न्यायपालिका को डराने की कोशिशें बेअसर लोकतंत्र में कानून से ऊपर कोई नहीं

राहुल गांधी के मार्च पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का दोटूक संदेश अदालत अपनी स्वतंत्रता और गरिमा से समझौता नहीं करेगी

हर्षिता यादव  Picture
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देश में चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया है। राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं के विरोध मार्च से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत को डराने या धमकाने की कोशिशों का कोई असर नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय को इस बात की पूरी जानकारी रहती है कि उसके बाहर क्या कहा जा रहा है और अदालत के भीतर क्या हो रहा है। न्यायपालिका किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं रहती, बल्कि परिस्थितियों और घटनाक्रम से भलीभांति परिचित रहती है।
 
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ा हुआ है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इस प्रक्रिया को चुनौती दी है। इस मुद्दे पर राजनीतिक विरोध, ज्ञापन और मार्च के बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा है। ऐसे माहौल में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक असहमति और न्यायिक प्रक्रिया दोनों का अपना अलग स्थान है।
 
लोकतंत्र में विरोध करना राजनीतिक दलों और नागरिकों का अधिकार है, लेकिन विरोध की अभिव्यक्ति ऐसी होनी चाहिए, जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और कानून की सीमाओं का सम्मान करे। किसी निर्णय से असहमति होने पर संबंधित संस्था के सामने तथ्य रखना, कानूनी उपाय अपनाना और न्यायालय में याचिका दायर करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है।
 
इसके विपरीत किसी संस्था पर दबाव बनाने अथवा उसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करने का प्रयास स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं माना जा सकता। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल न्यायाधीशों का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा से जुड़ी हुई है।
 
विपक्षी नेताओं ने विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इसमें प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने, मतदाता सूची से नाम हटाने के नियमों का पालन सुनिश्चित करने, हटाए गए नामों का विवरण सार्वजनिक करने और मतदाता संबंधी आंकड़ों की स्वतंत्र जांच कराने जैसी मांगें उठाई गई हैं।
 
याचिकाकर्ताओं ने सुनवाई पूरी होने तक इस प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध भी किया है। न्यायालय ने मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। इससे स्पष्ट है कि विवाद का समाधान अब संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से तलाशा जाएगा।
 
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है कि न्यायालय में याचिका दायर करना किसी पक्ष के आरोपों को स्वतः सही सिद्ध नहीं करता। इसी तरह किसी प्रक्रिया पर सवाल उठने मात्र से उसे गलत नहीं माना जा सकता। आरोपों, तथ्यों और संबंधित कानूनों की जांच के बाद ही न्यायालय किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है। इसलिए सभी पक्षों को न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि राजनीतिक दावों और कानूनी निष्कर्षों के बीच अंतर समझा जाए।
 
विरोध मार्च से जुड़े घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय परिसर के बाहर की गतिविधियों और कथित धक्का-मुक्की को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान न्यायालय परिसर में लगे निगरानी कैमरों और अन्य डिजिटल सामग्री को सुरक्षित रखने की मांग की गई। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उपलब्ध दृश्य और डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखने के निर्देश दिए।
 
निजी पक्षों को भी संबंधित सामग्री प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई। इस निर्देश का उद्देश्य घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को सुरक्षित रखना है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनकी जांच की जा सके। किसी भी विवाद में निष्पक्ष जांच और प्रमाणों का संरक्षण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
 
इस प्रकरण का एक दूसरा पहलू भी है। राजधानी दिल्ली में लगातार हो रहे राजनीतिक प्रदर्शनों को लेकर व्यापारिक संगठनों ने चिंता जताई है। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने गृह मंत्री को पत्र लिखकर कनॉट प्लेस में प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने की मांग की है। संगठन का दावा है कि पूर्व के प्रदर्शनों से व्यापार को भारी नुकसान हुआ और दुकानदारों के सामने आर्थिक कठिनाइयां पैदा हुईं।
 
संगठन ने त्योहारों के समय प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों में प्रदर्शन रोकने तथा भविष्य के लिए अलग प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने जैसी मांगें भी रखी हैं। इन दावों की वास्तविकता का आकलन संबंधित तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, लेकिन व्यापारियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 
राजधानी के व्यस्त व्यापारिक क्षेत्रों में प्रदर्शन होने से यातायात, ग्राहकों की आवाजाही और दुकानों के संचालन पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, नागरिकों और राजनीतिक संगठनों को अपनी बात रखने का अधिकार भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था, आम नागरिकों की सुविधा, व्यापारिक गतिविधियों और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करे। प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान और स्पष्ट नियम होने से विवाद तथा अव्यवस्था की आशंका कम की जा सकती है।
 
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद भी इस विषय पर बहस तेज हुई है। प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे स्थान निर्धारित किए गए हैं। किसी भी स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति देने या रोकने का निर्णय कानून, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर होना चाहिए। नियम सभी राजनीतिक दलों और संगठनों पर समान रूप से लागू होने चाहिए, ताकि किसी के साथ पक्षपात का आरोप लगाने की गुंजाइश न रहे।
 
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि संवैधानिक संस्थाओं को अपना काम स्वतंत्र रूप से करने दिया जाना चाहिए। न्यायालय का दायित्व है कि वह कानून के अनुसार सभी पक्षों को सुने और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय दे। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करना है, जबकि राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आरोपों और आपत्तियों को प्रमाणों के साथ संबंधित मंच पर रखें।
 
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों की रक्षा और कानून के समान अनुपालन से भी होती है। राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें इस सीमा तक नहीं बढ़ना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाओं पर अनावश्यक दबाव का वातावरण बने। न्यायपालिका के प्रति सम्मान का अर्थ उसके प्रत्येक निर्णय से सहमत होना नहीं, बल्कि उसके अधिकार क्षेत्र और स्वतंत्र भूमिका को स्वीकार करना है। इसी प्रकार अदालतों से भी अपेक्षा रहती है कि वे प्रत्येक मामले में निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय दें।
 
वर्तमान विवाद का अंतिम समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, कानून के पालन और न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा। मतदाता सूची से जुड़े सवाल हों या विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई घटनाओं की जांच, प्रत्येक विषय पर प्रमाणों के आधार पर निर्णय होना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति या संस्था को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। संवैधानिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति इसी में है कि अधिकारों की रक्षा भी हो और संस्थाओं की स्वतंत्रता भी कायम रहे।
 
कांतिलाल मांडोत
 
 
 

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