कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति गुलाब का फूल है, वह काँटों में भी मुस्कराता है

Abhinav Shukla Picture
Published On

सभी के हित का ध्यान रखते हुए मनसा, वाचा, कर्मणा अपने दायित्वों का सम्यक् रूप से निर्वाह करना कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य का पालन यदि समुचित रूप से किया जाता है तो जीवन पूर्णतः गौरवान्वित बनता है। जो कर्त्तव्यनिष्ठ है, वह अपने करणीय कर्म के प्रति पूरी तरह से समर्पित होता है। जो समर्पित है, उसमें किसी भी तरह की अपेक्षा अथवा प्रदर्शन आदि को अवकाश नहीं रहता। वह परमार्थ पोषक एवं प्रामाणिक होता है। कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की कथनी और करनी में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं रह जाता। वह जैसा कहता है, वैसा ही करता भी है। ऐसी कथनी-करनी की एकरूपता से वह समाज में श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है और प्रत्येक उससे प्रेरणाएँ ग्रहण करता है। आज राजनीतिक मंच पर हम देख रहे है कि कर्त्तव्य से विमुख लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए अनेक प्रकार की भ्रांति फैला रहे है।सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ अनेक आरोप लगाकर कर्तव्यपथ से विमुख करने की कोशिश की जा रही है।गत दिनों कांग्रेस के दिग्गज नेता और पार्टी के अध्यक्ष खरगे ने मोदी के पिताश्री पर भद्दी गाली देकर अपने राजनैतिक गुस्से को शांत किया।लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का यह कारण तो नही है कि इतने बड़े लोकतंत्र के नेता और भारत के प्रधानमंत्री को गाली दी जाए।यह कांग्रेस की गलत मानसिकता है।कर्तव्य पालन की जगह उन पर दोषारोपण कर रहे है जो कर्तव्यनिष्ठ और कथनी करनी की समानता धारण किये हुए है।

कर्त्तव्य परिपालन की बात करना और कर्त्तव्य परिपालन के नाम पर शोर-शराबा मचाना अलग बात है और कर्त्तव्यों के क्षेत्र में बिना किसी शोर-शराबे के समर्पित हो जाना अलग बात है। आज हम देखते हैं कि कर्त्तव्यों के परिपालन के लिए अक्सर लम्बे-चौड़े उपदेश दिये जाते हैं, पर जब कर्तव्य-निर्वाह का अवसर आता है तो व्यक्ति दायें-बायें देखने लगता है। कटु सत्य तो यह है कि आज कर्त्तव्यों की चर्चा करने वाले लाखों हैं, पर कर्त्तव्यों के पावन पथ पर गतिशील होने वाले विरले ही हैं। कई बार मुझे चिंतन के क्षणों में लगता है कि आज व्यक्ति कर्त्तव्यों से विमुख हो गया है। इस विमुखता के कारण प्रत्येक क्षेत्र में अराजकता और अशांति का विस्तार हुआ है।
 
याद रखिए, कर्त्तव्यों के पावन क्षेत्र से भटककर कोई व्यक्ति कभी भी शांति का अहसास नहीं कर सकता। जीवन का गौरव और उसकी सार्थकता

कर्त्तव्य पालन में ही है। कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति गुलाब का फूल है, वह काँटों में भी मुस्कराता है। यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह उसे पुष्पमाला के रूप में गले में डाले अथवा निर्ममतापूर्वक मसल दे। लेकिन गुलाब की मुस्कराहट और उसकी सुवास में कोई अंतर नहीं आता। स्वयं में सुवासित रहकर अपने निकट के वातावरण को सवासित करते रहना उसका कर्त्तव्य है और अपने इस कर्त्तव्य को वह अन्त तक बखूबी निभाता है। आज हम देख रहे है कि भारत के प्रधानमंत्री को हर राह चलता व्यक्ति अभद्र टिप्पणी करता है।यहां तक उनके परिवार को गालियां दी जाती है,लेकिन मोदी की सहनशीलता गजब की है।मोदी जानते है कि मुझे कार्य करना है और देश को विकसित करना है।उसके लिए प्रयासरत है।
 
कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का हृदय कुसुम-सा कोमल एवं वज्र-सा कठोर होता है। उसकी दृष्टि में कर्त्तव्य का मूल्य है।अपने प्राणों का नहीं। उसका स्वर होता है- 'कार्य वा साधयामि, देहं वा पातयामि' मेरा जो कर्त्तव्य है, जो कार्य है उसे मैं पूर्ण करके ही रहूँगा, भले ही मुझे अपने प्राणों का उत्सर्ग ही क्यों न करना पड़े। भारतीय पौराणिक युग के चमकते हुए पात्र, कर्त्तव्य की सजीव मूर्ति हरिश्चन्द्र के नाम से हम भलीभाँति परिचित हैं। अत्यंत उदार, सहज, सरल और सत्यनिष्ठ जीवन जीने वाले हरिश्चन्द्र ने हँसते-हँसते अपने विशाल साम्राज्य का त्याग कर दिया था। इतना ही नहीं, तारा को बेच दिया, स्वयं बिक गये, पुत्र रोहित को जब तारा अग्नि- संस्कार के लिए मरघट में लेकर आई, उस समय का दृश्य सचमुच अत्यंत करुणा से परिपूर्ण बन गया था, पर हरिश्चन्द्र अपने कर्त्तव्य से एक पल के लिए भी विचलित नहीं हुए।
 
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के द्वारा जटायु की परिचर्या, घायल हंस की बुद्ध के द्वारा सेवा, कबूतर को बचाने के लिए मेघरथ द्वारा स्वयं की प्रस्तुति, चींटियों की रक्षा के लिए धर्मरुचि द्वारा अपने प्राणों का उत्सर्ग कर्त्तव्य का परिपालन नहीं है तो और क्या है ? सहस्राब्दियाँ गुजर जाने के बाद भी आज हम कर्तव्यनिष्ठ जनों का आदरपूर्वक स्मरण करते हैं एवं उनसे प्रेरणाओं का प्रकाश ग्रहण करते हैं।
 
कर्त्तव्य-पालन में जीवन का उत्थान है तो कर्त्तव्य से च्यूत होने में जीवन का पतन है। अपने कर्त्तव्यों से मुख चुराना अच्छी बात नहीं है। जो अपने
कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठा नहीं रख पाते, वे जीवन के हर क्षेत्र में समस्याओं की सर्जना करते हैं। समस्याओं का यह सर्जन मनुष्य को मझधार में धकेल देता है। ऐसे व्यक्ति कदम-कदम पर असफल सिद्ध होते हैं। जो कर्त्तव्यनिष्ठ है, वह प्रत्येक क्षेत्र में सफलता से साक्षात्कार करता है। सिद्धियाँ उसके चरणों की उपासिकाएँ बनकर निवास करती हैं।

पशु-जगत् के पास में विवेक दृष्टि नहीं होती। मानव के पास मनन करने की क्षमता है। वह सम्यक् और असम्यक् का बोध रखता है। बोध और क्षमता होने के बावजूद भी यदि मानव अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं है तो उसका जीवन पशु से गया गुजरा जीवन है। मनन क्षमता का पूर्ण विकास न होने पर भी बिचारे पशु किसी-न-किसी रूप में अपने-अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक हैं। प्रकृति जगत् भी अपने कर्त्तव्यों का बिना किसी अगर-मगर के निर्वाह कर रहा है। सूर्य आज भी प्रतिदिन समय पर उदित होकर अंधकार दूर करने का अपना कर्त्तव्य निभाता है। पृथ्वी, हवा, जल, अग्नि, वनस्पति सभी अपने-अपने कर्त्तव्य में संलग्न हैं।
 
जो कर्त्तव्य से विमुख है, जिसने अपने कर्त्तव्यों को जाना और पहचाना नहीं है उसका क्या मूल्य है? मूल्य, महत्त्व उसी जीवन का है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने कर्त्तव्यों को पूर्ण निष्ठा के साथ निभाता है।
 
 कर्त्तव्य 'धर्म' का पर्याय है। याँ तो धर्म बहुत व्यापक शब्द है, पर जो कर्म मानवता की दृष्टि से करणीय है उसके बारे में कहा जाता है कि ऐसा करना हमारा धर्म है। इस तरह कर्तव्य भी धर्म की श्रेणी में आ जाता है।
 
अपने दायित्त्वों का, अपने कर्त्तव्यों का मनोयोग से निःस्वार्थ रूप से जागरूकतापूर्वक परिपालन करने में सचमुच एक अनोखा आनन्द है। इस आनन्द की अनुभूति कर्त्तव्यों से जुड़कर ही की जा सकती है। कर्त्तव्यों की लम्बी-चौड़ी व्याख्याओं और परिभाषाओं में हमें नहीं उलझना चाहिए। व्याख्याएँ व्याख्याएँ है, इनमें उलझने का अर्थ मूल से भटकना है। हमें मूल से भटकना नहीं है, अपितु मूल से जुड़ना है। आत्महितों की सुरक्षा के लिए किसी के हितों की हत्या कर देना या निपट स्वार्थी अथवा निर्मम बन जाना मानव के लिए कतई शोभास्पद नहीं है। मानव जिस परिवार, मौहल्ले, समाज, गाँव, नगर और राष्ट्र में जीता है, उसके प्रति उसके कुछ कर्त्तव्य हैं और उन कर्त्तव्यों का निर्वाह सतत होना चाहिए। 
कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति गुलाब का फूल है, वह काँटों में भी मुस्कराता है
 
 
P

About The Author

Post Comments

Comments