्कि रायगढ़ और सिंधुदुर्ग जैसे अजेय किलों का निर्माण भी कराया। बीजापुर के सेनापति अफजल खान के साथ उनका मुकाबला इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जो उनकी वीरता और बुद्धिमत्ता दोनों को दर्शाता है। जब अफजल खान ने छल से उन्हें मारने का प्रयास किया, तो शिवाजी ने अपने बाघनख से उसका अंत कर दिया। इस घटना ने पूरे दक्षिण भारत में यह संदेश फैला दिया कि अब विदेशी आक्रांताओं का काल आ चुका है।

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शिवाजी महाराज केवल एक विजेता नहीं थे, वे एक महान दृष्टा थे। उन्होंने भांप लिया था कि भारत की लंबी समुद्री सीमा की रक्षा किए बिना स्वराज्य कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। उस समय सिद्दी, पुर्तगाली और अंग्रेज समुद्र के रास्ते भारत में घुसपैठ कर रहे थे। शिवाजी ने एक शक्तिशाली नौसेना का गठन किया, जिसके कारण उन्हें 'भारतीय नौसेना का जनक' कहा जाता है। उन्होंने समुद्र के बीचों-बीच किलों का निर्माण करवाया ताकि समुद्री लुटेरों और विदेशी व्यापारियों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण यह भी था कि उन्होंने कभी भी युद्ध को धर्म युद्ध का नाम देकर निरपराधों पर अत्याचार नहीं किया। उनके शासन में महिलाओं का सम्मान सर्वोपरि था। कल्याण के सूबेदार की बहू का उदाहरण विश्वविख्यात है, जिसे बंदी बनाकर लाए जाने पर शिवाजी ने उसे सम्मान सहित वापस भेजा और कहा कि काश मेरी माता भी आपकी तरह सुंदर होतीं तो मैं भी सुंदर होता। यह उनके चरित्र की पराकाष्ठा थी जिसने उन्हें 'जानता राजा' यानी प्रजा के सुख-दुख को समझने वाला राजा बनाया।

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औरंगजेब जैसे शक्तिशाली मुगल सम्राट के साथ शिवाजी का संघर्ष भारतीय इतिहास का सबसे रोमांचक हिस्सा है। आगरा के किले में शिवाजी को नजरबंद करना औरंगजेब की बड़ी भूल साबित हुई। जिस तरह से शिवाजी मिठाई के टोकरे में छिपकर अपने पुत्र संभाजी के साथ वहां से सुरक्षित निकले, उसने मुगलों के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया। महाराष्ट्र लौटकर उन्होंने अपनी शक्ति को पुनः संगठित किया और एक-एक करके अपने खोए हुए किलों को वापस जीता। 6 जून 1674 को रायगढ़ के दुर्ग में उनका राज्याभिषेक हुआ। यह केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि हिंदवी स्वराज्य की विधिवत स्थापना थी। उन्होंने 'छत्रपति' की उपाधि धारण की और सिद्ध किया कि भारत की संतानें अपना भाग्य स्वयं लिखने में सक्षम हैं। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जो आधुनिक समय के मंत्रिमंडल जैसा ही था। इसमें प्रशासन के विभिन्न विभागों के लिए विशेषज्ञ मंत्री नियुक्त किए गए थे। उन्होंने भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए सख्त नियम बनाए और यह सुनिश्चित किया कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले।

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शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था में जाति और पंथ के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। उनकी सेना में मुसलमान भी उच्च पदों पर आसीन थे और उनके तोपखाने का प्रमुख इब्राहिम खान था। उन्होंने हमेशा योग्यता को प्राथमिकता दी। उन्होंने स्वराज्य की राजभाषा के रूप में मराठी और संस्कृत को बढ़ावा दिया और 'राज्य व्यवहार कोष' तैयार करवाया ताकि प्रशासनिक शब्दावली से विदेशी शब्दों का प्रभाव कम किया जा सके। उनकी न्याय व्यवस्था त्वरित और निष्पक्ष थी। वे अपने सैनिकों को लूट पर निर्भर रहने के बजाय सरकारी खजाने से नकद वेतन देते थे, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था। पर्यावरण के प्रति भी उनकी संवेदनशीलता अनुकरणीय थी; उन्होंने स्पष्ट आदेश दिए थे कि किलों या जहाजों के निर्माण के लिए फलदार वृक्षों को न काटा जाए और वनों का संरक्षण किया जाए।

शिवाजी महाराज का जीवन चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। उनके लिए स्वराज्य का अर्थ केवल भौगोलिक सीमाएं जीतना नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। समर्थ रामदास और संत तुकाराम जैसे संतों का उन पर गहरा प्रभाव था, जिन्होंने उनके भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना को और प्रगाढ़ किया। 3 अप्रैल 1680 को मात्र 50 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया, लेकिन उनके द्वारा बोया गया स्वराज्य का बीज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका था। उनकी मृत्यु के बाद भी मराठों ने औरंगजेब के खिलाफ 27 वर्षों तक स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा और अंततः मुगलों की कमर तोड़ दी। शिवाजी का व्यक्तित्व एक ऐसे आदर्श शासक का है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। वे एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं—अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का विचार, आत्मसम्मान के साथ जीने का विचार और राष्ट्र की सेवा में सर्वस्व अर्पण करने का विचार। आज भी जब हम उनके जीवन का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि उनकी नीतियां, चाहे वह जल प्रबंधन हो, सैन्य रणनीति हो या सुशासन, आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम भारतीय इतिहास के पन्नों पर ही नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हृदय में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जो हमें सदैव यह याद दिलाता रहेगा कि संकल्प यदि दृढ़ हो और उद्देश्य पवित्र, तो कोई भी बाधा हमें हमारे लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

शिवाजी महाराज की विरासत को किसी एक क्षेत्र या भाषा तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे पूरे भारत के गौरव हैं। उनके द्वारा स्थापित परंपराओं ने ही आगे चलकर बाजीराव पेशवा और अन्य महान सेना नायकों को जन्म दिया जिन्होंने अटक से कटक तक भगवा ध्वज फहराया। आधुनिक भारत में भी जब हम अपनी नौसेना के ध्वज को देखते हैं, तो उसमें शिवाजी महाराज की शाही मुहर का प्रभाव दिखाई देता है। वे एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने गुलाम मानसिकता को उखाड़ फेंका और भारत को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाई। उनका जीवन हमें सिखाता है कि शक्ति और भक्ति का संगम ही राष्ट्र को परम वैभव तक ले जा सकता है।

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