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भारत की पावन धरा पर रचे वेदों, उपनिषदों और प्रमाणिक शास्त्रों की तथ्यात्मक जानकारी प्रत्येक सनातनी के लिए अनिवार्य है
वेद मानव सभ्यता के आदि स्रोत हैं—ज्ञान, विज्ञान और मानवीय कल्याण के अक्षय भंडार। चारों वेदों को प्राचीनतम ऋषियों ने मानवीय हितार्थ रचा। विश्व की सांस्कृतिक परंपरा में ऋग्वेद को सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ माना जाता है। ‘वेद’ का अर्थ है—ज्ञान, और यह ज्ञान विश्वहित में है। वेदों में वर्णित सत् कालातीत है। सृष्टि कब और कैसे हुई—इस पर मतभेद संभव हैं, पर किसी मत का खंडन या मीनमेख निकालना उद्देश्य नहीं।
सनातन परंपरा के अनुसार ब्रह्मांड की सृष्टि क्रम में आदि शक्ति ने विष्णु को प्रकट किया, उनके नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और फिर शिव का उद्भव हुआ। पारस्परिक परिचय के बाद देवी ने उनके कार्य निर्धारण किए—ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। माता ने उनके लिए लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती का भी प्राकट्य किया। इसी तरह स्वर्ग, मृत्युलोक, पाताल और प्रकृति की शोभा भी प्रकट हुई।
मानवीय सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति और एक नारी को उत्पन्न कर उन्हें पति-पत्नी के धर्म बताए। दक्ष से 27 नक्षत्र कन्याएँ तथा दीति-अदीति का जन्म हुआ, जिनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ। दीति से दैत्य और अदीति से देव उत्पन्न हुए, और उनके स्वभावानुसार देव-दानव संघर्ष आरंभ हुआ।
सृष्टि विस्तार से पूर्व ब्रह्मा ने सात प्रजापति ऋषियों—वशिष्ठ, भृगु, कश्यप आदि—को उत्पन्न कर उन्हें ज्ञान-विज्ञान का प्रसार करने का आदेश दिया। उन्होंने नारद को भी सृष्टि विस्तार का दायित्व देने का प्रयास किया, जिसे नारद ने अस्वीकार किया। क्रोधित ब्रह्मा ने उन्हें लोक-लोकांतर में विचरण का अभिशाप दिया। इसी क्रम में 60 हजार पुत्र उत्पन्न हुए जिन्हें ब्रह्मा ने सृष्टि को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। वे नारद के पास ज्ञान के लिए गए और नारद ने उन्हें विष्णु का नामजप कराया। इसे अवज्ञा मान ब्रह्मा ने उन्हें भी अभिशाप दिया कि गंगा अवतरण के समय उसके जलस्पर्श से वे पुनर्जीवित होंगे।
सनातन संस्कृति की विराटता और गहराई को पूर्णतः निरूपित करना कठिन है। मान्यता है कि चारों वेद विष्णु ने अपनी भुजाओं से प्रकट किए और नई सृष्टि के समय मनु-शतरूपा तथा सप्तऋषियों को सौंप कर कहा कि वेदों के ज्ञाता और प्रसारक यही ऋषि होंगे और मनु उनका संरक्षण करेंगे। सतयुग, त्रेता, द्वापर और प्रारंभिक कलियुग तक चक्रवर्ती सम्राटों ने धर्म, न्याय और संस्कृति की रक्षा की। विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य आदि के शासनकाल तक भारत पर विदेशी आक्रमण लगभग असंभव था। सिकंदर का पराभव इसका उदाहरण है।
सनातन मान्यताओं के अनुसार कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, प्रकृति उसे दंडित करती है। यही भारतभूमि की विशिष्टता है। किंतु सातवीं शताब्दी के बाद जब केंद्र में शक्तिशाली सम्राट नहीं रहे, तब विदेशी आक्रांताओं—कासिम, गौरी, गजनवी, खिलजी आदि—ने भारत पर आक्रमण कर लूटपाट और अत्याचार किए। राजाओं की पारस्परिक बैमनस्यता के कारण भारत 7वीं से 20वीं सदी तक पराधीनता की पीड़ा झेलता रहा।
स्वतंत्र भारत में वामपंथी इतिहासकारों ने पराधीनता काल के अत्याचार, लूट, धर्मांतरण आदि के सत्य को इतिहास से हटाकर सनातनियों के साथ अन्याय किया। मुगल और अंग्रेज कालीन भारत को ही भारतीय इतिहास का केंद्र दिखाना ऐतिहासिक अपराध है। करोड़ों बलिदानों के बाद अंग्रेजी शासन समाप्त हुआ, पर उनकी विभाजनकारी नीति ने भारत के साथ पाकिस्तान का निर्माण कराया।
स्वतंत्र भारत में संविधान का निर्माण हुआ जिसमें अनेक विद्वान शामिल थे। 1952 के प्रथम चुनाव में पंडित नेहरू प्रधानमंत्री बने। परंतु स्वतंत्रता के बाद भी सनातन संस्कृति, शिक्षा केंद्रों, वैज्ञानिक मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर चोटें जारी रहीं। अंग्रेजों की तरह ही स्वतंत्र भारत में भी सामाजिक भ्रम, जातिवाद और क्षेत्रवाद को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय चेतना कमजोर की गई।
महर्षि वेदव्यास ने गणेशजी की लेखनी से वेदों को सरल कर जन-जन तक पहुँचाया। विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त, अशोक, हर्ष जैसे सम्राटों ने भारत को सांस्कृतिक और वैज्ञानिक ऊँचाई पर पहुँचाया। पर प्रश्न उठता है—स्वतंत्र भारत में हम अपनी वैज्ञानिक व सांस्कृतिक मान्यताओं के प्रति भ्रमित क्यों? राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई न होने और संस्कृति विरोधी राजनीति के कारण सामूहिक प्रगति बाधित होती रही।
हाल में राजधानी में हुए विस्फोट ने देश को पुनः चिंतन हेतु विवश किया। इसके विपरीत राजनीतिक स्वार्थवश कुछ नेता सांप्रदायिक दलों को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं और सनातन संस्कृति को सांप्रदायिक कहकर मिथ्या प्रचार करते हैं। हिन्दुत्व जीवन-पद्धति है, भारतीयता का स्वरूप है; जबकि धार्मिक कट्टरवाद विस्तारवादी विचार है, जिसका इतिहास साक्षी है।
भारत अनगिनत बलिदानों से स्वतंत्र हुआ, पर मानसिक रूप से मुगल-मैकाले प्रभाव से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया। इसी कारण साम्प्रदायिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रगति समय-समय पर बाधित होती रही है।अतः आवश्यक है कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति सम्मान को सर्वोपरि रखा जाए। तभी भारत में समरसता और समानता का भाव पुष्ट होगा और सामूहिक प्रयास से भारत विकसित राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होगा।

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