"खुले बोरवेल बन रहे मासूम बच्चों के लिए मौत का जाल"

*हर साल होते हादसे फिर भी नहीं जागता प्रशासन बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त निगरानी और जवाबदेही जरूरी*

हर्षिता यादव  Picture
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राजस्थान के फलोदी जिले में पूनिया की ढाणी में नौ वर्षीय बालक भोमाराम के बोरवेल में गिरने की घटना ने एक बार फिर देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खेत में खराब बोरवेल को ठीक करने के लिए मशीन बुलाई गई थी। पाइप निकालने का काम चल रहा था। इसी दौरान बालक अपने पिता के सामने बोरवेल में गिर गया। सूचना मिलने पर पुलिस और राज्य आपदा मोचन बल की टीम मौके पर पहुंची। बोरवेल में कैमरा डालने पर करीब 640 फीट की गहराई पर बच्चे की हलचल दिखाई देने की जानकारी सामने आई। प्रशासन और बचाव दल बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए प्रयासरत हैं।
 
यह घटना केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि देशभर में बोरवेल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली घटना है। हर वर्ष कहीं न कहीं बोरवेल में बच्चों के गिरने की खबरें सामने आती हैं। दुर्घटना के बाद प्रशासन, पुलिस, आपदा बचाव दल और चिकित्सा विभाग सक्रिय हो जाते हैं। घंटों तक बचाव अभियान चलता है। मशीनें मंगाई जाती हैं। अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचते हैं और पूरा क्षेत्र चर्चा का विषय बन जाता है। लेकिन जब अभियान समाप्त हो जाता है, तब कुछ समय बाद वही पुरानी लापरवाही फिर दिखाई देने लगती है। सवाल यह है कि दुर्घटना होने के बाद इतनी सक्रियता दिखाने वाले विभाग पहले से सतर्कता क्यों नहीं बरतते?
 
बोरवेल में गिरने की घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि इनमें अक्सर छोटे बच्चे शिकार बनते हैं। बच्चों को जमीन में बने खुले गड्ढे या बोरवेल की गहराई का अंदाजा नहीं होता। वे खेलते हुए अनजाने में उसके पास पहुंच जाते हैं। कई बार खेतों में बोरवेल की खुदाई के बाद उसे खुला छोड़ दिया जाता है। कहीं अस्थायी ढक्कन लगाया जाता है, तो कहीं केवल बोरी या कमजोर वस्तु से मुंह बंद कर दिया जाता है। ऐसी व्यवस्था बच्चे का भार सहन नहीं कर पाती और गंभीर हादसे का कारण बन सकती है। इसलिए बोरवेल का मुंह सुरक्षित तरीके से बंद करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी है।
 
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 और 2023 के दौरान उसके बचाव अभियानों की सूची में देश के अलग-अलग राज्यों में बोरवेल में फंसे बच्चों की 11 घटनाएं दर्ज थीं। इनमें पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात सहित कई राज्य शामिल थे। इन घटनाओं में कुछ बच्चों को जीवित बचाया गया, जबकि कई मामलों में बचाव अभियान के बावजूद जान नहीं बचाई जा सकी। यह विवरण स्पष्ट करता है कि बोरवेल दुर्घटनाएं किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।
 
वर्ष 2024 में राजस्थान के दौसा जिले में पांच वर्षीय बालक आर्यन के बोरवेल में गिरने की घटना भी देश को झकझोरने वाली थी। लगभग 150 फीट गहरे बोरवेल में फंसे बच्चे को निकालने के लिए करीब 56 घंटे तक प्रयास किए गए, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। इस घटना के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राजस्थान के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से जवाब मांगा था। आयोग ने चिंता जताई थी कि खुले और परित्यक्त बोरवेल से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। 
 
देश में बोरवेल दुर्घटनाओं के सही और संपूर्ण आंकड़ों का सवाल भी महत्वपूर्ण है। मार्च 2025 में लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में जल शक्ति मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि केंद्र सरकार का यह मंत्रालय देश में बोरवेल दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौतों का समेकित आंकड़ा नहीं रखता। ऐसे में पिछले पांच वर्षों में देशभर में कितने बच्चे बोरवेल में गिरे, कितनों की मृत्यु हुई और कितनों को सुरक्षित बचाया गया, इसका एक ही आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। आंकड़ों की यह कमी भी चिंता का विषय है, क्योंकि विश्वसनीय जानकारी के बिना समस्या की व्यापकता का आकलन करना और प्रभावी नीति बनाना कठिन हो जाता है। 
 
हालांकि, उपलब्ध बचाव अभियानों के आंकड़े खतरे की गंभीरता को सामने रखते हैं। जुलाई 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच राष्ट्रीय आपदा मोचन बल ने बोरवेल में फंसे बच्चों को बचाने के लिए 37 अभियान चलाए, जिनमें 17 अभियानों में बच्चों को सफलतापूर्वक बचाया जा सका। यह आंकड़ा केवल राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के अभियानों से संबंधित है। इसे देश में हुई कुल दुर्घटनाओं या कुल मौतों का आंकड़ा नहीं माना जा सकता, क्योंकि सभी घटनाएं इस बल तक पहुंचें, यह आवश्यक नहीं है। 
 
इन घटनाओं को रोकने के लिए सबसे पहली जिम्मेदारी बोरवेल खुदवाने वाले व्यक्ति और काम करने वाली एजेंसी की है। काम पूरा होने के बाद बोरवेल का मुंह मजबूत ढक्कन से बंद किया जाना चाहिए। यदि किसी कारण से काम अधूरा रह जाता है, तब भी उसे खुला छोड़कर घर लौटना गंभीर लापरवाही है। खेतों, निर्माण स्थलों और आबादी के आसपास स्थित पुराने तथा अनुपयोगी बोरवेल की पहचान करके उन्हें सुरक्षित तरीके से बंद करना जरूरी है। केवल बोरी, कपड़े, लकड़ी के कमजोर टुकड़े या अस्थायी आवरण के भरोसे सुरक्षा नहीं छोड़ी जा सकती।
 
प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। ग्राम पंचायतों, स्थानीय निकायों, पुलिस और संबंधित विभागों के माध्यम से खुले तथा अनुपयोगी बोरवेल का सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। बोरवेल खुदवाने की अनुमति, काम पूरा होने की सूचना और सुरक्षा मानकों के पालन की जांच की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों की जिम्मेदारी तय की जाए और लापरवाही सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई हो। गांवों में लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं, ताकि प्रत्येक व्यक्ति समझ सके कि खुला बोरवेल बच्चों के लिए कितना बड़ा खतरा है।
 
बच्चों की सुरक्षा केवल उनके माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं है। खेत में काम करने वाले मजदूरों, बोरवेल संचालकों, ठेकेदारों, पंचायत प्रतिनिधियों और प्रशासन को भी सतर्क रहना होगा। बचाव दलों को आवश्यक उपकरणों के साथ तैयार रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन बचाव अभियान की नौबत ही न आए, यह सबसे बड़ी सफलता होगी। दुर्घटना के बाद घंटों तक चलने वाले अभियान और अधिकारियों की मौजूदगी से अधिक जरूरी है कि दुर्घटना होने से पहले ही खतरे को समाप्त कर दिया जाए।
 
फलोदी की घटना हमें यही संदेश देती है कि लापरवाही की कीमत किसी मासूम बच्चे और उसके परिवार को नहीं चुकानी चाहिए। जिस बोरवेल से पानी मिलने की उम्मीद होती है, वही खुला रहने पर जानलेवा खतरा बन सकता है। मां-बाप की गोद सूनी होने से बचाने का सबसे प्रभावी उपाय आधुनिक बचाव मशीनें ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, सावधानी और समय पर कार्रवाई भी है। प्रशासन को हर घटना के बाद सक्रिय होने के बजाय स्थायी सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। खुले बोरवेल को बंद करना, सुरक्षा नियमों का पालन कराना और दोषियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी परिवार को ऐसी असहनीय पीड़ा से न गुजरना पड़े।
 
कांतिलाल मांडोत
 

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